गुरमीत राम रहीम सिंह की गिरफ्तारी के बाद उसके समर्थकों ने इतने बड़े पैमाने पर हिंसा कर डाली. क्या इसे रोकने के लिए आपकी कोई तैयारी नहीं थी?

मैंने हिंसा रोकने की नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था के दायरे में हिंसा हो सके इसकी तैयारी की थी!...अब्ब्ब... मेरा मतलब कि वे लोग और भी बड़े पैमाने पर हिंसा करना चाहते थे पर हमारी चाक-चौबंद सुरक्षा के कारण उनके इरादे विफल रहे. हम अपनी कार्रवाई से संतुष्ट हैं.

आप ऐसा कैसे कह सकते हैं? आखिर उस हिंसा में लगभग 40 लोग मारे गए और 250 से ज्यादा घायल हुए हैं.

गुरमीत सिंह जितने लोगों को मरवा के चुपचाप दफना चुका है उसके मुकाबले यह संख्या कुछ भी नहीं है! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि हमने मरने वालों की संख्या को आधा सैकड़ा तक भी नहीं पहुंचने दिया, क्या यह संतुष्टी की बात नहीं है!

लेकिन सवाल तो यह है कि धारा 144 लागू होने के बावजूद आखिर इतने सारे लोग पंचकुला में इकट्ठे कैसे हो गए?

यह सब झूठ है, कहीं कोई भीड़ पहले से जमा नहीं हुई थी. वे सब बाबा के चमत्कार से वहां अचानक प्रकट हो गए थे. हम शहर में धारा 144 लगा सकते हैं, बाबा के चमत्कारों पर नहीं.

क्या आपने गुरमीत सिंह से अपने भक्तों को शांत रहने की अपील करने को नहीं कहा था?

बिल्कुल कहा था...पर जब भक्त प्रधानमंत्री तक की नहीं सुन रहे, तो राम रहीम और खट्टर किस खेत की मूली हैं! आजकल के भक्त गुरुओं के हाथ से निकल चुके हैं. गुरमीत सिंह ने तो फेसबुक पर अपने भक्तों से शांति बनाए रखने की अपील की थी, लेकिन हमने इंटरनेट सेवा बंद की हुई थी सो उसका मैसेज लोगों तक पहुंचा ही नहीं... (धीमी आवाज में) वैसे गुरमीत बड़ा ही तेज बाबा है. अदालत में सजा की खबर को भक्तों तक पहुंचाने के लिए तो उसने बेहद पुराना घिसा-पिटा तरीका अपनाया और ‘कपड़ों का बैग लाने’ को कहा. ‘कपड़ों का बैग मंगवाना’ उसके भक्तों के लिए एक गुप्त कोड था, यह इशारा था कि अब वे बलवा शुरू कर दें. मतलब कि अशांति फैलाने के लिए उसने सबसे प्रचलित और आसानी से समझ में आने वाला कोड प्रयोग किया, लेकिन शांति बनाए रखने का मैसेज फेसबुक पर लिखा...जबकि उसे पता है कि उसके भक्तों में से ज्यादातर फेसबुक के खिलाड़ी नहीं हैं.

सुनने में तो यह भी आ रहा है कि आपने ही गुरमीत सिंह के भक्तों को शक्ति प्रदर्शन की अनुमति दी थी?

शक्ति प्रदर्शन की अनुमति देने वाला मैं कौन होता हूं, यह तो हमारे संविधान ने ही दे रखी है! जब संविधान किसी नागरिक में कोई फर्क नहीं करता तो भला हम यह फर्क करने वाले कौन होते हैं.

कैसा फर्क?

यही कि विधायकों और सांसदों को तो शक्ति प्रदर्शन करने का हक है लेकिन बाबाओं को नहीं!... हमारे सत्ता में बैठने का मतलब यह बिल्कुल भी नहीं कि हम तो विधान सभा से लेकर संसद तक में जब-तब शक्ति प्रदर्शन करते फिरें लेकिन बाबाओं से सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करने का भी बुनियादी अधिकार छीन लें!

जाट आंदोलन और गुरमीत सिंह को सजा, इन दोनों ही मौकों पर आप राज्य में भारी हिंसा होने से नहीं रोक सके. क्या यह आपकी विफलता नहीं है?

हमारे देश में हिंसा विफलता का नहीं सफलता का पैमाना है. यदि ज्यादा हिंसा विफलता का पैमाना होती तो क्या मोदी जी आज प्रधानमंत्री होते?...अब्ब्ब...मेरे कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि हिंसा और अहिंसा दोनों ही राजनीति के दो सिक्के हैं और टॉस में हमेशा न हेड आता है और न टेल.

लेकिन विपक्ष तो इस हिंसा के मुद्दे पर आपसे इस्तीफा मांग रहा है.

विपक्ष! इस देश में विपक्ष बचा है क्या? (मजाक उड़ाने के लहजे में हंसते हुए) और जो बचा-खुचा है उसे भी तो करने को कुछ चाहिए न...काम तो सारे सरकार करती है, अब अगर विपक्ष इस्तीफा मांगने का भी काम न करे तो जनता का मनोरंजन कैसे होगा! (हंसते हुए)

क्या ऐसा नहीं लगता कि आपकी प्रशासनिक अनुभवहीनता कामकाज संभालने में बड़ी बाधा बन रही है?

कैसी अनुभवहीनता...मुझे दुकानदारी का बहुत अनुभव है. मैंने सदर में सालों दुकान संभाली है.

खट्टर जी, मैं दुकानदारी की नहीं बतौर मुख्यमंत्री आपके कामकाज की बात कर रही हूं!

अरे आप समझ नहीं रहीं, राजनीति एक किस्म का व्यापार ही तो है...और जिसने दुकानदारी के बुनियादी गुर सीख लिये, समझो वो बड़े से बड़ा व्यापार बखूबी संभाल लेगा. मैं खट्टर हूं, मुझे खटारा मत समझिये!

विभाजन पूर्व आपके पिता पाकिस्तान में ही रहते थे. यानी यह कहना गलत नहीं होगा कि आपकी जड़ें पाकिस्तान में हैं. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य होने के नाते पाकिस्तान में अपनी जड़ें महसूस करना आपको कैसा लगता है?

(खीजते हुए) आप लोगों को सवाल घुमा-फिराकर पूछने पर कुछ बोनस मिलता है क्या? मुझे आडवाणी नहीं बनना है इसलिए मैं उनकी वाली कोई गलती नहीं करूंगा.

उनकी वाली गलती का क्या मतलब है?

जब उन्हें पता था कि उनका राजनीतिक भविष्य भारत में है, न कि पाकिस्तान में; तो उन्हें वहां जाकर जिन्ना की तारीफ करने की क्या जरूरत थी. वे मानें या न मानें पर उनकी राजनीतिक हत्या...मेरा मतलब कि राजनीतिक कैरियर के ऐसे पतन में अपनी जड़ों से प्रेम दिखाना भी बड़ा करण है. मेरी जड़ें राम रहीम की धरती में...अब्ब्ब...मेरा मतलब हरियाणा में हैं, न कि पाकिस्तान में.

अच्छा, यह बताइये कि आपने गुड़गांव का नाम बदलकर गुरूग्राम क्यों रख दिया? क्या नाम बदलने से उस शहर की सूरत या सीरत में भी कोई बदलाव हुआ है?

‘राम रहीम इंसा’ जैसा नाम रखने से एक आदमी की सीरत में कोई फर्क नहीं पड़ा तो नाम बदलने से पूरे शहर में ही क्या फर्क पड़ेगा! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि बिल्कुल फर्क पड़ा है, अब उस गांव में गुड़ पर मक्खियां भिनभिनाती नजर नहीं आएंगी आपको! (हंसते हुए)

एक अंतिम सवाल. आप अपने कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि क्या मानते हैं?

विकास का ढोल तो सारे ही मुख्यमंत्री पीटते हैं पर मैंने तो खूंखार बाबाओं को ही पिटवा दिया... मेरा मतलब कि गिरफ्तार करवा दिया. ऐसे ढोंगी बाबा देश के लगभग सभी राज्यों में पाए जाते हैं, लेकिन कोई भी उनके काले कारनामों के खिलाफ एक्शन लेना तो दूर, मुंह तक नहीं खोलता. पर मैंने संघ से होते हुए भी इन दोनों ‘राम’ के कुकर्मों पर पर्दा ही नहीं डलवाया, बल्कि रामपाल और राम रहीम की लंका लगा दी है. इससे बढ़कर उपलब्धि और भला क्या होगी!