राजस्थान में राजपूत भारतीय जनता पार्टी के पारंपरिक वोटर माने जाते हैं. लेकिन हाल में समुदाय से ताल्लुक रखने वाले गैंगस्टर आनंदपाल के एनकाउंटर के बाद प्रदेश में हालात बदल से गए हैं. राजपूत संगठनों का आरोप है कि सरकार चाहती तो आनंदपाल जिंदा पकड़ा जा सकता था, लेकिन ऐसा होने की स्थिति में कई बड़े चेहरों के कच्चे चिठ्ठे खुलने का डर था इसलिए उसे मरवा दिया गया. प्रदेश से जुड़े राजनीतिकारों के अनुसार भाजपा जानती है कि प्रदेश में राजपूत समुदाय की नाराजगी के साथ विधानसभा चुनावों में पार लगना मुश्किल है. ऐसे में सूत्र कहते हैं कि पार्टी राजपूतों को मनाने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देना चाहती. राजस्थान से जुड़े हालिया तीन बड़े निर्णय भारतीय जनता पार्टी की उसी कवायद का हिस्सा बताए जा रहे हैं. इनमें पहला है केंद्रीय मंत्रिमंडल में जोधपुर सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत का चयन करना. दूसरा, एबीवीपी द्वारा राजस्थान विश्वविद्यालय में राजपूत छात्र को अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाना बताया जा रहा है और तीसरा निर्णय आनंदपाल के एनकाउंटर के तुरंत बाद राजपूत समुदाय से आने वाले अफसर को डीजीपी पद सौंपना.

घाटे का सौदा

इस बार के केंद्रीय मित्रीमंडल विस्तार को जानकारों ने मोदी सरकार का सबसे अजीबोगरीब विस्तार माना है जिसमें राजस्थान के जोधपुर से सांसद गजेंद्र सिंह शेखावत भी शामिल किए गए. 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में प्रदेश की सभी 25 सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में गिरी थीं. इनमें से चार सांसद राजपूत थे और आठ जाट समुदाय से ताल्लुक रखते थे. लेकिन इस कैबिनेट विस्तार में सरकार प्रदेश के दोनों प्रमुख समुदायों के प्रतिनिधित्व में संतुलन बनाए रखने में असफल रही है.

खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ के बाद गजेंद्र सिंह शेखावत केबिनेट में शामिल होने वाले प्रदेश के दूसरे राजपूत सांसद हैं. जबकि आठ सांसद होने के बावजूद जाटों की तरफ से सिर्फ एक सीआर चौधरी मौजूदा कैबिनेट में मंत्री हैं. इससे पहले अजमेर के दिवंगत सांसद सांवरलाल जाट भी केंद्रीय मंत्रीमंडल का हिस्सा थे. लेकिन लंबे समय तक अस्वस्थ रहने की वजह से उन्होंने अपना पद छोड़ दिया. तभी से कयास लगाए जा रहे थे कि सांवरलाल की खाली हुई जगह पर प्रदेश के ही किसी जाट नेता को मौका दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. सूत्रों की मानें तो इस बात से राजस्थान के जाट नेताओं समेत समुदाय के आम वोटर में भी भाजपा की प्रदेश और केंद्र सरकार के प्रति रोष की स्थिति है.

इसका एक बड़ा कारण यह भी है कि प्रदेश में जाट-राजपूत समुदायों के बीच आपसी अनबन की खबरें लंबे अरसे से सामने आती रही हैं. जानकार कहते हैं कि करीब दो दशक पहले तक इन दोनों समुदायों की राजनैतिक पसंद भी एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी. जहां राजपूत भाजपा के समर्थक थे वहीं जाट कांग्रेस के. लेकिन 1998-99 में कांग्रेस की तरफ से अशोक गहलोत का कई वरिष्ठ जाट नेताओं को पीछे छोड़ते हुए मुख्यमंत्री बनना पार्टी के प्रति समुदाय की नाराजगी का कारण बना और धीरे-धीरे बड़ी संख्या में जाट वोटर भाजपा की तरफ झुकने लगे.

लेकिन अब भाजपा शीर्ष नेतृत्व द्वारा गजेंद्र सिंह शेखावत को मंत्रीमंडल में चुने जाने के फैसले के बाद अंदरखाने जाटों के आक्रोश की खबरें सामने आ रही हैं. हालांकि सरकार के फैसले के समर्थन में कुछ जानकारों का कहना है कि भाजपा आलाकमान ने यह फैसला अगले विधानसभा चुनावों में प्रदेश कांग्रेस के दिग्गज नेता और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत पर दवाब बनाने के लिए लिया है जो शेखावत की ही तरह जोधपुर क्षेत्र से आते हैं. लेकिन प्रदेश के राजनीतिकारों की मानें तो सरकार समर्थकों का यह तर्क गले नहीं उतरता क्योंकि क्षेत्र के लोगों में गहलोत की गहरी पैठ है जिसमें सेंध लगाने में शेखावत को लंबा इंतजार करना पड़ सकता है. ऐसे में विशेषज्ञों की मानें तो गजेंद्र सिंह शेखावत को मंत्रिमंडल में जगह सिर्फ आनंदपाल एनकाउंटर से हुए डैमेज को कंट्रोल करने की कोशिश से ज्यादा कुछ और नज़र नहीं आती.

अब यदि बात राजस्थान में हाल ही में हुए छात्रसंघ चुनावों की करें तो जानकारों के मुताबिक सरकार ने राजपूत युवाओं को मनाने की कोशिश में प्रदेश के प्रमुख संस्थान राजस्थान विश्वविद्यालय (आरयू) में अपनी जमकर किरकरी करवाई है. दरअसल छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने इस बार आमराय के विपरीत जाते हुए लोकप्रिय छात्रनेता की बजाय राजपूत छात्र को अध्यक्ष पद के लिए अपना प्रत्याशी घोषित किया था. हालांकि एबीवीपी पदाधिकारी प्रत्याशी के चयन के समय जातिगत समीकरण और किसी तरह के सरकारी हस्तक्षेप से इनकार करते रहे हैं लेकिन सूत्रों की मानें तो इस बार राजपूत छात्र को टिकट देने के लिए संगठन पर प्रदेश सरकार का भारी दवाब था. नतीजतन एबीवीपी के पवन यादव ने बागी होकर चुनाव लड़ा और आरयू में बड़ी जीत हासिल की. यादव के साथ विद्यार्थी परिषद के और दूसरे बड़े चेहरे भी अपने ही संगठन के विरोध में उतर गए जो अन्य प्रमुख समुदायों से ताल्लुक रखते थे.

यदि राजस्थान में सरकार के तीसरे निर्णय की तरफ देखें तो कार्यकाल में छह महीने से कम समय रहने के बावजूद अजीत सिंह को प्रदेश का डीजीपी बनाया गया. हालांकि इस बारे में भाजपा समर्थकों का कहना था कि चूंकि सिंह ने आनंदपाल एनकाउंटर के बाद प्रदेश में पैदा हुए विवाद से निपटने में अहम भूमिका निभाई थी जिसे देखते हुए उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी गयी. उधर, विशेषज्ञों के मुताबिक इतने बड़े पद के लिए आमतौर पर सरकार की कोशिश रहती है कि किसी स्थाई चेहरे को स्थापित किया जाए. ऐसे में कम समय के लिए किसी अधिकारी को बड़ी जिम्मेदारी सौंपना भी एक समुदाय के तुष्टीकरण के तौर पर ही देखा गया.

प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार कहते हैं, ‘भाजपा चाहे जितनी कोशिश कर ले लेकिन राजपूतों का जो तबका आनंदपाल एनकाउंटर के चलते सरकार से नाराज है उसे मनाना मुश्किल होगा.’ उनके मुताबिक यही कारण था जो राजपूत छात्रों को एबीवीपी का टिकट मिलने के बावजूद प्रदेश के अलग अलग शहरों से समुदाय के युवाओं और नेताओं द्वारा विद्यार्थी परिषद के बहिष्कार की खबरें सामने आयी थीं. वे आगे कहते हैं, ‘राजपूतों के तुष्टीकरण के लिए भाजपा आउट ऑफ द वे जाकर जो बड़े फैसले ले रही है उससे दूसरे समुदायों में भी आक्रोश की स्थिति पैदा होने लगी है जिनमें जाट प्रमुख हैं. ऐसे में सरकार को चाहिए कि किसी अपराधी के एनकाउंटर के अपने फैसले पर अडिग रहे और सभी समुदायों के बीच संतुलन बनाए रखे, अन्यथा आनंदपाल के बाद हुए डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश में भाजपा अगले विधानसभा चुनावों में खुद का ज्यादा नुकसान करवा बैठेगी.’