इन दिनों ‘बरेली की बर्फी’ और ‘शुभ मंगल सावधान’ में अपने उत्तम अभिनय से सबकी मनपसंद ‘फिल्मी मां’ बन चुकीं सीमा पाहवा की अभिनय-यात्रा जितना उनके संघर्षों को बयां करती है उतना ही हमारी फिल्म इंडस्ट्री के तौर-तरीकों की कलई भी खोलती है. वह इंडस्ट्री जिसमें मांओं के किरदार अब जहीन तरीके से लिखने लगभग बंद हो चुके हैं, लेकिन लगभग हर फिल्म में जब उनकी जरूरत पड़ती है तो सुगठित नायक और सुंदर नायिकाओं के लिए यह इंडस्ट्री केवल ‘गुड लुकिंग’ मांएं ही चुनती है! सीमा पाहवा लगभग अपने हर साक्षात्कार में इस नाइंसाफी का जिक्र करती हैं और बरसों की वेदना को हंसी में उड़ाने का अभिनय भी साथ-साथ करती हैं.

उनकी अभिनय यात्रा लेकिन समझा देती है कि रूप और रंग का भेदभाव सिर्फ नवाजुद्दीन सिद्दीकी के हिस्से नहीं आया. आज चमक रहीं सीमा पाहवा के हिस्से में भी अति का आया.

सीमा पाहवा की मां, सरोज भार्गव, अपने जमाने में ऑल इंडिया रेडियो और दूरदर्शन की जानी-मानी अदाकारा थीं, जिस वजह से छोटी उम्र से ही सीमा आकाशवाणी और दूरदर्शन में काम करने लगीं. बच्चों के लिए बनने वाले कार्यक्रमों में कभी उन्हें लड़की बनाया जाता तो कभी लड़का और याद रखिए कि ये उस सत्तर के दशक की बात है जब हिंदुस्तान में टेलीविजन स्थापित हो ही रहा था. सीमा पाहवा (तब भार्गव) ने टेलीविजन के इस स्थापना-काल को बतौर व्यस्त बाल कलाकार बेहद नजदीक से देखा और किशोरावस्था आते-आते हिंदुस्तान के पहले धारावाहिक ‘हम लोग’ में काम किया.

1984 में दूरदर्शन पर प्रसारित हुए ‘हम लोग’ में सीमा घर की बड़ी लड़की ‘बड़की’ बनीं और धारावाहिक व बाकी पात्रों की ही तरह इतनी मशहूर हुईं कि न सिर्फ चाहने वाले उनके घर चिट्ठियां भेजा करते, बल्कि जब धारावाहिक में बड़की की शादी तय होने की बातें होने लगीं, तब टीवी से लेकर फ्रिज तक उनके घर पहुंचने लगे.

1986 में ‘हम लोग’ खत्म होने के बाद सीमा ने वापस थियेटर का रुख किया और दिल्ली स्थित एनएसडी की रेपेटरी कंपनी के नाटकों में अभिनय करना शुरू कर दिया. यहीं पर मनोज पाहवा (‘ऑफिस ऑफिस’ वाले भाटिया) से प्यार और फिर शादी हुई और फिल्मों में भविष्य बनाने के लिए दोनों सन् 1994 में मुंबई चले आए. लेकिन ‘हम लोग’ खत्म होने के 12 साल बाद तक सीमा पाहवा को कोई काम नहीं मिला. घर को टेलीविजन में काम करके पति मनोज ने चलाया और सीमा को एक बहुत लंबे अरसे तक उनके रंग और रूप की वजह से टीवी और फिल्मों ने खुद से दूर रखा. एक साक्षात्कार में वे बताती हैं, ‘इन 12 सालों में मैंने खुद को बार-बार टटोला कि आखिर वजह क्या रही. कमी कहां रह गई? ऐसे वक्त में मुझे थियेटर ने ही जिंदा रखा. मैं लगातार नाटक लिखती रही और घर में मूर्तियां बनाती रही. कई तरह के क्रिएटिव कामों में खुद को उलझाए रखा वरना डिप्रेशन तो तय था.’

लेकिन 12 साल बाद भी उन्हें श्याम बेनेगल की ‘हरी-भरी’(2000) और ‘जुबैदा’ (2001) जैसी दो-चार फिल्मों में छोटे रोल ही मिले और वापस टेलीविजन की शरण में उन्हें आना पड़ा. तब तक टेलीविजन का एकता कपूर युग शुरू हो चुका था (जैसे कि किस्से-कहानियों में कलयुग शुरू होता है) और सीमा पाहवा को ‘अस्तित्व...एक प्रेम कथा’ तथा ‘कसम से’ जैसे तीन-तीन साल चलने वाले धारावाहिकों में साधारण स्तर के छोटे और गैरमामूली किरदारों से संतुष्ट होना पड़ा.

इस बीच थियेटर चलता रहा, जैसे कि वो आज भी चल रहा है, और बच्चों का लालन-पालन करने के लिए सीमा ने नया काम हासिल करने की कोशिशें कम कर दीं. नसीरुद्दीन शाह उन्हें एक बार ‘हम लोग’ वाली छुटकी की शादी में मिले (लवलीन मिश्रा) और अपने नाटक ‘कथा कोलाज’ में मां का रोल निभाने को कहा. ये बात 2003 की है, और तब से लेकर सीमा पाहवा न सिर्फ अपनी बेटी द्वारा स्थापित कोपल थियेटर ग्रुप के लिए कई नाटकों में अभिनय करने के साथ-साथ निर्देशन भी कर चुकी हैं बल्कि भीष्म साहनी की कहानियों से अपने लगाव को भीष्मोत्सव नामक नाटक महोत्सव का रूप भी दे चुकी हैं. उनकी एक एकल प्रस्तुति ‘साग मीट’ खासतौर पर बेहद पसंद की जाती है, जिसमें वे जिस भी शहर जाकर मंचन करें, मंच पर खुद साग-मीट पकाती हैं और नाटक खत्म हो जाने के बाद इसे दर्शकों में बांटती हैं. ‘चटनी’ नामक शॉर्ट फिल्म शायद याद हो आपको, वह भी भीष्म साहनी की लिखी इसी कहानी पर आधारित थी.

2012 आते-आते किस्मत से सीमा पाहवा को विधु विनोद चोपड़ा निर्मित ‘फरारी की सवारी’ में छोटा-सा रोल मिला. फिर से. फिल्म नहीं चली लेकिन सीमा को उनकी फरारी दो साल बाद तब मिली जब ‘आंखों देखी’ रिलीज हुई और दर्शकों ने न सिर्फ खुली आंखों से संजय मिश्रा का अभिभूत करने वाला अभिनय देखा बल्कि सदैव कोसने मगर लाड़ बरसाने वाली अम्मा के रोल में सीमा पाहवा का अभिनय भी वे भुला नहीं पाए. 2015 में ‘दम लगा के हईशा’ ने भारी-भरकम नायिका की चिंतित मां के किरदार में उन्हें हमेशा के लिए लोगों की याद में बिठा दिया और जो रंग व रूप अब तक उनके आड़े आता था, अब वही उनका हथियार बन गया. मां व पत्नी जैसे जल्द स्टीरियोटाइप होने वाले किरदारों में सिमटी होने के बावजूद उन्होंने इन किरदारों को अपने अभिनय कौशल से यादगार बनाना शुरू कर दिया और दर्शकों ने फिल्म इंडस्ट्री की तंग मानसिकता को गलत साबित करना शुरू कर दिया.

जब पूछा जाएगा तो सिनेमा का इतिहास कहेगा कि मुंबईया फिल्म इंडस्ट्री में नवाज को स्थापित होने में बहुत वक्त लगा. लेकिन सीमा पाहवा को तो बहुत ज्यादा वक्त लगा.

ऐसा मुमकिन इसलिए भी हुआ क्योंकि बॉलीवुड छोटे शहरों की तरफ लौटने लगा और उसने वहां की मध्यमवर्गीय कहानियों को यथार्थवादी किरदार देने वापस शुरू कर दिए. संपूर्ण परिवार को तवज्जो देने वाला सामान्य मध्यम वर्ग का जो सिनेमा सई परांजपे, सईद मिर्जा, बासु चटर्जी और ऋषिकेश मुखर्जी की फिल्मों में नजर आता था, वैसा ही आनंद एल राय, रजत कपूर, शरत कटारिया और अश्विनी अय्यर तिवारी जैसे निर्देशकों की कमर्शियल फिल्मों में लौटने लगा. और ‘हम लोग’ करने के 31 साल बाद तथा 49 साल तक अभिनय को तराशने-संभालने के बाद, 2017 में सीमा पाहवा को ‘बरेली की बर्फी’ और ‘शुभ मंगल सावधान’ने शोहरत की उन बुलंदियों तक पहुंचाया जिनकी हकदार वे दशकों से थीं.

इस शोहरत की और अच्छी फिल्मों की उनसे यारी, उम्मीद करते हैं, हमेशा बनी रहेगी.