2016-17 में दलहन का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ था. लेकिन यह खबर बताती है कि यह किसानों के लिए खुशी के बजाय दुख का सबब बन गया. वैश्विक क्रेडिट संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट की मानें तो बंपर पैदावार की वजह से दलहन उगाने वाले किसानों की आय में 16 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई. इसके उलट किसानों की फसल लागत 3.7 फीसदी बढ़ गई है.

क्रिसिल के मुताबिक बीते साल दालों का रिकॉर्ड उत्पादन करीब दो करोड़ 30 लाख टन रहा था. यह आंकड़ा साल 2015-16 की तुलना में 40 फीसदी अधिक है. इसके साथ 60 लाख टन दालों का आयात भी किया गया था.

बिजनेस स्टैंडर्ड के साथ बातचीत में क्रिसिल के मुख्य अर्थशास्त्री धर्मकीर्ति जोशी ने कहा, ‘दालों का मुद्दा बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि यह लोगों के घरेलू खर्च का पांच फीसदी है. बीते 12 वर्षों में दालों की कीमतों में औसतन 12 फीसदी बढ़ोतरी दर्ज की गई.’ उनका आगे कहना है, ‘दालों की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव से किसानों के साथ-साथ उपभोक्ता भी प्रभावित होते हैं. इस वक्त सरकार को इनकी कीमतों को सहज रखने के लिए खुली व्यापार नीति, प्रभावशाली न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) और अच्छी बाजार प्रणाली जैसे कदम उठाने चाहिए.’

केंद्र सरकार ने 2016-17 में दलहन से जुड़ी पांच फसलों के एमएसपी में औसतन 12 फीसदी की बढ़ोतरी की थी. हालांकि, इससे भी अधिकांश किसानों को राहत मिलती नहीं दिखी. क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक, महाराष्ट्र और तेलंगाना में तुअर और मूंग की बाजार कीमत तो इसकी एमएसपी से भी कम दर्ज की गई. बताया जाता है कि इसका प्रभाव इस साल दलहन फसलों की खेती पर पड़ा है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2017-18 में यह घटकर 13.76 मिलियन हेक्टेयर रह गया. बीते साल यह आंकड़ा 14.3 मिलियन हेक्टेयर था.