भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र पर काबिज होने के बाद राज्य चुनावों में भी एक के बाद एक कई जीत हासिल कर चुकी है. इससे भाजपा का मनोबल सातवें आसमान पर है. ऐसे में पार्टी और उसके पितृ संगठन राष्ट्रीय स्यवंसेवक संघ (आरएसएस) की चाहत रही है कि ‘वामपंथ का गढ़’ कहे जाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) में भी उसका परचम लहराए. यही वजह है कि भाजपा को समर्थन देने वाली संघ की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने 2014 के बाद यहां खुद को मजबूत करने की भरसक कोशिश की है.

नौ फरवरी, 2016 को विश्वविद्यालय में देश-विरोधी नारे लगने के बाद एबीवीपी को अपनी ‘राष्ट्रवादी’ छवि मजबूत करने का मौका भी मिल गया था. इसके बावजूद रविवार को आए छात्रसंघ चुनाव के परिणामों में वामदलों की छात्र इकाइयों ने केंद्रीय पैनल की सभी चार सीटें जीतकर दक्षिणपंथी खेमे की उम्मीदों पर एक बार फिर पानी फेर दिया. वामदलों की यह जीत कितनी दमदार रही, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दूसरे नंबर पर रही एबीवीपी से उन्हें लगभग 18 फीसदी ज्यादा वोट मिले. जानकारों का मानना है कि इस चुनाव ने भाजपा और एबीवीपी को एक बार फिर साफ संदेश दे दिया है कि यहां उसकी जीत का ख्वाब पूरा होना लोहे के चने चबाने जैसी बात होगी.

वैसे विश्वविद्यालय की राजनीति पर नजर रखने वाले लगभग सभी लोग पहले से मान रहे थे कि इस बार भी वामदलों की ही जीत होगी. कैंपस में सक्रिय चार में से तीन वामदलों ने गठबंधन (लेफ्ट यूनिटी) बनाकर चुनाव लड़ा था और इनके पक्ष में अनुमान की यही मुख्य वजह थी. यह अनुमान सही भी साबित हुआ जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) की छात्र इकाई एआईएसए या आइसा (आॅल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) की गीता कुमारी ने अध्यक्ष पद के लिए एबीवीपी की निधि त्रिपाठी को 464 वोटों (10 फीसदी) के अंतर से हरा दिया. वहीं उपाध्यक्ष पद पर आइसा की ही सिमोन जोया खान ने जीत हासिल की. उन्हें एबीवीपी के दुर्गेश कुमार से 848 वोट (18 फीसदी) ज्यादा मिले हैं.

महासचिव पद पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) की छात्र इकाई एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन आॅफ इंडिया) के डुग्गीराला श्रीकृष्णा ने एबीवीपी के ही निकुंज मकवाना को 1,107 वोटों (24 फीसदी) के भारी अंतर से हराया. पांच साल पहले एसएफआई से अलग होकर नई पार्टी बनी डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन) के संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार शुभांशु सिंह ने एबीवीपी के पंकज केशरी को 835 वोटों (18 फीसदी) से मात दी है.

दूसरी ओर इस गठबंधन में शामिल होने से इनकार करने वाली भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) की छात्र इकाई एआईएसएफ (आॅल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन) का प्रदर्शन काफी फीका रहा. पार्टी की तरफ से अध्यक्ष पद की उम्मीदवार अपराजिता राजा (भाकपा नेता डी राजा की बेटी) केवल 416 वोट ही जुटा सकीं. वहीं संयुक्त सचिव पद के उम्मीदवार को महज 214 वोटों से संतोष करना पड़ा. कुल मिलाकर इस चुनाव में भी वामदलों का ही वर्चस्व रहा.

विभिन्न पदों के लिए दलों को मिलने वाले मत (कोष्ठक में मत प्रतिशत हैं)
विभिन्न पदों के लिए दलों को मिलने वाले मत (कोष्ठक में मत प्रतिशत हैं)

यह चुनाव क्या संदेश देता है

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) के लिए यह चुनाव सिर्फ इस मायने में खास कहा जा सकता है कि अब वह जेएनयू में दूसरे नंबर की पार्टी है. पिछले दो-तीन साल के दौरान उसके वोटों में चार-पांच प्रतिशत का इजाफा हो गया है. विश्वविद्यालय के एक छात्र प्रशांत त्रिवेदी भी इसकी तस्दीक करते हैं. वे बताते हैं कि चुनाव हारने के बावजूद एबीवीपी का प्रदर्शन पिछले चुनाव की तुलना में सुधरा है. हालांकि उनका मानना है कि उसकी चुनौतियां भी बढ़ गई हैं क्योंकि मोदी सरकार के आने के बाद उसके खिलाफ सभी वामदल एकजुट हो चुके हैं.

वहीं एक अन्य रिसर्च स्कॉलर ताराशंकर का मानना है कि वामदलों की एकजुटता न भी हो तब भी यहां एबीवीपी का जीतना मुश्किल है. वे कहते हैं कि जेएनयू में वामदलों को कैडरों की वजह से नहीं, उनके मुद्दों से वोट मिलते हैं. उनके मुताबिक विश्वविद्यालय के करीब दो तिहाई छात्र दक्षिणपंथी राजनीति से असहमत हैं इसलिए उनके वोट किसी न किसी वामपंथी उम्मीदवार को ही जाते हैं. वहीं एक अन्य छात्र कहते हैं कि जेएनयू के ज्यादातर वोटर लेफ्ट की उस पार्टी को ही वोट देते हैं जिसके जीतने की संभावना ज्यादा होती है.

​वैसे इस चुनाव में चारों पदों के लिए पड़े वोटों को जोड़कर देखें तो लेफ्ट यूनिटी के उम्मीदवारों को 39 फीसदी से अधिक मत मिले हैं, जबकि एबीवीपी को लगभग 21 फीसदी वोट ही मिल पाए. अगर वामदलों के खाते में एआईएसएफ के 3.40 फीसदी वोटों को भी शामिल कर लिया जाए तो उनके वोटों का प्रतिशत 42.8 फीसदी हो जाता है. यह एबीवीपी के वोटों का ठीक दोगुना है. इन समीकरणों और आंकड़ों को देखें तो जेएनयू में भविष्य में भी एबीवीपी के लिए रास्ता काफी मुश्किल ही कहा जाएगा.

तीसरी शक्ति के रूप में बाप्सा का उदय

2016 के चुनाव से जेएनयू की राजनीति में एक महत्वपूर्ण बदलाव बाप्सा (बिरसा-अंबेडकर-फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) के रूप में नई पार्टी का उभार होना है. दलित-आदिवासी-पिछड़ी जातियों को लक्ष्य करके बनाई गई यह पार्टी ब्राह्मणवाद के खिलाफ वामदलों से भी ज्यादा आक्रामक है. मुख्यधारा की किसी भी पार्टी से सीधा जुड़ाव न होने के चलते भी विभिन्न मसलों पर यह अपना पक्ष आक्रामक तरीके से रखती है. पिछले साल बाप्सा अपने पहले ही चुनाव में करीब 20 फीसदी मत पाकर तीसरे स्थान पर रही थी. इस बार भी सभी पदों पर इसके उम्मीदवार कुल मिलाकर 19.40 फीसदी मत पाकर तीसरे नंबर पर रहे.

यह जेएनयू की छात्र राजनीति में अहम बदलाव इसलिए भी है कि अभी तक पिछड़ी और दलित जातियों के वोटों पर वामदलों का स्वाभाविक दावा माना जाता था. लेकिन बाप्सा ने इस दावे को सीधी चुनौती दी है. आलोचक मानते हैं कि यह एबीवीपी जैसी दक्षिणपंथी पार्टियों की मुखर विरोधी भले ही है पर इसने उसके बजाय वामदलों को नुकसान पहुंचाया है. ताराशंकर भी मानते हैं कि बाप्सा के ज्यादातर सम​र्थक लेफ्ट के वोटर रहे हैं और उन्होंने अलग पार्टी इसलिए बनाई कि वे वामदलों से जातिगत शोषण से लड़ने के सवाल पर और आक्रामक होने की मांग करते हैं.

हालांकि जेएनयू की छात्र राजनीति पर नजर रखने वाले लोग कहते हैं कि निकट भविष्य में बाप्सा को जीतने के लिए अपने वोट बैंक में खासी बढ़ोतरी करनी होगी और यह तभी हो सकता है जब वामदलों की एकता बिखर जाए और सत्ता विरोधी बड़ी लहर तैयार हो जाए. ताराशंकर का यह भी मानना है कि बाप्सा को गुस्सा दिखाने के अलावा सकारात्मक और वैकल्पिक एजेंडा भी पेश करना होगा, ऐसा न होने पर वह वामदलों को हराने की बात नहीं सोच सकती.