लगता है उच्च अदालतों में जजों की नियुक्ति के मामले में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार फिर सुप्रीम कोर्ट से टकराव के रास्ते पर बढ़ रही है. डीएनए की ख़बर के मुताबिक केंद्रीय कानून मंत्रालय को लग रहा है कि उच्च न्यायालयों में अतिरिक्त जजों को स्थायी नियुक्ति देने से पहले उनके काम के आकलन की व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने चुपचाप ठंडे बस्ते में डाल दी है जो कि सही नहीं है.

न्यायपालिका के उच्च पदस्थ सूत्रों के मुताबिक मंत्रालय ने देश के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के मार्फत अपनी नाखुशी सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम तक पहुंचा दी है. उन्हें बताया है कि जजों की नियुक्ति के लिए तय दिशा-निर्देशों में यह अनिवार्य है कि पहले किसी उम्मीदवार के काम का आकलन हो. फिर इस आकलन के निष्कर्षों के आधार पर उसे अतिरिक्त जज से स्थायी न्यायाधीश बनाने या न बनाने का फैसला किया जाए. इसके साथ मंत्रालय ने सुप्रीम कोर्ट से यह भी कहा है कि वह हाल में ही की गईं जजों की नियुक्ति संबंधी अपनी अनुशंसाओं पर इस परिप्रेक्ष्य में फिर विचार करे.

बताते चलें कि पूर्व सीजेआई जेएस खेहर ने बीती 29 मार्च को एक पत्र सभी उच्च न्यायालयों को लिखा था. इसमें उन्होंने बताया था कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने तीन मार्च को हुई बैठक में अहम फैसला किया है. इसके तहत उच्च न्यायालयों के अतिरिक्त जजों को स्थायी नियुक्ति देने से पहले उनके कामकाज के पूर्व आकलन की व्यवस्था तुरंत खत्म की जा रही है. इसके बाद उन्होंने 16 अप्रैल को इसी पत्र की प्रति केंद्रीय कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद को भी भेजी थी. बताया जाता है कि खेहर के सेवानिवृत्त होने के बाद नए सीजेआई दीपक मिश्रा से उन्होंने इस पर अपनी आपत्ति जताई है.