‘हम सब गौरी हैं.’ गौरी लंकेश की ह्त्या के बाद पूरे देश में फूट पड़े क्षोभ प्रदर्शनों में इस इबारत की तख्ती दिखाई पड़ी. यह एक साहित्यिक या मुहावरेदार तरीका है बताने का कि हम सब गौरी के विचारों और इरादों के साझीदार हैं. जिस किसी ने भी गौरी का क़त्ल किया, अगर वह उनके विचारों के कारण किया तो उसे जतलाना चाहते हैं कि वे विचार मारे नहीं जा सकते.

यह बात कि किसी व्यक्ति के विचार उसके बाद भी जीवित रहने वाले हैं, इतिहास से प्रमाणित है. फिर क्यों व्यक्तियों को निशाना बनाना जारी रहता है? क्या यह मूर्खता नहीं? नहीं, क्योंकि किसी व्यक्ति विशेष के माध्यम से वे विचार कहीं अधिक ताकतवर और प्रभावी हो जाते हैं. एक ही विचार जब दो व्यक्तियों के माध्यम से व्यक्त होता है तो उसका असर एक नहीं होता. उसका वजन उस व्यक्ति से तय होता है. वह व्यक्ति किस सतह से बोल रहा है, अगर हम मुक्तिबोध के शब्दों का इस्तेमाल करें, यह बहुत महत्वपूर्ण है. और यह सतह आसानी से नहीं हासिल की जा सकती.

अहिंसा और मुसलमानों के समान अधिकार का विचार गांधी के अलावा औरों का भी था लेकिन मारा गांधी को जाना था. क्योंकि गांधी के मुख से वह विचार कुछ अधिक प्रभावशाली हो उठता था. और गांधी के बाद, जीवित रह कर भी वह विचार उतना खतरनाक नहीं रह गया. गांधी का एक-एक दिन धर्मनिरपेक्ष विचार के दृढ़ होते जाने के लिए नए-नए अवकाश और नई-नई ज़मीन तैयार कर रहा था. वैसे ही मार्टिन लूथर किंग का. कोई भी विचार अपना दायरा बढ़ाते हुए अपनी वैधता को पहले की अपेक्षा और व्यापक और दृढ़ करता चला जाता है उस व्यक्ति के अपने प्रभाव के माध्यम से जो उसका संवाहक है. उस व्यक्ति को खोते ही उस विचार के प्रसार की गति धीमी पड़ जाती है.

अहिंसा का विचार गांधी के पहले भी था लेकिन वह आधुनिक राजनीति की भाषा में उनके बाद ही समझा जा सका. गांधी को देखकर और उन्हें सुनकर ही साधारण लोग, जो अहिंसा की दार्शनिक बहस में भाग लेने की सलाहियत नहीं रखते, उस विचार के हामी ही नहीं उसके अभ्यासी भी हो गए. और उसके लिए रेणु के बावनदास की तरह जान पर खेलने को भी तैयार.

नाथूराम गोडसे जैसे लोगों को मालूम था कि जीवित गांधी अधिक खतरनाक हैं. यह कि गांधी के जाते ही धर्मनिरपेक्षता और अहिंसा का विचार पहले के मुकाबले कहीं कमजोर रहेगा. इसीलिए गांधी को मारना अनिवार्य और तुरंत ज़रूरी था. गोडसे का संकल्प कितना पक्का था यह इसी से पता लगता है कि 30 जनवरी, 1948 को गांधी पर हुआ प्राणान्तक आक्रमण गोडसे के द्वारा किया गया तीसरा प्रयास था.

गौरी लंकेश मारी गईं. लेकिन उनकी तरह के सारे लोग मारे नहीं जा सकते. तब दूसरा काम उनपर कीचड़ फेंककर, उन्हें बदनाम करके निष्प्रभावी बनाने का किया जाता है. उन्हें चरित्रहीन साबित किया जा सकता है. स्वच्छंद यौन संबंधों में संलिप्त बताया जा सकता है. विलासी घोषित किया जा सकता है. जवाहरलाल नेहरू अगर अपनी अभारतीयता के कारण घृणा के योग्य होने चाहिए तो क्यों इतना ही कहना और इसी की आलोचना पर्याप्त नहीं? क्यों उन्हें एक विलासी पुरुष की तरह चित्रित करने का श्रम? क्यों झूठ का एक पूरा सरंजाम?

यह सब किया जाता है क्योंकि विचार का माध्यम, यानी वह व्यक्ति भी महत्त्वपूर्ण है. ऐसा करके उसे जनदृष्टि में संदिग्ध बना दिया जाता है और इससे उसके विचारों की वैधता भी संदिग्ध हो उठती है.

व्यक्ति सिर्फ विचार नहीं है वह अपने आप में एक विशिष्ट शैली भी है, बल्कि वही पहले है. एक अंदाज, एक भंगिमा. और विचार भी उसके इस अंदाज के चलते अधिक आकर्षक हो उठते हैं. यूआर अनंतमूर्ति हों या नरेंद्र दाभोलकर या गोविंद पानसरे या प्रोफ़ेसर कलबुर्गी, अपने विचारों से ज्यादा अपने व्यक्तित्व की उस सतह के कारण खतरनाक थे, जिस पर उन्हीं विचारों के दूसरे लोग नहीं खड़े हैं. जिस पर लंबे श्रम और अभ्यास के बाद ही पहुंचा जा सकता है.

इसलिए जब हम यह कहते हैं कि हम सब गौरी, तो हम जानते हैं कि यह हमारी महत्वाकांक्षा है, सच नहीं है. कि हम सब हत्या के पात्र नहीं हैं. वह पात्रता अभी हमें हासिल करनी है. लेकिन किसी दूसरे संदर्भ में उस देश को अभागा कहा गया है जिसे शहीद चाहिए. हमें तो विचार चाहिए और रोज़-रोज़ उस विचार को और पैना और परिष्कृत करने वाले इंसान भी ज़िंदा चाहिए.

यानी कि मारने वाले का संकल्प कितना भी प्रबल क्यों न हो, हमें बचाने के सारे जतन करने ही चाहिए. क्योंकि किसी का ठीक वैसा ही विकल्प मिलना असंभव है. इसलिए गौरी लंकेश का मारा जाना जो था उसे खो देना भर नहीं, जो हो सकता था और सिर्फ गौरी में और गौरी से, उस संभावना को नष्ट कर देना है. ऐसी रिक्तताएं और कितनी हमें चाहिए?