पिछले करीब तीन साल से भाजपा और मोदी सरकार में यह बात अलिखित तौर पर सर्वमान्य थी कि नरेंद्र मोदी के बाद अमित शाह ही पार्टी और सरकार के सर्वेसर्वा हैं. लेकिन अब रिश्ते दरकने की कानाफूसी शुरू हो गई है. भाजपा नेताओं, मंत्रियों और पत्रकारों के बीच खबरें उड़ने लगी है कि अमित शाह अब पार्टी अध्यक्ष तो हैं लेकिन प्रधानमंत्री के सबसे विश्वस्त नहीं रहे. ये कानाफूसी करने वाले नेता अपनी बात सही साबित करने के लिए कुछ उदाहरण भी गिनाते हैं.

1- सुनी-सुनाई है कि मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार में जिन नेताओं और अफसरों को मंत्री बनाया गया है उनमें से लगभग सभी अमित शाह की लिस्ट से बाहर के नेता हैं. शाह ने मोदी मंत्रिमंडल से हटाए गए मंत्रियों से इस्तीफे तो लिए लेकिन अपने करीबी नेताओं को वे मंत्री नहीं बनवा पाए. जब से मोदी मंत्रिमंडल के विस्तार की चर्चा शुरू हुई थी तब से ही अमित शाह से उनके करीबी नेता संपर्क साध रहे थे. सुनी-सुनाई है कि उन्होंने जिन नेताओं को मंत्री बनाने का भरोसा दिया था उनमें से एक भी मंत्री नहीं बन सका. बताया जाता है कि एक-दो नए मंत्री तो ऐसे भी हैं जिनका वे विरोध कर रहे थे. लेकिन उन्हें काबिल बताकर मंत्री बना दिया गया. तीन साल में ऐसा पहली बार हुआ है जिसकी चर्चा भाजपा और सरकार में खूब हो रही है.

2- कुछ ही महीनों में चुनाव में जाने वाला गुजरात एक ऐसा राज्य हैं जहां अमित शाह और नरेंद्र मोदी के वफादार नेता एकदम अलग-अलग हैं. अमित शाह अपने भरोसेमंद विजय रुपानी को मुख्यमंत्री बना चुके हैं. लेकिन उपमुख्यमंत्री नितिन पटेल अब भी पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल के करीबी माने जाते हैं, जो नरेंद्र मोदी की करीबी मानी जाती हैं. गुजरात में ये बात कोई टॉप सीक्रेट नहीं है कि आनंदीबेन पटेल को कुर्सी से हटाने और नितिन पटेल की जगह विजय रुपानी को मुख्यमंत्री बनाने में अमित शाह की अहम भूमिका थी. ऐसी उम्मीद थी कि आनंदीबेन पटेल राजनीति से संन्यास लेकर राज्यपाल बना दी जाएंगी. लेकिन सुनी-सुनाई है कि अमित शाह के चाहने के बावजूद भी ऐसा नहीं हुआ. उल्टा आनंदीबेन पटेल फिर से ताकतवर होती जा रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब भी गांधीनगर में होते हैं, उनके कार्यक्रम में आनंदीबेन को प्रमुखता दी जाती है. भाजपा के सभी कार्यक्रमों में आनंदीबेन मंच पर दिखती हैं. इसके अलावा गुजरात में बाढ़ के दौरान प्रधानमंत्री ने जब मंत्रियों और अफसरों की मीटिंग बुलाई तो आनंदीबेन कुछ न होने के बावजूद उस बैठक में भी थीं. गुजरात में आनंदीबेन ही एक ऐसी नेता हैं जिन्होंने कभी भी अमित शाह को अपना नेता नहीं माना.

3- अब तक भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बीच भाजपा की और से सीधे अमित शाह और आरएसएस की और से कृष्णगोपाल और दत्तात्रेय होसबोले संपर्क सूत्र की तरह काम करते थे. लेकिन पिछले दो महीनों में दोनों के बीच के रिश्ते उतने सीधे नहीं रहे. कई बार आरएसएस नेताओं की तरफ से शिकायत हुई कि भाजपा बड़े फैसलों से पहले उन्हें विश्वास में नहीं लेती है. दो मौके तो ऐसे आए जब आरएसएस नेताओं को भाजपा के फैसलों के बारे में मीडिया से पता चला. सुनी-सुनाई है कि संघ और भाजपा के बीच समन्वय की इस कमी को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी थोड़े असहज हैं. बताने वाले कहते हैं कि इसका असर कहीं न कहीं इसके लिए जिम्मेदार लोगों पर भी पड़ना ही है. हालांकि इसके बाद भाजपा अध्यक्ष खुद संघ के एक कार्यक्रम में शामिल हुए. लेकिन आरएसएस को करीब से जानने वाले बताते हैं संघ से रिश्ता बिगड़ने में भी वक्त लगता है और सुधरने में भी.

4- नरेंद्र मोदी दिल्ली में रहते हुए भी दिल्ली वाली सियासत से दूर ही रहे. लेकिन अमित शाह के काम करने का तरीका उनसे एकदम अलग है. इसका फायदा और नुकसान दोनों ही हैं. पिछले कुछ महीनों में मोदी सरकार को लेकर कुछ अपुष्ट खबरें मीडिया में देखने को मिलीं. सुनी-सुनाई है कि इसके पीछे कहीं न कहीं अमित शाह के करीबी जिम्मेदार थे. अब प्रधानमंत्री 2019 के चुनाव की टीम तैयार कर रहे हैं. अब तक ये माना जा रहा है कि 2019 में सरकार की कमान मोदी संभालेंगे और पार्टी की कमान अमित शाह. लेकिन आरएसएस के एक नेता कहते हैं कि अभी से क्यों मान लिया जाए कि अमित शाह 2019 तक भाजपा के मुखिया बने ही रहेंगे.