‘बाबू मोशाय!!! जिंदगी लंबी नहीं...बड़ी होनी चाहिए...!’ यह डायलॉग 1971 की चर्चित फिल्म ‘आनंद’ का है. फिल्म में कैंसर के मरीज बने राजेश खन्ना ने जिंदगी का यह फलसफा अपने दोस्त अमिताभ बच्चन को दिया था. लेकिन यह फलसफा हिंदी साहित्य की महान विभूति भारतेंदु हरिश्चंद्र पर भी सटीक बैठता है. उन्होंने सिर्फ 34 साल चार महीने की छोटी सी आयु में दुनिया को अलविदा कह दिया, लेकिन दुनिया छोड़ने से पहले वे अपने क्षेत्र में इतना कुछ कर गए कि हैरत होती है कि कोई इंसान इतनी छोटी सी उम्र में इतना कुछ कैसे कर सकता है. हमें मालूम हो या न हो लेकिन यह सच है कि आज का हिंदी साहित्य जहां खड़ा है उसकी नींव का ज्यादातर हिस्सा भारतेंदु हरिश्चंद्र और उनकी मंडली ने खड़ा किया था. उनके साथ ‘पहली बार’ वाली उपलब्धि जितनी बार जुड़ी है, उतनी बहुत ही कम लोगों के साथ जुड़ पाती है. इसलिए कई आलोचक उन्हें हिंदी साहित्य का महान ‘अनुसंधानकर्ता’ भी मानते हैं. ऐसी महान विभूति का जन्म नौ सितंबर, 1850 को हुआ था.

हिंदी साहित्य को आधुनिक बनाया

भारतेंदु ने न केवल नई विधाओं का सृजन किया बल्कि वे साहित्य की विषय-वस्तु में भी नयापन लेकर आए. इसलिए उन्हें भारत में नवजागरण का अग्रदूत माना जाता है. उनसे पहले हिंदी साहित्य में मध्यकाल की प्रवृत्तियां मौजूद थीं, इसलिए उनसे पहले का का साहित्य दुनियावी जरूरतों से बिल्कुल कटा हुआ था. साहित्य का पूरा माहौल प्रेम, भक्ति और अध्यात्म का था. इसे अपने प्रयासों से उन्होंने बदल डाला. उन्होंने हिंदी साहित्य को देश की सामासिक संस्कृति की खूबियों के साथ-साथ पश्चिम की भौतिक और वैज्ञानिक सोच से लैस करने की भरसक कोशिश की.

आधुनिक विचार ईश्वर और आस्था की जगह मानव और तर्क को केंद्र में रखता है, इसलिए इसके प्रभाव में रचा गया साहित्य लौकिक जीवन से जुड़ा होता है. लेकिन उस समय का भारत गुलामी और मध्यकालीन सोच की जंजीरों में जकड़ा था. भारतेंदु पर भारतीय संस्कृति के अलावा आधुनिक और पश्चिमी विचारों का भी असर था. इसलिए वे साहित्य में बुद्धिवाद, मानवतावाद, व्यक्तिवाद, न्याय और सहिष्णुता के गुण लेकर आए. उन्होंने अपनी लेखनी से लोगों में अपनी संस्कृति और भाषा के प्रति प्रेम की अलख जगाने का प्रयास किया.

1850 के आसपास के भारत में भ्रष्टाचार, प्रांतवाद, अलगाववाद, जातिवाद और छुआछूत जैसी समस्याएं अपने चरम पर थीं. हरिश्चंद्र बाबू को ये समस्याएं कचोटती थीं. इसलिए उन्होंने इन समस्याओं को अपने नाटकों, प्रहसनों और निबंधों का विषय बनाया. वे उन चंद शुरुआती लोगों में से थे जिन्होंने साहित्यकारों से आह्वान किया कि वे इस दुनिया की खूबियों-खामियों पर लिखें न कि परलोक से जुड़ी व्यर्थ की बातों पर. अपनी मंडली के साहित्यकारों की सहायता से उन्होंने नए-नए विषयों और विधाओं का सृजन किया. कुल मिलाकर उन्होंने पुरानी प्रवृत्तियों का परिष्कार कर नवीनता का समावेश करने की कोशिश की.

खड़ी बोली के सरल रूप को गद्य में स्थापित किया

आलोचकों की नजर में भारतेंदु हरिश्चंद्र का दूसरा सबसे बड़ा योगदान हिंदी भाषा को नई चाल में ढालने का माना जाता है. उनसे पहले हिंदी भाषा में दो तरह के ‘स्कूल’ चलते थे. एक राजा लक्ष्मण सिंह की संस्कृ​तनिष्ठ हिंदी और दूसरा राजा शिवप्रसाद ‘सितारेहिंद’ की फारसीनिष्ठ शैली का. दोनों ही शैलियां अपनी अति को छू रही थीं. एक हिंदी भाषा में संस्कृत के शब्दों को चुन-चुनकर डाल रही थी तो दूसरा फारसी के शब्दों को. हरिश्चंद्र बाबू ने इन दोनों प्रवृत्तियों का मिलन कराया. उन्होंने अपनी पत्रिका ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ में 1873 से हिंदी की नई भाषा को गढ़ना शुरू किया. इसके लिए उन्होंने खड़ी बोली का आवरण लेकर उसमें उर्दू के प्रचलित शब्दों का प्रयोग किया. वहीं तत्सम और उससे निकले तद्भव शब्दों को भी पर्याप्त महत्व दिया. इसके साथ ही उन्होंने कठिन और अबूझ शब्दों का प्रयोग वर्जित कर दिया. भाषा के इस रूप को हिंदुस्तानी शैली कहा गया, जिसे बाद में प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों ने आगे और परिष्कृत किया. हालांकि कविता में वे खड़ी बोली के बजाय ब्रज का ही इस्तेमाल करते रहे.

हिंदी नाटक और रंगमंच के प्रवर्त्तक भी

आलोचकों की नजर में भाषा के बाद भारतेंदु का सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में रहा. उन्होंने पहली बार हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की. अपने छोटे से जीवन में भारतेंदु ने मौलिक और अनूदित मिलाकर 17 नाटक रचे. इसके अलावा वे एक अच्छे अभिनेता भी थे लिहाजा रंगमंच में भी उन्होंने कई प्रयोग किए. इसलिए उन्हें हिंदी का पहला आधुनिक नाटककार और मौलिक नाट्य चिंतक माना गया. उन्हें हिंदी नाटक का युग प्रवर्त्तक करार दिया गया.

उन्होंने नाटक के कथानक को काफी विविध बना दिया. उनसे पहले के नाटक धार्मिक और भावुकता प्रधान थे. इसकी जगह उन्होंने पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक नाटक लिखे. इसके जरिए उन्होंने तार्किक चिंतन विकसित करने की कोशिश की. इनके लिखे भारत-दुर्दशा, अंधेर नगरी, वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति जैसे नाटक अभी भी मंचित हो रहे हैं. ये सभी प्रहसन की श्रेणी में भी आते हैं. हिंदी में पहली बार प्रहसन लिखने की शुरुआत इन्होंने ही की और उसे उसके शीर्ष तक भी पहुंचाया. इस विधा के जरिए उन्होंने समाज में गहरी पैठी समस्याओं पर व्यंग्य के माध्यम से करारा प्रहार किया था. इनका रंगमंच के क्षेत्र में काफी योगदान रहा. वेश, वाणी, अभिनय के स्वरूप और गीतों के स्वाभाविक प्रयोग आदि पर इन्होंने काफी काम किया. इन्होंने पारसी और पश्चिमी थिएटर के अति प्रभाव से दूर करते हुए हिंदी रंगमंच की स्थापना की.

उनका काव्य रचना-संसार बहुत विस्तृत था

भारतेंदु का काव्य रचना संसार बहुत विस्तृत था. इतनी छोटी सी उम्र में ही उन्होंने 21 काव्यग्रंथ, 48 प्रबंध काव्य और कई मुक्तक रच डाले थे. वे गद्य खड़ी बोली में ​लिखते थे लेकिन कविता के लिए उन्होंने ब्रज भाषा को चुना था. इस प्रवृत्ति को ‘भाषा का द्वैध’ कहा गया, जो इनके दो दशक बाद तक चलता रहा. भारतेंदु ने कहा कि कविता के लिए जिन भाव-बोधों की जरूरत होती है वे काफी प्रयास करने के बाद भी खड़ी बोली में नहीं आ सके. इसे उनकी विलक्षण प्रतिभा की सीमा माना जाता है. हालांकि बाद में महावीर प्रसाद द्विवेदी और उनके शिष्य कवि 1900 के बाद खड़ी बोली में भी सुंदर काव्य रचने में सफल रहे. वैसे उनकी कविता में कवित्त, सवैया, दोहा, छप्पय जैसे पारंपरिक छंदों के अलावा लावनी, कजली जैसी लोकप्रचलित शैलियों का भी जमकर प्रयोग हुआ.

वे एक श्रेष्ठ पत्रकार भी थे

भारतेंदु एक श्रेष्ठ पत्रकार भी थे. उन्होंने बालाबोधनी, कविवचन सुधा और हरिश्चंद्र मैगजीन (बाद में हरिश्चंद्र पत्रिका) जैसी पत्रिकाओं का प्रकाशन और संपादन कर साहित्य से अलग विषयों और समस्याओं पर लिखा. इन पत्रिकाओं के जरिए उन्होंने न केवल नई किस्म की भाषा का विकास किया बल्कि आधुनिक भारत की समस्याओं पर भी खुलकर चिंतन किया. वे इन पत्रिकाओं के जरिए अक्सर देशप्रेम विकसित करने की कोशिश किया करते थे. हरिश्चंद्र बाबू ने इन पत्रिकाओं के लिए ढेरों निबंध, आलोचना और रिपोर्ताज लिखे. आलोचकों के अनुसार इन विधाओं की स्थापना भारतेंदु और इनके साथियों के प्रयासों से ही हुई. अपनी पत्रिकाओं में विविध विषयों पर लिखे अपने लेखों से उन्होंने अन्य लेखकों को भी प्रेरित किया. आलोचकों के अनुसार उनके साथी बालकृष्ण भट्ट और प्रताप नारायण मिश्र की लेखनी पर भारतेंदु का स्पष्ट प्रभाव दिखता था. उन्होंने दिखाया कि कैसे साहित्य से इतर विधाओं में भी आम-जीवन से जुड़े विषयों पर लिखा जा सकता है. इन वजहों से उनकी पत्रिका लोगों में हिंदी के प्रति अभिरुचि विकसित करने में कामयाब हुई.

हरिश्चंद्र बाबू का व्यक्तित्व और कृतित्व बहुआयामी था. उन्होंने आधुनिक हिंदी साहित्य की लगभग सभी विधाओं में योगदान दिया विशेषकर गद्य साहित्य में. आधुनिक हिंदी साहित्य के सभी विधाओं के बीज इनकी रचनाओं में मिल जाते हैं. इन्होंने अपने को किसी एक विधा तक सीमित नहीं रखा था. वे ‘कुछ आपबीती, कुछ जगबीती’ नामक उपन्यास भी लिख रहे थे, लेकिन असमय निधन से वे यह काम पूरा न कर सके. उनका यह सपना बाद में उनके साथी श्रीनिवास दास ने हिंदी का पहला उपन्यास ‘परीक्षा गुरु’ लिखकर पूरा किया. ऐसी अद्वितीय प्रतिभा दुर्भाग्य से अपने जीवन के तीसरे ही दशक में सात जनवरी, 1885 को दुनिया से कूच कर गई.