नरेंद्र मोदी ने 2014 लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार की कई कमियों पर निशाना साधा था. सरकार का बड़ा आकार इन्हीं कमियों में से एक था. नरेंद्र मोदी अपनी रैलियों में तब बार-बार आरोप लगाते थे कि मनमोहन सिंह सरकार अपने बड़े आकार के चलते कार्यकुशल नहीं है. तब उन्होंने कहा था कि उनकी सरकार का आकार छोटा होगा. इसके लिए उन्होंने ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिम गवर्नेंस’ का नारा भी दिया था.

लेकिन तीन सितंबर को हुए तीसरे विस्तार के बाद अब मोदी मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या बढ़कर 76 हो गई है. यह भी कहा जा रहा है कि जल्द ही जेडीयू जैसे सहयोगियों को जगह देने के लिए इसका एक और विस्तार संभव है. यदि ऐसा हुआ तो मोदी सरकार का आकार 81 मंत्रियों की अधिकतम सीमा को भी छू सकता है. ऐसे में ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिम गवर्नेंस’ के नरेंद्र मोदी के दावे पर सवाल उठना लाजमी है.

‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिम गवर्नेंस’ क्या है?

इस मॉडल के अनुसार प्रभावी शासन के लिए मंत्रियों की संख्या से ज्यादा उनकी कुशलता मायने रखती है. गुजरात के मुख्यमंत्री रहते नरेंद्र मोदी इस मॉडल का सफलतापूर्वक प्रयोग कर चुके हैं. वहां की विधानसभा में 182 विधायक हैं लिहाजा मंत्रियों की संख्या अधिकतम 27 तक हो सकती है. लेकिन मुख्यमंत्री रहते उन्होंने अपने मंत्रिमंडल का आकार हमेशा छोटा रखा. इस बारे में उनके आलोचक कहते हैं कि मोदी केंद्रीकृत सत्ता में यकीन रखने वाले नेता हैं और सरकार चलाने के लिए मंत्रियों से ज्यादा वे नौकरशाहों पर यकीन रखते हैं.

यूपीए के दूसरे कार्यकाल के बारे में केवल भाजपा ही नहीं दूसरे आलोचक भी आरोप लगाते थे कि सरकार निर्णय लेने में बहुत कमजोर है. इसका प्रमाण मंत्रियों के कई समूहों (जीओएम) के अस्तित्व के रूप में दिया जाता था. यूपीए के शासनकाल में एक समय मंत्रियों के 52 समूह तक काम कर रहे थे. नरेंद्र मोदी ने आरोप लगाया था कि मनमोहन सिंह सरकार में कई दल शामिल हैं और सब अपनी-अपनी चलाते हैं.

पिछली सरकारों का आकार कैसा था?

1996 से 1998 के बीच एचडी देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल ने प्रधानमंत्री के रूप में बारी-बारी से काम किया था. इन दोनों सरकारों का आकार अपेक्षाकृत छोटा था. इन दोनों प्रधानमंत्रियों ने अपनी सरकार में 50 के आसपास ही मंत्री बनाए थे. ऐसा इसलिए संभव हो पाया था कि कांग्रेस और तेलगुदेशम जैसी पार्टियां सरकार में शामिल होने के बजाय उसे बाहर से समर्थन कर रही थीं.

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने जब 1996 में पहली बार सरकार बनाई तो उसमें केवल 12 मंत्री ही थे. हालांकि वह सरकार विश्वास मत हासिल करने से पहले केवल 13 दिनों में ही गिर गई थी, लिहाजा उसे पूर्ण सरकार नहीं कह सकते. इसके बाद वाजपेयी 1998 में एक बार फिर प्रधानमंत्री बने. उन्होंने तब से 2004 तक केंद्र में एनडीए की सरकार चलाई और तब उनकी सरकार में अधिकतम 79 मंत्री तक बने. हालांकि ऐसा वाजपेयी की मजबूरियों के चलते हुआ क्योंकि उनकी सरकार 18 दलों के समर्थन से चल रही थी. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में भी कई दलों के शामिल होने के चलते उसके मंत्रियों की संख्या अंतिम दिनों में 77 तक पहुंच गई थी. लेकिन केंद्र की मौजूदा सरकार के साथ ऐसी कोई मजबूरी न होते हुए भी उसका बड़ा आकार नरेंद्र मोदी के छोटी सरकार के दावे पर प्रश्नचिह्न खड़े करता है.

मजबूत मोदी की मंत्रिपरिषद का आकार बड़ा क्यों?

मंत्रिपरिषद के ताजा विस्तार के बाद कांग्रेस नेता दिनेश राव ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि यह सरकार अपने दूसरे वादों की तरह ‘मिनिमम गवर्नेंस’ का वादा भी भूल गई. उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी का कहना था कि उनकी सरकार में यूपीए सरकार से कम मं​त्री होंगे पर यहां तो अब उससे भी ज्यादा मंत्री हो गए. दूसरे आलोचक भी मानते हैं कि मोदी अपना वादा पूरा करने में नाकाम रहे हैं.

ऐसे में सवाल उठता है कि पिछले तीन साल में आखिर ऐसा क्या हुआ कि मो​दी सरकार के मंत्रियों की शुरुआती संख्या 46 से बढ़कर 76 हो गई. इस बारे में भाजपा के एक नेता कहते हैं, ‘हमारे देश में सरकार चलाना आसान नहीं है, यहां सरकार चलाने के लिए सबको साथ लेकर चलना होता है.’ आलोचकों का भी मानना है कि देश की विविधता, क्षेत्रीय महत्वाकांक्षा, पहचान की राजनीति जैसी चुनौतियों को साधना काफी मुश्किल है जिसके चलते सरकार को छोटा रख पाना बहुत कठिन चुनौती है.

पर असल सवाल यह है कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की न केवल सरकार बल्कि पार्टी और जनता पर भी अभूतपूर्व पकड़ है, तो वे क्यों इन मजबूरियों को दूर करने में नाकाम रहे. राजनीति के जानकार इसकी तीन मुख्य वजह बताते हैं. पहली वजह यह कि नरेंद्र मोदी ने अपने वरिष्ठ नेताओं को सरकार से दूर रखा. उन्होंने कम अनुभवी नेताओं को सरकार में जगह दी. यही नहीं, उन्होंने ज्यादातर नेताओं को उनके पेशेवर जीवन से असंबद्ध मंत्रालयों का कार्यभार सौंपा. इस चलते किसी-किसी मंत्रालय में तीन या चार मंत्री तक बिठाने पड़े हैं.

दूसरी वजह कांग्रेस और दूसरे दलों का सफाया कर पूरे देश में फैलने की भाजपा की महत्वाकांक्षा है. इसके चलते पार्टी अधिक से अधिक राज्यों को केंद्र में जगह दे रही है. इसका ताजा उदाहरण केरल के केजे अल्फोंस को सरकार में शामिल करना है. केरल से भाजपा का कोई सांसद न हुए भी उन्हें केवल इसलिए मंत्री बनाया गया क्योंकि पार्टी की निगाह भविष्य के चुनावों पर है. तीसरी वजह यह है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह 2019 के लोकसभा चुनाव के लिए कोई खतरा नहीं उठाना चाहते. इसलिए एनडीए में ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रीय दलों को शामिल करके उन्हें सरकार का हिस्सा बनाया जा रहा है. जदयू और अन्नाद्रमुक जैसे दल इसके उदाहरण हैं.

सवाल उठना लाजमी

आलोचकों का कहना है कि सरकार का आकार छोटा रखने के मामले में मोदी से कहीं बड़ा काम वाजपेयी ने किया था. उन्होंने संसद से 91वां संविधान संशोधन पारित करवा कर सरकार के आकार को कानूनी तौर पर सीमित कर दिया. 2004 से लागू इस प्रावधान के बाद तो केंद्र या राज्य में निर्वाचित सदन के 15 फीसदी से ज्यादा मंत्री नहीं बनाए जा सकते. लेकिन इस मामले में नरेंद्र मोदी अभी तक अपने वादे पर खरे नहीं उतर पाए हैं. वहीं प्रदर्शन के मामले में भी केंद्र सरकार अपने वादे के अनुरूप काम नहीं कर पाई है. उच्च विकास दर का या ज्यादा से ज्यादा रोजगार का उसका दावा अभी तक पूरा होता हुआ नहीं दिखा है. कहा जा रहा है कि सरकार ने जिन मामलों में अच्छा काम किया भी, उसका भी जमीन पर ठोस प्रभाव दिखना अभी बाकी है. ऐसे में मोदी सरकार के मैक्सिमम गवर्नेंस यानी प्रभावी शासन के साथ-साथ मिनिमम गवर्नमेंट के वादे पर सवाल उठना लाजमी है. इससे आलोचकों के इस मूल्यांकन में दम लगने लगता है कि मोदी सरकार का ‘मिनिमम गवर्नेंस मैक्सिमम गवर्नमेंट’ का नारा भी एक जुमला ही था.