विराट कोहली के कोच राजकुमार शर्मा से जब उनके शिष्य की कामयाबी के बारे में पूछा जाता है तो वे उसके सहज आत्मविश्वास और असाधारण प्रतिभा को इसका प्रमुख कारण बताते हैं. इन दो खूबियों के अलावा भी एक और वजह है जिसका वे अक्सर जिक्र करते हैं. यह है उनके शिष्य के अंदर अपने लक्ष्य को पाने के लिए कुछ भी कर गुजरने का जूनून. यानी इन तीनों के मिश्रण के बाद ही विराट कोहली जैसा खिलाड़ी बनकर तैयार होता है.

पिछले कुछ सालों में भारतीय टीम के इस कप्तान के अन्दर एक और जूनून ने जन्म लिया है. यह जूनून है अपनी और अपनी टीम की फिटनेस. अपने लिए कोहली का लक्ष्य फिटनेस के उस स्तर को छूना है जहां केवल फुटबाल के दिग्गज लियोनल मेसी, क्रिस्टियानो रोनाल्डो और उसेन बोल्ट ही पहुंच सके हैं. उधर, अपनी टीम के मामले में वे अगले विश्व कप तक क्रिकेट जगत की सबसे फिट 11 खिलाड़ियों की टीम चाहते हैं.

बताते हैं कि कोहली के कारण ही अब भारतीय टीम के लिए फिटनेस और फील्डिंग प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल कर ली गई है. खिलाड़ियों को फिट रखने के लिए ऐसे-ऐसे नए तरीके अपनाए जा रहे हैं जो पहले कभी नहीं अपनाए गए. आइये जानते हैं इनके बारे में.

प्रैक्टिस के दौरान रैंडम फिटनेस टेस्ट

श्रीलंका दौरे से भारतीय टीम के फिटनेस ट्रेनर शंकर बसु ने किसी भी सीरीज के दौरान खिलाड़ियों की चपलता बनाए रखने के लिए ‘रैंडम फिटनेस टेस्ट’ जरूरी बना दिया है. इसके तहत हर अभ्यास सत्र के दौरान किसी भी खिलाड़ी को अचानक बुला लिया जाता है. फिर उसे उसकी विशेषता (बल्लेबाजी, गेंदबाजी और क्षेत्ररक्षण) से अलग एक कड़ी ट्रेनिंग ड्रिल्स से गुजरना होता है. इस दौरान खिलाड़ी का पूरा रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाता है जिस पर बाद में उससे लंबी चर्चा की जाती है.

Play

श्रीलंका दौरे पर टेस्ट और वनडे सीरीज के दौरान अलग अभ्यास सत्रों में रविचंद्रन अश्विन, चेतेश्वर पुजारा, विराट कोहली, केएल राहुल, शिखर धवन और पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को ‘रैंडम फिटनेस टेस्ट’ के लिए बुलाया गया था. दो बार रैंडम टेस्ट से गुजरने वाले सलामी बल्लेबाज शिखर धवन ने मीडिया को बताया, ‘फिटनेस का मुद्दा हमारे लिए हमेशा अहम रहा है, लेकिन अब इसका स्तर बढाते हुए इस अनिवार्य रूप से अहम हिस्सा बना दिया गया है क्योंकि एक खराब क्षेत्ररक्षण से खेल का रुख बदल जाता है.’

टीम प्रबंधन द्वारा लागू की गई इस फिटनेस व्यवस्था को सही करार देते हुए धवन कहते हैं, ‘आज का क्रिकेट 10 वर्ष पहले से काफी बदल गया है, अब खेल में काफी तेजी आई है जिसमें आपका फिट रहना सबसे ज्यादा जरूरी हो गया है. फिटनेस ऐसी चीज है जिस पर ऑस्ट्रेलिया, अफ्रीका और इंग्लैंड जैसी टीमें विशेष ध्यान देती रही हैं. उनके लिए फिटनेस का पैमाना तय है और अब हमारे लिए भी फिटनेस का नया पैमाना तय किया गया है.’

फिटनेस टेस्ट के नए मानक

भारतीय टीम से जुड़ी फिटनेस टीम के सदस्यों के अनुसार अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को देखते हुए फिटनेस के नए मानक बनाए गए हैं. वे बताते हैं कि उदाहरण के तौर पर ‘यो यो बीप टेस्ट’ को ही देखा जा सकता है. पहले यह केवल एक पारंपरिक बीप टेस्ट ही हुआ करता था और इसमें खिलाड़ी के स्कोर को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता था. अगर कोई खिलाड़ी 16.5 अंक जुटा लेता था तो उसे सबसे अच्छा माना जाता था.

लेकिन अब इस टेस्ट के मानक बदल दिए गए हैं. इसमें खिलाड़ी को हर हाल में 19.5 अंक जुटाने होते हैं. जानकार बताते हैं कि कप्तान विराट कोहली खुद ‘यो यो बीप टेस्ट’ टेस्ट में मानदंड स्थापित कर रहे हैं. वे हमेशा ही इसमें 21 का सर्वश्रेष्ठ स्कोर बनाते हैं जो अभी तक केवल ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी ही बना पाते थे. हालांकि, कोहली के अलावा महेंद्र सिंह धोनी, केएल राहुल, रवींद्र जडेजा और मनीष पांडे भी 21 का स्कोर बनाते आ रहे हैं.

Play

विश्वकप तक हर जगह के लिए विशेष फील्डर तैयार करने का लक्ष्य

क्रिकेट में शुरुआत से ही ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका जैसी टीमों के खिलाड़ी ही क्षेत्ररक्षण और फिटनेस को प्रमुख प्राथमिकता में शामिल करते आ रहे हैं. इस बात को पूर्व ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ी एडम गिलक्रिस्ट और वीरेंद्र सहवाग के उदाहरण से समझा जा सकता है. 2008 में भारत के खिलाफ एडिलेड में खेले जा रहे एक टेस्ट मैच में केवल एक कैच छूटने के बाद गिलक्रिस्ट ने संन्यास लेने का फैसला कर लिया था जबकि उस समय वे बेहतरीन बल्लेबाजी कर रहे थे. वहीँ, अगर सहवाग की बात करें तो कैच छोड़ने को लेकर उनकी कई बार आलोचना हुई फिर भी उन्होंने संन्यास के बारे में नहीं सोचा और टीम से निकाले जाने के बाद ही संन्यास की घोषणा की.

बहरहाल, अब ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के बाद भारत ऐसी तीसरी टीम है जो क्षेत्ररक्षण को बल्लेबाजी और गेंदबाजी के बराबर प्राथमिकता देती दिख रही है. पिछले दिनों भारतीय टीम के फील्डिंग कोच आर श्रीधर ने इस संबंध में टीम की भविष्य की योजनाओं पर काफी बात की. उन्होंने कहा, ‘हम 2019 विश्वकप में एक ऐसी भारतीय टीम देखना चाहते हैं जो दुनिया की सबसे बेहतरीन फील्डिंग टीम हो. हमने इस लक्ष्य के लिए रणनीति तैयार की है. हर एक खिलाड़ी की फील्डिंग पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है. मैच के दौरान खिलाड़ी की छोटी से छोटी गतिविधि को लिखा जा रहा है.’

श्रीधर आगे कहते हैं, ‘इस बात पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है कि कौन सा खिलाडी कहां पर सबसे अच्छी फील्डिंग करता है. फिर उसे उसी जगह के लिए तैयार किया जाएगा. एक बार ये अंदाजा लग जाने पर कि विश्व कप में कौन से 15 खिलाड़ियों को जाना है, मैं, रवि भाई और कप्तान विराट कोहली बैठकर इस पर निर्णय लेंगे.’ वे आगे जोड़ते हैं, ‘हमारा सबसे ज्यादा ध्यान स्लिप के लिए कुछ विशेष फील्डरों को तैयार करने पर है क्योंकि विश्व कप इंग्लैंड में होना है जहां सबसे ज्यादा स्लिप पर फील्डिंग मायने रखती है.’

विराट खुद खिलाडियों की फिटनेस पर ध्यान दे रहे हैं

विराट कोहली ने हाल ही में दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि ‘इन-फॉर्म’ और आउट-ऑफ़-फॉर्म’ जैसा कुछ भी नहीं होता. उनके मुताबिक इसके लिए 101 फीसदी फिट रहना जरूरी है. टीम के कुछ खिलाड़ियों की मानें तो इसी वजह से फील्डिंग कोच और फिटनेस ट्रेनर शंकर बसु के होने के बावजूद कोहली अपने खिलाड़ियों की फिटनेस पर नजर बनाये रखते हैं.

Play

भारतीय टीम के उभरते युवा स्पिनर कुलदीप यादव कहते हैं, ‘विराट भाई अन्य चीजों की तुलना में मुझे फिटनेस पर अधिक काम करने के लिए कहते रहते हैं...ये टीम के लिए भी अच्छा है. मुझे लगता है कि इससे मुझमें काफी सुधार हुआ है. जब मैं अंडर-19 भारतीय टीम के लिए खेलता था तो इतना फिट नहीं था. आज मैं महसूस करता हूं कि मैं पहले से कहीं अधिक फिट हूं.’

कुलदीप जैसी ही स्थिति केदार जाधव और जसप्रीत बुमराह की है. टीम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ये दोनों कई मौकों पर टीम के लिए निर्णायक भूमिका निभा चुके हैं और अब इनकी टीम में जगह भी लगभग पक्की हो चुकी है. लेकिन, फील्डिंग के मामले में ये दोनों एक कमजोर कड़ी नजर आते हैं. ऐसे में इनकी फिटनेस पर भी कोहली और फील्डिंग कोच की नजर बनी रहती है. यह भी बताया जाता है कि हर खिलाड़ी की फिटनेस का स्तर अलग-अलग होने के कारण ही कप्तान और कोच ने मिलकर हर खिलाड़ी के लिए अलग-अलग स्तर की फिटनेस ट्रेनिंग का कार्यक्रम भी तैयार किया है जिससे विश्व कप तक सभी की फिटनेस का स्तर एक जैसा किया जा सके.

टीम में चयन के लिए जरूरी मानकों में भी बदलाव

चैम्पियंस ट्रॉफी के फ़ाइनल में मिली हार के बाद भारतीय टीम के प्रमुख चयनकर्ता एमएसके प्रसाद, कप्तान विराट कोहली और कोच रवि शास्त्री के बीच टीम की कमियों को लेकर एक लंबी चर्चा हुई. बताया जाता है कि इसमें तय हुआ कि अब चयनकर्ता चयन के दौरान ‘शेप अप ऑर शिप आउट’ यानी ‘या तो फिट हो जाओ या बाहर’ की नीति अपनाएंगे. इस निर्णय के बाद श्रीलंका दौरे के लिए टीम का चयन हुआ और नई नीति की पहली गाज युवराज सिंह और सुरेश रैना पर गिरी जिन्हें टीम में केवल इसलिए नहीं लिया गया कि ये दोनों ‘यो-यो बीप टेस्ट’ में अच्छे अंक नहीं ला पाए. इससे पहले तक यो-यो बीप टेस्ट चयन का प्रमुख़ मानक नहीं हुआ करता था.

इस मामले पर विवाद बढ़ा और इसे लेकर जब एमएसके प्रसाद से सवाल किये गए तो उन्होंने खुद उस बैठक के बारे में बताया जिसकी खबरें पहले सूत्रों से मिली थीं. उन्होंने बताया, ‘चैंपियंस ट्रॉफी के बाद हमें लगा कि हमें एक और ज्यादा फिट और मजबूत टीम की ज़रूरत है, इसलिए हमने फिटनेस के स्तर को उठाने का निर्णय लिया है. इसके लिए नए फिटनेस मापदंड बनाए गए हैं और इनका सभी को कड़ाई से पालन करना है.’ प्रसाद ने आगे कहा, ‘इन नए मापदंडों को 2019 विश्व कप तक के लिए कई चरणों में बांटा गया है यदि कोई इन मापदंडों को पूरा करने में सफल नहीं हो पाता तो उसके चयन पर विचार नहीं किया जाएगा, फिर चाहें वह कितना भी बड़ा नाम क्यों न हो’

यानी अब भारतीय टीम में खेलने की हसरत रखने वाले सभी खिलाड़ियों के लिए अच्छा बल्लेबाज या गेंदबाज होने के साथ-साथ एक अच्छा फील्डर भी होना अनिवार्य है.