गौरी लंकेश की हत्या एक और हत्या भर नहीं है, वह एक साथ एक निर्भीक, दुस्साहसी पत्रकार, हिन्दुत्व के वर्चस्व के विरुद्ध एक मुखर व्यक्ति, एक स्त्री और एक कवि-पत्रकार की बेटी की हत्या है. यह एक क्रमिक हत्या भी है. पहले तीन बुद्धिजीवी असहमत व्यक्तियों की हत्या के क्रम में और उसी कर्नाटक में, जहां कलबुर्गी मारे गए थे और जिनके हत्यारों पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है. इस हत्या के पीछे कौन है यह अभी पता नहीं चला है, पर जो सुराग और सुबूत मिले हैं उनसे ज़ाहिर है कि वे ही लोग और शक्तियां होंगी जिन्होंने बाक़ी तीन की हत्या के सफल षड्यंत्र किए.

हत्या इस समय राजनैतिक प्रतिकार का नया और अनिवार्य उपकरण बन चुका है. चूंकि असहमति से तर्कों और तथ्यों के आधार पर निपटा नहीं जा सकता, चरित्र-हत्या करो और वह भी काफ़ी न साबित हो तो भौतिक हत्या ही कर दो. अब तो सरकारी आंकड़े ही यह बता रहे हैं कि आतंकवादी हिंसा में कमी आई है पर भारत में साम्प्रदायिक हिंसा बढ़ी है. कर्नाटक की ढुलमुल कांग्रेसी सरकार और महाराष्ट्र की भाजपा सरकार आज तक हत्यारों का पता नहीं लगा पाई है, उन्हें सज़ा देना तो दूर, उनमें से किसी पर अभियोजन तक नहीं लगा है. इसलिये आरंभिक सख़्त निन्दा, कड़े उपाय करने की घोषणाओं आदि के बाद हस्बेमामूल (हमेशा की तरह) दबे-छुपे हत्यारों को किसी तरह बचाने का उपक्रम शुरू हो जाएगा. असहमति इस माहौल में अक्षम्य अपराध है और उसका परिणाम खुलेआम हत्या है.

गौरी लंकेश की हत्या के बारे में एक हिन्दी अख़बार ने पहले पृष्ठ पर बड़ी ख़बर छापी और अन्दर एक आध्यात्मिक गुरु से इंटरव्यू छापा जिसमें इस वरेण्य विभूति ने कहा कि उन्हें देश में कहीं असहिष्णुता नहीं मिली या दिखाई देती है. राजनीति, धर्म, अध्यात्म, सत्ता, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि को असहिष्णुता नज़र नहीं आती. ऐसी हत्याएं भी उनके हिसाब में नहीं हैं. ऐसी अमानवीय अनदेखी-अनसुनी हमारे लोकतांत्रिक इतिहास में लगभग अभूतपूर्व है.

बरसों पहले एक बार गौरी लंकेश के पिता लंकेश जी से बेंगलुरू में लम्बी भेंट हुई थी. शायद गौरी से भी पल भर की भेंट हुई थी ‘लंकेश पत्रिके’ के दफ़्तर में वे हमारे अन्य मित्रों जैसे यू आर अनन्तमूर्ति ओर गिरीश कर्नाड आदि से कई मुद्दों पर घोर असहमति रखते थे और उनके बीच विवाद होते रहते थे. उनका अख़बार सख़्त आलोचक स्वर अपनाता था. वे भारत भवन में एक कवितासमारोह में भाग लेने आए भी थे.

यह समय निरुपाय, निर्विकल्प, निष्क्रिय, होने का समय नहीं हैं. साहित्य और कलाओं को ऐसे अंधेरे समय में साहस और सम्भावना की, आत्मालोचन और अन्तःकरण की, प्रतिरोध और प्रतिकार की दीपशिखाएं जलाये रखना है. हम हमेशा से उम्मीद का स्थापत्य गढ़ते रहे हैं और उससे हमें किसी भी हालत में उदासीन या विरत नहीं होना चाहिए. हम रचेंगे तभी बचेंगे. हम न भी हों तब भी हमारा किया बचा रहेगा और नाउम्मीद मुक़ामों पर उम्मीद की याद और सम्भावना दृश्य पर लाता रहेगा.

निजता

निज शब्द हिन्दी में ‘पर्सनल’ और ‘प्राइवेट’ दोनों के लिए इस्तेमाल होता है, हालांकि दोनों में अन्तर है. हाल ही में बावजूद भारत सरकार के इस कानूनी दावे के कि निजता हमारे संविधान के अन्तर्गत मौलिक अधिकारों में नहीं है, सर्वोच्च न्यायालय ने यह फैसला सुनाया है कि निजता का अधिकार है और वह संवैधानिक अर्थ में मौलिक अधिकार है. अलबत्ता, जैसे कि किसी भी मौलिक अधिकार की, वैसे ही इस अधिकार को भी तर्कसंगत आधार पर सीमित किया जा सकता है. एक अंग्रेज़ी अख़बार की अगले दिन सुर्खी थी, ‘सुप्रीम कोर्ट गिफ्ट्स अस प्राइवेसी’. इस फैसले के पहले न्यायालय ने तीन बार में तलाक को गैर-संवैधानिक घोषित किया है. ये दोनों ही ऐसे फैसले हैं जिनके दूरगामी परिणाम होने जा रहे हैं.

वर्तमान सत्ता लगातार सुनियोजित ढंग से व्यक्ति की गरिमा, अभिव्यक्ति की आज़ादी, अल्पसंख्यकों की खाने-पीने की आज़ादी सीमित-बाधित करने, बाज़ार के दबाव में किसी भी नागरिक के सारे निजी ब्यौरे अपने पास रखने और उन्हें जब-तब लीक होने देने का उपक्रम करती नज़र आती है. कई बार वह सीधे ऐसा न भी करे, पर वह ऐसे समूहों को बढ़ावा देती है जो इसको लेकर हंगामा करते हैं और वह उनकी गैर-कानूनी कार्रवाइयों पर निष्क्रियता और उदासीनता बरतती है. कुछ दिन पहले ही आंकड़े आए हैं कि हरियाणा की वर्तमान सत्ता के कार्यकाल में सबसे अधिकार हिंसा की घटनाएं हुई हैं लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार है जैसे कि गुजरात दंगों में हुए नरसंहार में राज्य की स्पष्ट शिरकत और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में विफलता के बाद भी तब के मुख्यमंत्री की कुर्सी बरकरार रही थी.

निजता के मामले में भी इस सरकार का रुख परस्पर विरोधी रहा है. उसकी ओर से यह दलील दी गई थी कि निजता का कानूनन कोई अधिकार नहीं होता और न्यायालय के फैसले के बाद यह सरकार उसका श्रेय ले रही है. सच तो यह है कि सत्तारूढ़ शक्तियां नागरिकता का कोई सम्मान नहीं करती हैं और उसे सीमित करने में प्राणपण से जुटी हुई हैं. ऐसे मामलों में जिस तरह से दोमुंहेपन और वाग्पाखण्ड का सहारा लिया जा रहा है वह भारत के सार्वजनिक जीवन में अभूतपूर्व है.

एक दूसरा पक्ष भी है. हम जैसे ‘देशद्रोही’ कवि-आलोचक कई दशकों से साहित्य में सामाजिक यथार्थ द्वारा निजता को दे दिए गए देशनिकाले के विरुद्ध निजता की रक्षा और पुनर्वास के लिए संघर्ष करते रहे हैं. एक आकलन यह भी करना चाहिए कि साहित्य और विचार में समाजहित के नाम पर निजता पर कितने आक्रमण हुए हैं और कैसे निजता को साहित्य में हाशिये पर ढकेला गया है. निजता साहित्य में गायब तो नहीं हुई पर व्यापक विचार-विमर्श में उसे संदिग्ध मान लिया गया. इसके बावजूद हमारे समय के बड़े लेखकों में निजता और सामाजिकता दोनों को समान रूप से साधा जाता रहा. दुर्भाग्य से उनके आकलन या विश्लेषण में निजता को अक्सर हिसाब में नहीं लिया गया. मुक्तिबोध को इस कदर सामाजिक मान लिया गया कि उनके दृढ़ व्यक्तित्व की अवहेलना हुई और अज्ञेय को इतना निजी बता दिया गया कि उनकी सामाजिकता को दुर्लक्ष्य किया गया.

आयोजन की मुश्किलें

जितने साहित्यिक-कलात्मक आयोजन मैंने किए हैं उतने शायद ही किसी और लेखक ने किए होंगे. उनकी संख्या अब तक दो हज़ार तक पहुंच रही होगी. एक जर्मन शोधकर्ता के अनुसार वह 1992 में ही एक हज़ार से अधिक हो चुकी थी. यों तो आयोजन करने की आदत ही पड़ चुकी है लेकिन उसकी मुश्किलें कभी कम नहीं होतीं. हर बार उत्सुकता बनी रहती है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए. श्रोता या दर्शक पर्याप्त संख्या में न आएं, आमंत्रित लेखक-कलाकार-विशेषज्ञ समय पर आने से चूक जाएं, कोई जुलूस-रैली, प्राकृतिक आपदा, बारिश आदि रास्ता न रोक लें. ऐन वक्त पर बिजली न चली जाए, माइक खांसने-खखारने न लगे आदि.

ऐसे आयोजनों में शिकायत करने वालों की कमी नहीं होती. किसी को डाक या कुरियर से भेजा निमंत्रण नहीं मिलता, किसी को ईमेल पर खबर नहीं पहुंचती, कोई कहता है कि पहले आपके सन्देश आते थे अब नहीं आते आदि. जिस समय आप आयोजन करते हैं ठीक उसी दिन उसी समय दिल्ली जैसे शहर में और कई आयोजन हो रहे होते हैं. उनका प्रलोभन आपके संभावित श्रोता-दर्शक को कहीं और ले जा सकता है. इन सब आशंकाओं के बावजूद आप अपना मनोबल बनाए रखते हैं, किसी तरह और अपना तनाव ज़ाहिर नहीं होने देते.

जो लोग कृपापूर्वक श्रोता-दर्शक के रूप में ऐसे आयोजनों में आते हैं, उनमें से कइयों के पास समय और धीरज की कमी होती है. इसलिए रचना, कलाकृति, विचार आदि के रसास्वादन के लिए उनके पास अधिक फुरसत नहीं होती. कई बार तो कहीं और जाते हुए थोड़ी देर के लिए आपके आयोजन की शोभा बढ़ाने आ जाते हैं. आजकल बेवजह सबको जल्दी जाने की दरकार होती है. आप जिसे इतने जतन से आयोजित करते हैं वह उनके सामने खास ध्यान देने लायक नहीं होता भले ही कितने ही चिकने-चुपड़े पढ़े-लिखे क्यों न हों.

समय की पाबन्दी भारतीय दुर्गण या कमज़ोरी नहीं है. समय पर कुछ शुरू करना दिन-ब-दिन कठिन से कठिनतर होता जाता है. वक्ता ही हो सकता है समय पर न पहुंचे. ऐसे लोग है जिन्हें दूसरों को प्रतीक्षा करने देना अच्छा और उचित लगता है. आयोजक के रूप में आप कुछ क्षमायाची भाव चेहरे पर चिपकाए प्रतीक्षा करते हैं कभी कि वक्ता आ जाए, कभी कि पर्याप्त श्रोता या दर्शक आ जाएं. ऐसा भी हुआ है कि कभी-कभार काफी संख्या में लोग जुट जाने से कोई कार्यक्रम समय से पहले शुरू करना उचित लगा. तो दो-चार जो बाद में आए और जिन्हें सीट नहीं मिली वे शिकायत करते भये.

शायद भारत ही ऐसा महादेश है जहां कितना ही सुनियोजित और उच्चस्तरीय आयोजन हो उसे अक्सर दर्शकों या श्रोताओं की प्रतीक्षा करना पड़ती है, जबकि ये अधिकांश आयोजन निःशुल्क होते हैं. चाय-समोसे मुफ्त में मिलते हैं जो अलग. कुछ मित्र ऐसे भी हैं जो स्वयं कभी कोई आयोजन नहीं करते या कर पाते पर किसी आयोजन का बहिष्कार करने की मुहीम चलाते हैं और उसका वैचारिक औचित्य भी गढ़ लेते हैं. श्रीकान्त वर्मा की पंक्ति उन पर व्यंग की तरह चस्पां की जा सकती हैः ‘जो मुझसे नहीं हुआ/ मेरा संसार नहीं’.