पिछले दिनों हुए रेल हादसों ने देश को इस कदर हिला कर रख दिया कि आख़िरकार सुरेश प्रभु की रेल मंत्रालय से छुट्टी हो गयी. पीयूष गोयल की नियुक्ति क्या रंग दिखाएगी, यह तो भविष्य ही बताएगा पर आज रेल से जुड़े इतिहास की बात करते हैं. भारतीय रेल के दो चेहरे दिखाते हैं जो बताते हैं कि अंग्रेजों द्वारा बनाई गई भारतीय रेल उपनिवेशवाद के साथ-साथ जवाबदेही का भी उदाहरण थी. वह जवाबदेही जो आज के हालात में दूर-दूर तक नजर नहीं आती.

भारतीय रेल और उपनिवेशवाद

भारतीय रेल को अंग्रेजों की देश को सबसे बड़ी सौगात के तौर पर बताया जाता रहा है. लेकिन भारत में ब्रिटिश राज पर लिखी क़िताब ‘एन एरा ऑफ़ डार्कनेस’ में शशि थरूर यह मिथक तोड़ते हैं कि अंग्रेजों ने इसे हिन्दुस्तानी लोगों के लिए बनवाया था. उनके मुताबिक़ ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपनी सेना के स्थानान्तरण और व्यापारिक सामानों के आवागमन के मद्देनज़र इसका निर्माण करवाया था.

1843 में तत्कालीन गवर्नर जनरल हार्डिंग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, ‘रेल हिंदुस्तान में ब्रिटिश व्यापार, सरकार और सेना और इस देश पर मज़बूत पकड़ के लिए सहायक होगी.’ बाद में डलहौज़ी ने इसकी पैरवी करते हुए कहा था कि इससे ब्रिटिश उत्पादों को पूरा हिंदुस्तान मिल जाएगा और खनिजों को बंदरगाह तक लाया जा सकेगा जहां से उन्हें इंग्लैंड भेजा जाएगा. तब ईस्ट इंडिया कंपनी ने इंग्लैंड में निविदाएं जारी करके निवेशकों को इसकी तरफ आकर्षित किया था. लिहाज़ा, इसका निर्माण भी काफ़ी ऊंची कीमत पर हुआ.

बीसवीं शताब्दी की शरुआत में दुनिया भर में दो तरह का स्टील इस्तेमाल में लाया जाता था. एक ब्रिटिश मानक द्वारा सत्यापित स्टील और दूसरा ग़ैर ब्रिटिश मानक सत्यापित. ब्रिटिश मानक स्टील महंगा होता था. अंग्रेजों ने इसी स्टील को भारत में रेल की पटरियों के लिए पास करवा लिया था. इसका एक नतीजा यह हुआ कि टाटा स्टील जैसी कंपनियों का सस्ता स्टील काम में नहीं लाया जा सका.

मशहूर लेखक गुरचरण दास अपनी किताब ‘उन्मुक्त भारत’ में लिखते हैं कि निर्माण की लागत काफ़ी ऊंची रखी गयी थी क्योंकि जो ब्रिटिश कंपनियां इसमें निवेश कर रही थीं उन्हें रकम की निश्चित अदायगी के साथ पांच प्रतिशत का ब्याज देना भी तय किया गया था. इसलिए इन कंपनियों को कीमत की कोई परवाह नहीं थी और उन्होंने इसे बड़े ही लापरवाह और शाही अंदाज़ में बनाया. पटरी बिछाने में ज़रा सी भी ख़ामी आती तो उसे पूरा उखाड़कर नया बनाया जाता. स्टेशनों को बनाने में ज़रुरत से ज़्यादा ख़र्च किया गया और अंग्रेज़ यात्रियों के लिए उच्च दर्जे के रेल के कूपे बनाये गए.

‘एन एरा ऑफ़ डार्कनेस’ में शशि थरूर लिखते हैं, ‘ज़्यादा ख़र्च करने पर ब्रिटिश कंपनियों को ज़्यादा मुनाफा होता. 1850 से 1860 के बीच प्रति मील रेल की पटरी बिछाने की लागत तकरीबन 18 हज़ार पौंड थी. वहीं अमेरिका में यह आंकड़ा मात्र दो हज़ार पौंड था.’ थरूर इसे तब का सबसे बड़ा घोटाला करार देते हैं. सारा मुनाफ़ा अंग्रेजों का और इसकी भरपाई भारतीय टैक्स देनदारों से हो रही थी. चूंकि ग़ैर ब्रिटिश मानक स्टील इस्तेमाल में नहीं लिया जा सकता था, लिहाज़ा, पटरी से लेकर डिब्बों तक सब इंग्लैंड से मंगवाया गया.

इतिहासकार विल दुरैंट भारतीय रेल का एक और आश्चर्यजनक पहलु खोलते हैं. उनके मुताबिक रेल का मकसद ब्रिटेन की सेना और उसके व्यापार को फ़ायदा पहुंचाना था, पर रेल को सबसे ज़्यादा आय अपने तीसरे दर्जे के डिब्बों में हिंदुस्तानियों के सफ़र करने से होती थी जिनमें आदमी भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिए जाते थे. उनके लिए कोई सहूलियतें नहीं दी जाती थीं.

अंततः, रेलों के ज़रिये इंग्लैंड में बनाये गए सामानों की आवाजाही शुरू हो गयी. भारतीय कामगारों के उत्पाद इंग्लैंड के उत्पादों से टक्कर नहीं ले पाए और धीरे-धीरे घरेलु उद्योग बंद होने लग गए. तब एक बांग्ला अखबार में छपे लेख में कहा गया था कि ये लोहे की पटरियां नहीं बल्कि ज़ंजीरें हैं जिन्होंने भारतीय उद्ध्योग ठप्प कर दिए. दादा भाई नौरोजी ने भी अपनी किताब ‘पॉवर्टी एंड अनब्रिटिश रूल इन इंडिया’ में रेल से हिंदुस्तान को कम और अंग्रेजों को ज़्यादा फ़ायदा होने की बात कही है.

महात्मा गांधी ने अपनी किताब ‘स्वराज’ में रेल को बंगाल में फैली प्लेग की महामारी के लिए ज़िम्मेदार माना था. बंगाल में जब रेल निर्माण किया गया तो गंगा और उसकी सहायक नदियों के पानी को जगह-जगह रोका गया. इससे खेती पर ज़बरदस्त असर पड़ा और अनाज की पैदावार कम हुई. 1918 में बंगाल में आई बाढ़ का कहर रेल की वजह से कई गुना हो गया था.

जवाबदेही की दो मिसालें

हालांकि इसके इतर भारतीय रेल के इतिहास को कुछ अच्छी बातों के संदर्भ में भी याद किया जा सकता है. हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में एक छोटा सा पर खूबसूरत हिल स्टेशन है जिसका नाम है बड़ोग. 1905 में बनी शिमला-कालका रेल लाइन, तब भी और आज भी, इंजीनियरिंग का शानदार नमूना है. इस रेल लाइन पर कुल 107 छोटे-बड़ी सुरंगें हैं. इनमें से 33 नंबर की सुरंग का अपना अलग किस्सा है. यह तबकी सबसे लंबी सुरंगों में से एक थी. करीब डेढ़ किलोमीटर इस लंबी सुरंग को बनाने का ज़िम्मा ब्रिटिश इंजीनियर कर्नल बड़ोग को दिया गया था. उन्होंने काम को जल्दी ख़त्म करने के लिहाज़ से फ़ैसला लिया कि पहाड़ के दोनों सिरों से सुरंग खोदने का काम शुरू किया जाए और बीच में उन्हें मिला दिया जाए. दोनों सिरों पर लगे कारीगर इंजिनियर बड़ोग की गणतीय गणना के आधार पर सुरंग खोदते गए. पर दोनों सिरे बीच में नहीं मिले. गणना में कुछ भूल हो गयी थी! बड़ोग और कारीगर बेहद हताश हो गए क्योंकि उनकी मेहनत बेकार हो गयी थी.

ब्रिटिश सरकार को यह बात नागवार गुजरी. उसने कर्नल बड़ोग पर तब एक रुपये का जुर्माना लगा दिया. इंजीनियर जो पहले ही अपनी ग़लती पर पछता रहा था, उसे यह अपना अपमान लगा. एक दिन सुबह सैर करने के बहाने वह घर से निकला और खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली. बाद में इंजीनियर हर्लिंगटन ने एक साधु भाल्कू की मदद से दूसरी सुरंग का निर्माण किया. कर्नल बड़ोग को सम्मानित करने के लिए सुरंग नंबर 33 को उनके नाम पर रखा गया.

एक और किस्सा है. उत्तर प्रदेश का जौनपुर जिला पांच नदियों से सिंचित है. इन नदियों पर मुगल काल के शाही ब्रिज से लेकर ब्रिटिश काल के कर्ज़न पुल और बाद में बने कई सारे पुल हैं. इनमें से एक पुल है जिसका निर्माण तकरीबन 1904 में एक ब्रिटिश कंपनी के हाथों हुआ था. कॉन्ट्रैक्ट की शर्तों के मुताबिक़ निश्चित समयावधि पर उस कंपनी के इंजीनियर को जौनपुर जाकर उस पुल की जांच पड़ताल करनी होती था.

कंपनी ने हिंदुस्तान के आज़ाद होने के बाद भी अपनी ज़िम्मेदारी निभायी. यहां आकर उसके इंजीनियर पुल की पड़ताल करते और अपनी रिपोर्ट पेश करते. कुछ साल पहले उस कंपनी ने भारतीय सरकार को पत्र लिखकर सूचित किया कि उसके द्वारा बनाये गए पुल की मियाद अब पूरी हो गयी है लिहाज़ा उसे गिराकर नया बना दिया जाए. और यह भी कि कॉन्ट्रैक्ट की शर्त के मुताबिक़ कंपनी अब इस ज़िम्मेदारी से मुक्त होती है.

इसके बाद भारतीय रेल मंत्रालय ने उस पुल को गिराकर नया पुल बनाने का काम शुरू किया. बताते हैं कि जब मशीनें उस पुल को गिरा रही थीं तो इंजीनियर खंभों की मज़बूती देखकर हैरान हो गए. ईंट के बने खंभों पर मशीनों से प्रहार करने पर उनमें से चिंगारियां फूट रही थीं. यह देखकर एक इंजीनियर ने अपने अफसर से कहा, ‘सर अब विकसित तकनीक होने बाद भी क्या हम इतना मज़बूत पुल बना पाएंगे?’ आज निश्चित ही देश को भारतीय रेल से इस तरह की जवाबदेही की ज़रूरत है.

कुछ पुल कमज़ोर हो गए हैं. कुछ पटरियां मज़बूत होनी बाकी हैं. डर तब लगता है जब ठेकेदार पटरियों को मज़बूती देने के लिए पत्थरों की गिट्टियां भी तयशुदा मानकों से कम डालते हैं. उम्मीद है पीयूष गोयल बुलेट ट्रेन से ज़्यादा इस और ध्यान देंगे.