निर्देशक : श्रेयस तलपड़े

लेखक : समीर पाटिल, श्रेयस तलपड़े, बंटी राठौर, पारितोष पेंटर

कलाकार : सनी देओल, बॉबी देओल, श्रेयस तलपड़े, सोनाली कुलकर्णी, समीक्षा भटनागर, अश्विनी कलसेकर

रेटिंग : 2 / 5

पोस्टर बॉयज के बारे में यह सच है कि यहां थोड़ा बहुत बेसिर-पैर का मजा छिपा हुआ है. अगर आप किसी जमाने में सनी देओल और सोल्जर-गुप्त-करीब वाले बॉबी देओल के प्रशंसक रहे हैं तो कुछ जगहों पर ‘पोस्टर बॉयज’ आपको मारक मजा देती है. खासकर वहां जहां सनी-बॉबी की पुरानी मशहूर फिल्मों और संवादों का चतुराई से उपयोग किया जाता है और डरे-सहमे बॉबी देओल अच्छा काम करते हैं.

लेकिन इस मनोरंजन को पाने के लिए ‘पोस्टर बॉयज’ को पूरा देखना वैसा वाला एक अनुभव है जैसे दिनभर बैठकर सब टीवी पर एक के बाद एक सो कॉल्ड कॉमेडी धारावाहिक देखना, और बचकानी हरकतों से दिमाग का इतना सुन्न हो जाना कि गाहे-बगाहे आने वाले छोटे-मोटे नए चुटकुलों में ही खोई हुई हंसी को तलाशना.

‘पोस्टर बॉयज’ की कहानी कहने भर को उन तीन नायकों की है जो बदकिस्मती से एक दिन अपने चेहरों को नसबंदी के एक सरकारी विज्ञापन पर चस्पा पाते हैं, और समाज उन्हें इस बात पर इतना ज्यादा कोसता है कि तीनों साथ मिलकर इस समस्या का हल निकालने निकल पड़ते हैं. लेकिन ‘पोस्टर बॉयज’ न सिर्फ नसबंदी जैसे वर्जित विषय के इर्द-गिर्द रचे गए अपने बेहतरीन सब्जेक्ट को शऊर से नहीं प्रस्तुत कर पाती बल्कि पुराने पड़ चुके फिल्ममेकिंग के तौर-तरीकों का इतना जमकर उपयोग करती है कि आप उसे कभी गंभीरता से नहीं ले पाते. ऊपर से बॉलीवुड क्लीशों की भरमार पटकथा को भरभरा के गिरा देती है और अंत में हास्य-विनोद के कुछ दृश्यों के अलावा सिर्फ श्रेयस तलपड़े का अस्त-व्यस्त निर्देशन याद रह जाता है.

फिल्म में हर सीन में व्यक्त इमोशन को बताने के लिए पहले साधिकार बैकग्राउंड स्कोर पधारता है और हंसी, दुख, आश्चर्य व गुस्से जैसे भावों को अभिनेता बाद में व्यक्त करते हैं (कई बार नहीं भी करते). यह ट्विस्ट कि तीनों नायकों के चेहरे नसबंदी के सरकारी विज्ञापन पर छपे हुए हैं, ट्रेलर तो आपको एक महीने पहले बता चुका है, लेकिन इस सार्वजनिक जानकारी तक पहुंचने में फिल्म अपनी शुरुआत के तकरीबन 20 मिनट लगा देती है और आपको तुरंत इस फिल्म से जुड़े लोगों की गैरजिम्मेदारी का अहसास होता है. भाई साहब, अगर यह रहस्य फिल्म में इतना ही धीरे-धीरे खुलना था तो ट्रेलर में तपाक से बताना ही क्यों था? और अगर बताना जरूरी था तो फिल्म में बेवजह की खरपतवार उगाना क्यों था?

कई सारे दृश्य अटपटे अंदाज में भी खत्म होते हैं और कई बार रिएक्शन शॉट ऐसे लिए जाते हैं जैसे आज से 6-8 साल पहले की फिल्मों में लिए जाते थे. निर्देशन के तरीके जिस तेजी से इन दिनों निखर और बदल रहे हैं, उस दौर में ऐसा बासी निर्देशन, सिनेमेटोग्राफी और संगीत का उपयोग खासा खटकता है. ऊपर से फिल्म में सरकारी महकमों की गलतियों पर भी बेहतर तरीके से सिलसिलेवार वार नहीं किए जा पाते और बॉलीवुड के स्थायी क्लीशों के सहारे नेता-न्यूज-जनता वाला सर्कस फिर से रचकर फिल्म एक कच्ची पटकथा को बड़ा परदा देने की भी दोषी बनती है.

इन कमियों के अलावा ‘पोस्टर बॉयज’ अपने तीसरे और अंतिम एक्ट में क्रांतिकारी होने की कोशिश करती है. वो जिस तरीके का उपयोग कर जन आंदोलन करना चाहती है उसको पेंशन ऑफिस वाले एक बेहद छोटे सीन में राजकुमार हिरानी ने ‘लगे रहो मुन्नाभाई’ में दिखाया था. यहां कुछ उसी तरह के आंदोलन को कहानी का ढेर सारा हिस्सा देने के बावजूद ‘पोस्टर बॉयज’ हिरानी के उस सीक्वेंस के पैरों की धूल भी नहीं बन पाती. अंत में सचिन खेड़ेकर रूपी सीएम के साथ वाला एक तमाशा रचा जाता है और आपको अपने बुद्धू बक्से की याद आती है, पछतावा होता है कि हमारे यहां अमेरिका की तरह क्यों नहीं कुछ फिल्में सीधे टेलीविजन पर रिलीज होतीं!

फिल्म की अच्छी बात यह है कि जब तीनों नायक साथ आते हैं, या सनी-बॉबी साथ आते हैं, तो फिल्म उबाऊ नहीं लगती. रिकवरी एजेंट बने श्रेयस तलपड़े तो वही करते हैं जो वे सालों से हास्य भूमिकाओं में स्टीरियोटाइप्ड होकर कर रहे हैं, लेकिन पाउट निकालकर हर सिचुएशन में सेल्फी लेने के शौकीन सनी देओल और डरे-डरे रहने वाले भोंदू मास्टर बने बॉबी देओल कुछ स्क्रिप्ट और संवादों की सहायता से और कुछ अपने अभिनय से मजा दे जाते हैं. इनमें से एक नायक के मोबाइल की घंटी उसकी 90 के दशक की एक हिट फिल्म का टाइटल गीत होती है और दूसरा नायक अपने क्रोध को इसलिए काबू में रखता है क्योंकि बेकाबू होने पर उसका ‘हाथ उठ जाता है.’ ऐसा बोलते ही सनी देओल के साथ खड़ा सह-कलाकार तपाक से कहता है, ‘और फिर आदमी उठता नहीं, उठ जाता है!’

‘पोस्टर बॉयज’ इस तरह के कई फिल्मी रेफरेंस सनी और बॉबी देओल की पुरानी हिट फिल्मों से लेती है और जब कभी भी कर पाती है, मारक मनोरंजन करती है. कभी एक सरकारी बाबू का नाम बलवंत होता है तो कभी बॉबी देओल ‘कैमिकल’ और ‘मैथमेटीकल’ धमकियां देते हैं, जिन्हें देते-देते भूल जाने पर झोले में से किताबें निकालकर याद करने की कोशिश करते हैं. एक सरकारी दफ्तर में शटर के इस पार और उस पार वाला बढ़िया सीन रचा जाता है और सोनाली कुलकर्णी के साथ वाले सीन में बॉबी ही नहीं, सनी देओल भी बढ़िया कॉमिक टाइमिंग का प्रदर्शन करते हैं.

फिल्म देखकर यह भी समझ आता है कि सीमित रेंज वाले अभिनेता सनी देओल का हीरोइज्म अब बढ़ती उम्र छिपा नहीं पा रहा, लेकिन बॉबी देओल आने वाली फिल्मों में किरदार बनने के लिए पूरी ईमानदारी के साथ दोबारा मेहनत करना शुरू कर चुके हैं. यह उनकी बदकिस्मती है कि इसकी शुरुआत उस फिल्म से हुई जिसे सनी देओल द्वारा इसी फिल्म में बोले एक बढ़िया डायलॉग से परिभाषित करें तो - खराब निर्देशन और बासी पटकथा की कमियां इस फिल्म को इतनी जोर से नीचे पटकती हैं, कि फिल्म टप्पा खाकर आसमान में खो जाती है!

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