केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया में विदेशी निवेश तो चाहती है लेकिन सरकारी एयरलाइंस का मालिकाना विदेश की किसी कंपनी के हाथ में नहीं सौंपना चाहती. बिजनेस स्टैंडर्ड के मुताबिक एयर इंडिया के निजीकरण की प्रक्रिया के नियम-कायदे तय करने के लिए बने मंत्रियों के समूह (जीओएम) की ऐसी राय है.

अख़बार के मुताबिक जीओएम मानना है कि एयर इंडिया भले ही निजी हाथों में चली जाए लेकिन राष्ट्रीय एयरलाइंस का उसका तमगा बरकरार रहना चाहिए. इसीलिए वह ऐसे प्रस्ताव पर विचार कर रहा है जिसके तहत एयर इंडिया में निवेश करने की इच्छुक विदेशी कंपनियां अपनी भारतीय सहयोगी कंपनियों के साथ मिलकर ही इस प्रक्रिया में हिस्सा ले सकें. साथ ही निवेश में विदेशी कंपनी का हिस्सा 49 और उसकी भारतीय सहयोगी का 51 फीसदी हो.

सूत्र बताते हैं कि एयरलाइंसों का मालिकाना हक बदलने की प्रक्रिया के लिए स्थापित अंतर्राष्ट्रीय नियम भी जीओएम की राय का आधार बने हैं. उनके मुताबिक अगर इन नियमों का पालन नहीं किया गया तो निजीकरण के बाद एयर इंडिया की अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों के संचालन में दिक्कत हो सकती है. यही नहीं केंद्र सरकार स्थापित अंतर्राष्ट्रीय दिशा-निर्दशों के परे कोई फैसला करने का मन बनाती भी है तो पहले उसे इसके लिए दुनिया के अन्य देशों को आश्वस्त करना होगा कि वह सही कर रही है. और जैसा कि सूत्र बताते हैं, ‘सरकार ऐसा कुछ करेगी इसकी संभावना भी कम ही है.’

यानी सूत्रों की मानें तो इसकी पूरी संभावना है कि निजीकरण के बाद एयर इंडिया का मालिकाना किसी भारतीय कंपनी को ही मिले. हालांकि अभी इस पर कोई फैसला नहीं हुआ है. यहां बताते चलें कि एयर इंडिया के निजीकरण पर विचार करने वाले जीओएम के प्रमुख केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली हैं. यह समूह अब तक दो बैठकें कर चुका है.