एक बार फिर सबकी निगाहें तमिलनाडु की तरफ हैं. राज्य में सत्ताधारी एआईएडीएमके (अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) के प्रभावी धड़े (मुख्यमंत्री ईके पलानिसामी और उपमुख्यमंत्री ओ पन्नीरसेल्वम की अगुवाई वाला) ने आज पार्टी की आम सभा बुलाई है. बहुत संभावना है कि इस बैठक में अंतरिम महासचिव शशिकला नटराजन, उनके भतीजे टीटीवी दिनाकरन तथा परिवार के अन्य सदस्याें को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाने के फैसले पर मोहर लग जाए. बैठक के हंगामाखेज़ रहने की भी संभावना है क्योंकि पार्टी पर कब्जे की कोशिश में लगे शशिकला और दिनाकरन के समर्थक शायद इतनी आसानी से हार न मानें.

हालांकि इस अहम बैठक से पहले फिलहाल तो लग यह रहा है कि दिनाकरन और उनके समर्थकों में ज़बर्दस्त बेचैनी है. सिर्फ उनमें ही नहीं ‘बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने’ की आस लगाए बैठे विपक्ष में भी बेचैनी साफ दिख रही है.

अदालतों के चक्कर और उल्टे पड़ते दांव

दिनाकरन और उनके समर्थकों ने मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की थी. इसमें मांग की गई थी कि पलानिसामी और पन्नीरसेल्वम की जोड़ी को पार्टी की साधारण सभा की बैठक बुलाने से रोका जाए. दिनाकरन के समर्थक विधायक एस वेत्रीवल ने याचिका में दलील दी थी कि साधारण सभा की बैठक बुलाने का अधिकार सिर्फ महासचिव को है. उनका कहना था कि यह पद अभी अंतरिम रूप से शशिकला के पास है, और वे चूंकि आय से अधिक संपत्ति के मामले में जेल में हैं इसलिए उनके निर्देश पर काम कर रहे और उनकी ओर से उपमहासचिव बनाए दिनाकरन यह बैठक बुला सकते हैं, अन्य कोई नहीं.

लेकिन अदालत ने उनकी याचिका न सिर्फ ख़ारिज़ कर दी. बल्कि अदालत का वक़्त बर्बाद करने की वज़ह से विधायक पर एक लाख रुपए का ज़ुर्माना भी ठोक दिया. फैसला सुनाने वाले न्यायाधीश ने तो यहां तक कह दिया कि अगर याचिकाकर्ता विधायक बैठक में नहीं जाना चाहते तो घर बैठें या फिर निर्वाचन आयोग में अपील करें.

यही नहीं फेरा (विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम) के तहत दर्ज़ एक मामले में दिनाकरन के ऊपर जेल जाने का ख़तरा भी मंडरा रहा है. लेकिन चूंकि वे इस वक्त पार्टी के अंदरूनी हालात से दो-चार हो रहे हैं इसलिए वे चाहते हैं कि यह केस किसी तरह लंबा खिंच जाए. सो इस मक़सद से उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाई थी. इसमें मांग की गई कि उनके ख़िलाफ आरोप तय करने की प्रक्रिया तीन महीने के लिए टाल दी जाए. उन्होंने दलील दी कि वे इस मामले में मद्रास उच्च न्यायालय के आदेश की वजह से अपने आपको ‘पीड़ित’ जैसा महसूस कर रहे हैं.

लेकिन शीर्ष अदालत को उनकी दलील समझ में नहीं आई. उसने न सिर्फ दिनाकरन की याचिका ख़ारिज़ कर दी बल्कि उन्हें चेतावनी भी दी कि ऐसी ‘ओछी याचिका’ फिर लगाई तो जुर्माना ठोक दिया जाएगा. क़रीब 20 साल पुराने इस मामले में दिनाकरन पर आरोप है कि उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की पूर्व इजाज़त के बिना 1,04,93,313 अमेरिकी डॉलर की विदेशी मुद्रा हासिल की. फिर इस रकम को टैक्स हैवन कहे जाने वाले देश ब्रिटिश वर्जिन आइलैंड में स्थित अपनी कंपनी डिपर इन्वेस्टमेंट लिमिटेड के चालू खाते में जमा करा दिया.

प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने इस मामले में फेरा के उल्लंघन के आरोप में दिनाकरन पर 28 करोड़ रुपए का जुर्माना ठोका है. ईडी के ही आरोप पत्र के आधार पर विशेष अदालत ने इस साल 19 अप्रैल को दिनाकरन के ख़िलाफ आरोप तय कर दिए थे. लेकिन मद्रास उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगा दी. हालांकि अब जुलाई में उच्च न्यायालय ने भी रोक हटाते हुए विशेष अदालत को आदेश दिया है कि तीन महीने में इस मामले की सुनवाई पूरी की जाए. दिनाकरन ने इसी आदेश के ख़िलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी जिसमें उन्हें मुंह की खानी पड़ी.

राज्यपाल, निर्वाचन आयोग, सबके दरवाज़े पर दस्तक

अदालतों के अलावा दिनाकरन राज्यपाल, राष्ट्रपति और निर्वाचन आयोग के दरवाज़ों पर भी दस्तक दे चुके हैं. हालांकि इन जगहों से भी उन्हें अब तक आश्वासन ही मिले हैं. यक़ीनी तौर पर उनके हाथ खाली हैं. उन्होंने सबसे पहले 22 सितंबर को राज्यपाल सीएच विद्यासागर राव से मुलाकात की. साथ में पार्टी के 19 विधायक थे. उनके समर्थन को आधार बनाकर राज्यपाल को बताया कि पलानिसामी सरकार अल्पमत में आ गई है. उसे बहुमत साबित करने को कहा जाए पर राज्यपाल ने विधायकों की बग़ावत को पार्टी का अंदरूनी मसला कहकर टाल दिया.

इसके बाद दिनाकरन और उनके समर्थक भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) से मिले. यहां उन्होंने अर्ज़ी (कैविएट) लगाई और मांग की कि पार्टी के चुनाव चिन्ह से जुड़े मामले में फैसला देने से पहले उनका पक्ष सुना जाए. दरअसल दिनाकरन गुट को आशंका है कि पलानिसामी और पन्नीरसेल्वम के हाथ मिला लेने के बाद अब ईसीआई पार्टी चुनाव चिन्ह के मसले पर उनके पक्ष में फैसला दे सकता है. इसीलिए आनन-फानन में अर्ज़ी लगाई गई लेकिन ख़बरों की मानें तो ईसीआई दिनाकरन गुट की दलीलों को कोई ज़्यादा अहमियत देगा इसकी संभावना कम ही है.

इसके बाद अभी सात सितंबर को दिनाकरन और उनके समर्थक फिर राज्यपाल से मिले. इन सभी ने फिर वही मांग दोहराई कि पलानिसामी सरकार अल्पमत में है लिहाजा उसे विधानसभा में बहुमत साबित करने के लिए कहा जाए. मुख्यमंत्री पलानिसामी पर उन्होंने ‘पार्टी नेतृत्व (दिनाकरन के हिसाब से शशिकला) से धोखाधड़ी’ और ‘भ्रष्टाचार’ का आरोप भी लगाया. लेकिन जैसा कि एक सूत्र बताते हैं, ‘राजभवन में लगे दरख़्तों के पत्ते इस बार भी नहीं हिले हैं. यानी दिनाकरन की अपील को हीला-हवाली करके टाल ही दिया गया है.

विपक्ष तो राष्ट्रपति भवन का दरवाज़ा तक खटखटा आया है

दिनाकरन गुट की तरह ही बेचैनी तमिलनाडु के विपक्षी दलों, खासकर मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके (द्रविड़ मुनेत्र कड़गम) में है. उसे लगता है कि अगर विधानसभा में मुख्यमंत्री पलानिसामी को बहुमत परीक्षण के लिए कह दिया गया तो दिनाकरन गुट के विधायकों के समर्थन से विपक्ष उनकी सरकार गिरा सकता है. मौका अच्छा है बशर्ते उसे मिल भर जाए. इसीलिए 31 जुलाई को डीएमके की अगुवाई में विपक्ष का एक प्रतिनिधिमंडल राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से भी मिल आया. लेकिन बताते हैं कि राष्ट्रपति भवन से भी महज़ ‘मामले को देख लेने का आश्वासन’ ही मिला है.

राज्यपाल तो पहले ही कान नहीं दे रहे थे. सो अब बताया जाता है कि डीएमके के कार्यकारी प्रमुख और विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष एमके स्टालिन ने अपनी तरफ से तारीख़ तय कर दी है. राज्यपाल को ज्ञापन देकर लौटे स्टालिन ने मीडिया से बात करते हुए साफ कहा, ‘यह आख़िरी बार है जब हम इस मसले पर राज्यपाल से मिले हैं. हम एक सप्ताह तक उनके फैसले का इंतज़ार करेंगे. पलानिसामी सरकार बहुमत खो चुकी है. इसके बावज़ूद अगर वे सरकार को बहुमत साबित करने का आदेश नहीं देते तो हम अदालत का दरवाज़ा खटखटाएंगे. सीधे जनता की अदालत में जाएंगे.’

इस बेचैनी की चार वज़हें

दिनाकरन और विपक्ष की बेचैनी की चार वज़हें बड़ी साफ तौर पर नज़र आती हैं.

1. कमज़ोर होता समर्थन : अगस्त के दूसरे पखवाड़े में जब दिनाकरन के समर्थकाें ने पलानिसामी सरकार से बग़ावत की थी तो उनके पास 19 विधायक थे. इसके बाद यह संख्या 21 हुई और फिर जब जब 29 अगस्त को मुख्यमंत्री पलानिसामी ने पार्टी विधायकों की बैठक बुलाई तो उसमें 27 और नदारद हो गए. उस वक़्त माना गया कि ये विधायक भी दिनाकरन की तरफ झुक गए हैं. लेकिन जल्द ही हालात बदल गए. द हिंदू के मुताबिक अभी पांच सितंबर को मुख्यमंत्री ने जब अपने विधायकों को बुलाया तो उनके साथ 111 विधायक थे. यानी समझा जा रहा है कि दिनाकरन गुट के आठ-नौ विधायक पलानिसामी की तरफ खिसक आए हैं.

2. विधायकों की सदस्यता ख़त्म होने का ख़तरा : पलानिसामी सरकार के ख़िलाफ बग़ावत करने वाले विधायकों पर उनकी सदस्यता ख़त्म होने का ख़तरा भी मंडरा रहा है. पहले दिनाकरन को समर्थन देने वाले सभी 19 विधायकों को विधानसभा अध्यक्ष पी धनपाल ने नोटिस ज़ारी कर दिया है. उन्हें उनके ज़वाब के साथ 14 सितंबर को पेश होने को कहा गया है. यानी इस हिसाब से अगर विधानसभा अध्यक्ष ने इन विधायकों की सदस्यता रद्द की तो तय है कि मामला कोर्ट-कचहरी में उलझ जाएगा. सदन की संख्या 19 कम हो जाएगी और पलानिसामी सरकार आराम से कुछ दिन-महीने और अल्पमत में होने के बावज़ूद चलती रहेगी. यह स्थिति दिनाकरन गुट के लिए तो कतई मुफीद नहीं हो सकती

3. डेढ़ महीने बाद स्थानीय निकायों के चुनाव : तमिलनाडु में लंबे समय से स्थानीय निकायों के चुनाव टल रहे हैं. मगर अब शायद नहीं टल पाएंगे. मद्रास उच्च न्यायालय ने सरकार को ये चुनाव 17 नवंबर तक कराने का आदेश दिया है. यानी अब हर नेता/विधायक को जनता की अदालत में पेश होना है. भले ही इन चुनाव का विधायकों की सेहत पर कोई सीधा प्रभाव न पड़े लेकिन उनके विधानसभा क्षेत्र में पार्टी की जीत-हार का आगे असर पड़ना तय माना जा सकता है. ऐसे में अगर उनकी प्रतिबद्धताएं संदिग्ध रहीं तो ‘जनता माफ नहीं करेगी.’

4. ईपीएस-ओपीएस की जोड़ी भाजपा के साथ : राज्य के मौज़ूदा राजनीतिक हालात और आगामी स्थानीय निकाय चुनाव के मद्देनज़र राजनीतिक गठबंधन भी खुलकर सामने आने लगे हैं. अब तक यह माना ही जा रहा था कि एआईएडीएमके के सत्ताधारी धड़े (इसमें अब पलानिसामी-पन्नीरसेल्वम दोनों हैं) को केंद्र में सत्ता संभाल रही भाजपा का समर्थन है. यह धड़ा भी गाहे-बगाहे राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति चुनाव सहित अन्य कई मसलों पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार समर्थन करता रहा है. लेकिन अब यह समर्थन गठबंधन की शक्ल ले सकता है. राज्य के डेयरी विकास मंत्री केटी राजेंद्र बालाजी ने संकेत दिया है कि स्थानीय निकाय चुनाव में भाजपा के साथ गठबंधन किया जा सकता है.

सो, ऐसे में दिनाकरन और तमिलनाडु की विपक्षी पार्टियां अगर बेचैन हैं तो यह लाज़िमी ही है क्योंकि यहां राजनीतिक समीकरण ही नहीं उनकी पूरी धुरी ही बदलती नज़र आ रही है.