इस किताब का एक अंश : ‘मेरे लिए जीवन की इस अपरिमित अवधि के दौरान, फल और मांस का अंतर मिट गया है और स्वाद अपना महत्व खो चुका है. मैं फलों के रस और पशुओं के रक्त का अंतर भूल चुका हूं. जो आनंद मुझे किसी रसदार फल को चूसने में आता है, वही तृप्ति मांस के लोथड़े को कुतरने में मिल जाती है.

मेरे तन के इन घावों से कहीं अधिक पीड़ादायक, पांच अबोध बालकों की हत्या और निर्दोष उत्तरा के गर्भस्थ बालक के वध से उत्पन्न ग्लानि का दंश है. मेरे उसी दुष्कर्म के दंडस्वरूप श्रीकृष्ण ने मुझे यह शाप दिया कि मेरे तन के घाव कभी नहीं भरेंगे और मैं इस सड़ी काया को लिए हजारों वर्षों तक इसी प्रकार पृथ्वी पर भटकता रहूंगा. उन्होंने यह भी शाप दिया कि जब तक मैं जीवित रहूंगा, मेरी किसी व्यक्ति से बात नहीं हो सकेगी...

मैं स्वयं जीवित होकर भी किसी सड़े-गले शव से अधिक कुछ नहीं हूं! यूं कहने को मैं, चिरंजीवी हूं, अमर हूं, किंतु पूर्ण सत्य यह है कि मैं शापित हूं, कलंकित हूं और इस विशाल पृथ्वी पर कोई ऐसा मनुष्य नहीं जो मेरे दुख को कम कर सके. यह मेरे अपयश की पराकाष्ठा है कि समूची पृथ्वी पर आपको मेरे नाम का कोई दूसरा व्यक्ति नहीं मिलेगा.

जी हां, मेरा नाम अश्वत्थामा है और मैं अभी जिंदा हूं!’


उपन्यास : अश्वत्थामा

उपन्यासकार : आशुतोष गर्ग

प्रकाशक : मंजुल पब्लिशिंग हाउस

कीमत : 175 रुपये


अमूमन जीवन से बुरी तरह परेशान व्यक्ति भी मौत को सामने खड़ा देखकर उसे अपनाता नहीं, बल्कि दूर ही भागता है. लेकिन अगर किसी को मौत से भी बदतर जिंदगी का ‘आशीर्वाद’ मिला हो तो उसके लिए जीवन सिर्फ त्रासदी है! महाभारत में कौरवों और पांडवों के गुरू द्रोणाचार्य का पुत्र अश्वत्थामा ऐसा ही एक पात्र है. इसके लिए अमरत्व का आशीष ही जीवन का सबसे बड़ा श्राप बन गया था. भारत की धार्मिक विरासत में सबसे उपेक्षित पात्र अश्वत्थामा पर लिखा गया यह एक शानदार उपन्यास है.

कभी न सूखने वाले घावों, एकाकीपन और अनंत उपेक्षा ने अश्वत्थामा के जीवन को कितना त्रासदपूर्ण बना दिया था, यह बात इस उपन्यास में बेहद सूक्ष्म और प्रभावी तरीके से लिखी गई है. अतीत में संजय ने धृतराष्ट्र को अपनी दिव्य दृष्टि से महाभारत का आंखों देखा हाल सुनाया था. इस बार यह उपन्यास हमें अश्वत्थामा की सूक्ष्म और बेहद मानवीय दृष्टि से महाभारत की कथा सुनाता है.

अश्वत्थामा की दृष्टि इतनी ज्यादा तटस्थ है कि वह अपने पिता के पूरे जीवन में की गई गलतियों-क्रूरताओं को बेहद चुभने वाले अंदाज में बयान करता है. एक जगह वह कहता है, ‘एक दिन अर्जुन की धनुर्विद्या से प्रभावित होकर भावावेश में द्रोण ने उसे यह वचन दे डाला, ‘अर्जुन! मैं प्रयास करूंगा कि संसार में तुम्हारे समान कोई अन्य धनुर्धर न हो!’ यह वचन सुनने में बड़ा सुखद लगता है, किंतु इस कठिन वचन के अनुपालन के लिए द्रोण ने जाने-अनजाने कई अपराध भी किए और दुर्भाग्य से, मैं उन सब अपराधों का साक्षी रहा हूं.’

इसी तरह एक और जगह अश्वत्थामा कहता है, ‘अपने पिता के स्वभाव में इतनी विषमताएं देखकर मैं दंग था. कोई व्यक्ति क्रोध, क्षमा और छल में एक साथ इतना पारंगत कैसे हो सकता है!’ गुरु द्रोण के पुत्र का ऐसा ही एक और बयान है, ‘मैं अपने पिता की इस नई चाल से स्तब्ध रह गया. उन्होंने कर्ण के वस्त्रों को देखकर यह भांप लिया था कि वह किसी निम्न कुल का होगा. मेरे लिए यह आज भी रहस्य है कि मेरे पिता ने अर्जुन के लिए इतने अपराध क्यों किए!’ अश्वत्थामा की अपने पिता के लिए यह निर्मम तटस्थता, असल में लेखक की गहरी मानवीय दृष्टि की तरफ साफ इशारा करती है.

महाभारत की पृष्ठभूमि में लिखा गया यह उपन्यास यूं तो यथार्थ की जमीन पर ही खड़ा है, लेकिन महाभारत के बहुत सारे पात्रों के जन्म से जुड़ी कई विचित्र कथाएं-मान्यताएं भी यहां जानने को मिलती हैं. ये अतार्किक लग सकती हैं, लेकिन हैं बड़ी दिलचस्प. जैसे कि बिना किसी महिला के, सिर्फ वीर्य स्खलन से ही बच्चा पैदा हो जाना! महाभारत में ऐसे कई पात्र हैं जिनका जन्म किसी स्त्री के बिना, सिर्फ पुरुष के वीर्य से हुआ था.

खुद अश्वत्थामा अपने पिता के ऐसे ही विस्मयकारी जन्म के बारे में बताता है, ‘यह एक विचित्र संयोग है कि मेरे मामा कृपाचार्य की भांति मेरे पिता द्रोण का जन्म भी एक महान तपस्वी की उद्वेलित कामवासना के फलस्वरूप हुआ था... घृताची के उन्मत्त कर देने वाले यौवन ने भरद्वाज के तपोबल की प्रचंड अग्नि पर अपनी कामुकता का मंद व सुखद छिड़काव करना आरंभ कर दिया था. कुछ ही क्षणों में घृताची को देखते-देखते ही भरद्वाज स्खलित हो गए!

स्खलन का एहसास होते ही भरद्वाज संभल गए, किंतु उनसे भूल हो चुकी थी. उन्होंने अपने ओजपूर्ण वीर्य को धरती पर नहीं गिरने दिया और उसे अपने यज्ञपात्र में रख लिया. उनके यज्ञपात्र का नाम द्रोण था. नियत समय पर, उस पात्र में से एक तेजस्वी बालक ने जन्म लिया. महर्षि भरद्वाज ने यज्ञपात्र के नाम पर ही अपने पुत्र का नाम द्रोण रखा.’

उपन्यास इस मामले में बेहद अद्भुत है कि पूरी तरह धर्म और आस्था से संबद्ध होकर भी यह कई संदर्भो में वर्तमान से भी गहराई से जुड़ता है. आजकल के बच्चों में बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति के लिए कैसे पूरी तरह यह समाज और व्यवस्था जिम्मेदार है, इसका सबसे सटीक उदाहरण अश्वत्थामा है. अश्वत्थामा खुद बताता है कि कैसे युद्ध में हुई अनंत हिंसा ने उसके भीतर के मानवीय गुणों को पूरी तरह खत्म करके उसे पशु जैसा हिंसक बना दिया. वह कहता है, ‘पांच निर्दोष बालकों को निर्ममता से मारकर भी मेरे मन में जल रही प्रतिशोध की अग्नि में कोई विशेष कमी नहीं आई थी... मुझे इस बात का बिलकुल अनुमान नहीं था कि मैंने उन्माद के क्षणों में कितने निर्दोष बच्चों, स्त्रियों और सैनिकों का संहार कर डाला...’

‘...रक्त से सनी तलवार, मेरे हाथ से इस तरह चिपक गई, मानों वह मेरे शरीर का अंग हो... मुझे मन में सदा इस बात का संतोष एवं गर्व रहा कि मैंने दुर्योधन जैसे धूर्त व्यक्ति के साथ रहते हुए भी अपनी मानवता को कलुषित होने से बचाए रखा था, परंतु उस घोर नरसंहार के बाद जब मेरा प्रमाद शांत हुआ तो मेरा सामना अपने ही व्यक्तित्व के एक नए और विकृत रूप से हुआ...’

‘...क्या मेरे अंतर में व्याप्त मानवता और मेरा सदभाव, अमर्ष-जनित भीषण हिंसा की भेंट नहीं चढ़ गए थे?... मैं मनुष्य से राक्षस हो गया था... क्या सचमुच रणभूमि में सैनिकों को मारना और सोते हुए अबोध बालकों व महिलाओं की हत्या करना एक समान है?... उस मंथन से जो ग्लानि का गरल निकल रहा था, उसने मेरे तन और मन को ही नहीं, अपितु मेरी आत्मा को भी विषाक्त कर दिया था.’

लेखक ने पूरे महाभारत की कथा को बेहद छोटे-छोटे प्रसंगो में बांटकर, बहुत सरल और आत्मीय भाषा में प्रस्तुत किया है. हिंसक वर्तमान की गोद में पल रहे दुनियाभर के असंख्य बच्चों के त्रासदपूर्ण भविष्य के प्रति आगाह करता यह एक अदभुत उपन्यास है. अमूमन बच्चों को ज्ञान देने के लिए उनके स्कूल के पाठ्यक्रम में बहुत सी किताबें लगाई जाती हैं. लेकिन इस उपन्यास को कामकाजी माता-पिताओं, प्रशासनिक अधिकारियों और दुनियाभर के नीति-निर्धारकों के पाठयक्रम में लगाया जाना चाहिए; ताकि वे अपने निहायत ही स्वार्थी व्यवहार और नीतियों के भावी परिणामों की झलक पा सकें; ताकि उन्हें अहसास हो सके कि बच्चों के सुखद जीवन की बुनियाद सुविधाओं का चरम नहीं, बल्कि एक शांत, स्वस्थ और मानवीय गुणों से भरपूर समाज है. ‘हिंसक वर्तमान विक्षिप्त भविष्य की बुनियाद है’ का संदेश देता हुआ यह एक बेहद खूबसूरत और मार्मिक उपन्यास है जिसे जरूर पढ़ा जाना चाहिए.