इस साल स्वतंत्रता दिवस के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कश्मीर को लेकर ज्यादा संवेदनशील नीति अपनाने का इशारा दिया था. उनका कहना था कि अलगाववाद के खिलाफ युद्ध ‘न गाली से जीता जा सकता है, न गोली से. बल्कि यह सभी कश्मीरियों को गले लगाने से ही जीता जा सकता है.’ अपनी चार दिन की कश्मीर यात्रा के दौरान गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री की इसी बात को आगे बढ़ाया है. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में कहा है कि वे सभी पक्षों से बात करना चाहते हैं और पूरे खुले मन से वहां आए हैं.

उन्होंने स्थानीय पुलिस और सुरक्षाबलों को मुआवजे और बेहतर हथियार-उपकरण देने का वादा किया है. इसके साथ गृह मंत्री ने अनुच्छेद 35ए को लेकर आशंकाएं भी दूर करने की कोशिश की और कहा कि केंद्र इस मामले में राज्य के लोगों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही कोई कदम उठाएगा. गृह मंत्री ने स्पष्ट किया है कि नाबालिगों के साथ अपराधियों की तरह व्यवहार नहीं किया जाना चाहिए. उन्हें जेल भेजने के बजाय किशोर संरक्षण गृहों में भेजा जाना चाहिए.

गृह मंत्री के इस दौरे से एक उम्मीद जगी है. इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि इस उम्मीद को कायम रखते हुए कैसे लोगों की चिंताओं-इच्छाओं पर प्रतिक्रिया दी जाए.

पिछले साल जुलाई में हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से कश्मीर में लगातार विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं. घाटी में इसके साथ असंतोष का माहौल गहराता गया और राजनीतिक संवाद के साथ-साथ राजनीतिक प्रक्रियाओं के लिए गुंजाइश कम से कम होती गई. बीते अप्रैल में यहां उप-चुनाव हुए थे और इसमें महज सात प्रतिशत मतदान हुआ. इस बीच सेना प्रमुख बिपिन रावत ने सेना द्वारा एक कश्मीरी युवा को ‘मानव ढाल’ बनाए जाने की घटना का बचाव किया और बयान दिया कि अगर सेना को कानून और व्यवस्था लागू करने की जिम्मेदारी मिली है तो ‘लोगों को हम से भयभीत होना चाहिए.’ रावत के रवैए से लगा कि वे जनता और सशस्त्र बल के बीच अलगाव को और बढ़ा रहे हैं.

इसके अलावा हाल ही में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने अलगाववादी नेताओं के ठिकानों पर छापामारी की है. यह छापामारी आतंकवादियों को फंड मुहैया कराने के आरोपों के चलते हुई है और इसके बाद अलगाववादी नेताओं को हिरासत में भी लिया गया. इन वजहों से भी घाटी में शांति के लिए राजनीतिक पहल की संभावनाएं और कम हो गईं. फिर भाजपा की स्थानीय इकाई ने अनुच्छेद 35ए की वैधता पर सवाल खड़ा कर दिया. यह प्रावधान विधानसभा को अपने यहां के स्थायी नागरिकों की परिभाषा तय करने का अधिकार देता है. इससे दूसरे राज्यों के लोग वर्षों तक रहने के बावजूद यहां के नागरिक नहीं बन सकते. इसको हटाए जाने की आशंका पर जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों की तीखी प्रतिक्रिया आई और इसकी मुखालफत ने इन सभी को एकजुट कर दिया.

राजनाथ सिंह के बयानों से उम्मीद जगी है कि जम्मू-कश्मीर में एक साल से जारी टकराव खत्म भले न हो, लेकिन इसका तीखापन कम जरूर हो सकता है. इसके बाद पहला कदम यह होना चाहिए कि राज्य में सत्ताधारी भाजपा-पीडीपी गठबंधन को मजबूत किया जाए और इसके लिए गठबंधन के आंतरिक टकराव को बेहतर तरीके से सुलझाने की जरूरत है. गृह मंत्री ने ‘सभी पक्षों’ से बातचीत की इच्छा जाहिर की है तो इस लिहाज से इन पक्षों में वे सभी राजनीतिक दल या उनके प्रतिनिधि शामिल होने चाहिए जो हिंसक गतिविधियों में भरोसा नहीं रखते.

केंद्रीय मंत्री ने यह भी कहा है कि युवाओं के साथ अपराधियों की तरह बर्ताव नहीं होना चाहिए, इस तरह सजा के बजाय सुधार का यह रवैया इस बात का प्रतीक होना चाहिए कि सरकार लोगों को अपने साथ लेना चाहती है. इसके लिए जरूरी है कि यह बयान राज्य सरकार और प्रशासन के सभी अंगों द्वारा आत्मसात किया जाए. राजनाथ सिंह ने यह भी कहा है कि वे घाटी में एक साल के दौरान पांच बार नहीं, पचास बार भी आ सकते हैं. हालांकि जो लचीलापन उन्होंने दिखाया है, वह राजनीतिक और नीतिगत कार्यान्वयन के स्तर पर दिखेगा ही, यह फिलहाल नहीं कहा जा सकता. (स्रोत)