मंत्रिमंडल विस्तार के दो-तीन दिन पहले से यह खबर हर तरफ चल रही थी कि केंद्र में जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय संभाल रहीं उमा भारती की मोदी मंत्रिमंडल से छुट्टी हो रही है. यह भी कहा गया कि उन्होंने अपने स्वास्थ्य का हवाला देते हुए खुद ही मंत्री पद छोड़ने की इच्छा जताई है. लेकिन अंत में हुआ यह कि उनसे उनका पसंदीदा मंत्रालय ले लिया गया और वे केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनी रहीं. अब उन्हें पेयजल एवं स्वच्छता मंत्रालय दिया गया है.

इस मंत्रालय में उमा भारती को भेजने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फैसले का विश्लेषण यह कहते हुए किया जा रहा है कि उन्होंने उमा भारती को किनारे लगा दिया. ऐसा इसलिए कहा जा रहा है क्योंकि पहले जो मंत्रालय उनके पास था, वह काफी बड़ा था और उसके मुकाबले यह मंत्रालय काफी छोटा है. पहले यह मंत्रालय ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय के साथ जुड़ा हुआ था. लेकिन अब प्रधानमंत्री ने इसे अलग करके इसका जिम्मा उमा भारती को सौंप दिया है. इस मंत्रालय के सबसे मुख्य कार्य हैं स्वच्छ भारत अभियान (ग्रामीण) का क्रियान्वयन देखना और राज्यों में इसकी प्रगति पर निगरानी रखना.

अब सवाल यह उठता है कि उमा भारती के स्वास्थ्य कारणों से इस्तीफा देने की इच्छा और अंत में उनके मंत्री बने रहने के बीच क्या-क्या हुआ? विश्वस्त सूत्रों की मानें तो पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की ओर से उमा भारती को यह संदेश दिया गया था कि उन्हें जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय से हटाया जा रहा है. इसकी वजह यह बताई गई कि जिस तरह के काम की उनसे अपेक्षा थी, उस तरह का काम उनका मंत्रालय नहीं कर पा रहा था.

सूत्रों की मानें तो उमा भारती को दो विकल्प दिए गए. पहला विकल्प यह था कि वे केंद्र सरकार में बनी रहें और प्रधानमंत्री उन्हें अन्य किसी मंत्रालय की जिम्मेदारी सौंप देंगे. दूसरा, अगर चाहें तो वे राज्यपाल बन सकती हैं. कहा यह जा रहा है कि शुरुआत में इन दोनों विकल्पों में से किसी को भी मानने के लिए उमा भारती तैयार नहीं थीं. उनका कहना था कि वे जल संसाधन और गंगा पुनरुद्धार मंत्रालय से इस्तीफा देने को तैयार हैं लेकिन कोई और जिम्मेदारी नहीं लेंगी.

नरेंद्र मोदी और अमित शाह के लिए यह स्थिति भी प्रतिकूल नहीं थी. लेकिन असल पेंच तब फंसा जब उमा भारती ने कहना शुरू किया कि वे केंद्र सरकार के दायित्वों से मुक्त होकर गंगा की सेवा में पूरी तरह से लग जाएंगी. उन्होंने मंत्री पद छोड़ने के बाद गंगा को लेकर एक यात्रा पर निकलने की बात भी कही.

यह एक ऐसी स्थिति थी जिसके लिए न तो पार्टी का शीर्ष नेतृत्व तैयार था और न राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ. बताया जा रहा है कि संघ की जो बैठक वृंदावन में चल रही थी, वहां जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह गए तो संघ नेताओं के साथ उनकी उमा भारती के मसले पर भी चर्चा हुई. सूत्र बताते हैं कि संघ ने यह साफ कर दिया कि अगर उमा भारती केंद्र सरकार से बाहर आकर यात्रा पर निकलती हैं तो इसका ठीक संदेश नहीं जाएगा. माना गया कि हिंदुत्व के एजेंडे पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ेगा.

अमित शाह और नरेंद्र मोदी के लिए संदेश स्पष्ट था कि उमा भारती को सरकार में बनाए रखा जाए. अगले साल मध्य प्रदेश के चुनाव भी होने वाले हैं. कुछ लोगों का मानना था कि ऐसे में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का विरोध करने वालों को उमा भारती के पीछे गोलबंद होने का मौका मिल सकता है.

दूसरी तरफ संघ और भाजपा के कुछ नेताओं और उमा भारती के कुछ करीबी लोगों ने उन्हें यह समझाने की कोशिशें तेज कीं कि अगर सरकार में उन्हें दूसरा मंत्रालय मिलता है तो भी उन्हें बने रहना चाहिए. इसलिए अंत में उमा भारती ने मंत्रालय बदले जाने के बावजूद सरकार में बने रहने का निर्णय लिया.

लेकिन बताया जा रहा है कि उनकी नाराजगी खत्म नहीं हुई. यही वजह थी कि वे रविवार को राष्ट्रपति भवन में आयोजित शपथ ग्रहण समारोह में वे मौजूद नहीं रहीं. अब देखना होगा कि अपने पहले के मंत्रालय के मुकाबले बेहद छोटे और अपेक्षाकृत कम महत्व वाले मंत्रालय में उमा भारती कब तक टिकी रहेंगी.