प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने प्रशंसकों के लिए भगवान की तरह हैं. अक्सर उनके प्रशंसक दावा करते हैं कि उन्होंने जो किया है वह उनसे पहले किसी और ने नहीं किया. इसके बहुत से उदाहरण सोशल नेटवर्किंग प्लेटफ़ॉर्मों और मीडिया के ज़रिए देखने-सुनने को मिलते रहते हैं. लेकिन ऐसा भी कई बार हुआ है जब पीएम मोदी को लेकर प्रशंसकों के दावे झूठे या भ्रामक साबित हुए हैं. ऐसा ही एक उदाहरण इन दिनों भी सोशल मीडिया पर काफ़ी शेयर हो रहा है. एक वीडियो के ज़रिए यह जताने की कोशिश की जा रही है कि नरेंद्र मोदी से पहले किसी और नेता ने प्रधानमंत्री रहते हुए किसी अन्य व्यक्ति के पैर नहीं छुए. ऐसा दावा करने वाली एक फेसबुक पोस्ट का स्क्रीनशॉट नीचे दिया गया है.

घटना छत्तीसगढ़ की है और स्वच्छ भारत अभियान से जुड़ी है. ख़बर के मुताबिक़ 104 साल की कुंवर बाई ने घर में शौचालय बनवाने के लिए अपनी बकरियां बेच दीं. बाद में एक कार्यक्रम में पीएम मोदी ने उन्हें पुरस्कृत करते हुए उनके पैर छुए. इस पोस्ट को शेयर करनेवाले व्यक्ति ने भावनात्मक संदेश देते हुए कहा है, ‘यह वीडियो देखें और जानें कि पीएम नरेंद्र मोदी हमें क्या सिखाते और प्रेरित करते हैं. फिर वे आरोप पढ़िए जो उदारवादी और वामपंथी उन पर लगाते हैं. वे पीएम की ऐसी एक पोस्ट या ट्वीट नहीं दिखा सकते जिससे ग़लत संदेश गया हो. फिर भी उन्हें रोज़ गालियां मिलती हैं. इसकी वजह यह है कि वे बड़े लोगों की अपेक्षा आम लोगों का सम्मान करते हैं.’

पीएम मोदी के जिस भी प्रशंसक ने यह वीडियो देखा, भावुक हो गया. भारत जैसे बड़े देश का नेतृत्व करने वाले व्यक्ति का ऐसा विनम्र व्यवहार किसी भी व्यक्ति को प्रभावित कर सकता है. लेकिन प्रधानमंत्री रहते हुए किसी और व्यक्ति के पैर छूने वाले नरेंद्र मोदी पहले नेता हैं, ऐसा बिलकुल नहीं है.

ऊपर दी गई तस्वीर पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की है. साल 1999 के ‘माता जीजाबाई स्त्री शक्ति पुरस्कार’ के लिए तमिलनाडु की चिन्ना पिल्लई का नाम घोषित किया गया. 4 जनवरी, 2001 को दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में पुरस्कार लेने पहुंचीं चिन्ना पिल्लई जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के पैर छूने के लिए झुकीं तो वाजपेयी ने उन्हें रोका और ख़ुद झुककर उनके पैर छुए. हो सकता है कई लोग अब यह कहने लगें कि वाजपेयी भी तो भाजपा के ही नेता थे. इसका जवाब पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की नीचे दी गई तस्वीर देती है.


ओशो न्यूज़ डॉट कॉम पर अक्टूबर 2013 में प्रकाशित एक लेख में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यह तस्वीर देखी जा सकती है. इसमें वे केसरिया लिबास पहने एक व्यक्ति के पैर छू रहे हैं. लेख भी इसी विषय पर है, ‘जॉइज ऑफ बाउइंग डाउन’ यानी ‘झुकने के आनंद’. तस्वीर में बीजेपी के ‘मार्गदर्शक’ लाल कृष्ण आडवाणी को भी देखा जा सकता है. क्या अब नरेंद्र मोदी के प्रशंसक मनमोहन सिंह को भी मोदी सरीखा मानेंगे, पैर छूने के मामले में ही सही?

अब इसकी उलटी एक बात. मीडिया में ऐसे दावे किये जाते रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने लोगों से अपने पैर छूने को मना किया है. लेकिन साल 2008 का एक वीडियो एक अलग वाक़या दिखाता है. इसमें अमरेली के ज़िलाधिकारी तब मुख्यमंत्री रहे नरेंद्र मोदी के पैर छूते दिख रहे हैं.

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मोदी समर्यथकों का यह बचाव गलत नहीं है कि डीएम से ख़ुद मोदी ने नहीं कहा था कि वे उनके पैर छुए. लेकिन वे ऐसा बचाव बाक़ी बड़े नेताओं का तो नहीं करेंगे. उत्तर भारत में मायावती, मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, लालू यादव आदि कई नेता भी आदेश नहीं देते कि कोई उनके पैर छुए, लेकिन फिर भी पार्टी के आम कार्यकर्ताओं से लेकर ज़िलाधिकारी तक सभी उनके पांव छूते हैं. दक्षिण भारत में तो लेट ही जाते हैं. इसलिए क्या पैर छूने और छुआने के आधार पर किसी की प्रशंसा व आलोचना करने से बेहतर यह नहीं है कि ईमानदारी से उस व्यक्ति के काम का आकलन किया जाए!