तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन को पिछले कुछ समय से जर्मनी के विरुद्ध विषवमन का चस्का लग गया है. मौके-बेमौके जो मन में आता है, उगल बैठते हैं. छह सितंबर को अंकारा में उनकी पार्टी ‘एकेपी’ की एक सभा थी. जर्मनी की चांसलर (प्रधानमंत्री) अंगेला मेर्कल और जर्मनी में 24 सितंबर को होने वाले संसदीय चुनाव में मेर्कल के प्रतिद्वंद्वी मार्टिन शुल्त्स को निशाना बनाते हुए एर्दोआन ने कहा, ‘तुम लोग परेशान क्यों हो? मैं यह थोड़े ही कह रहा हूं कि तुम लोग नाज़ी या फ़ासिस्ट हो. मैं तो सिर्फ हालत बयान कर रहा हूं. इतना ही कह रहा हूं कि यह तुम जो कर रहे हो नाज़ीवाद और फ़ासीवाद है.’

जर्मनी में इस समय देश की सबसे बड़ी पार्टी सीडीयू (क्रिश्चन डेमोक्रेटिक यूनियन) और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी एसपीडी (सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी) के महागठबंधन की मिलीजुली सरकार है. सीडीयू की अध्यक्ष अंगेला मेर्कल चांसलर के तौर पर अपने चौथे कार्यकाल के लिए 24 सितंबर के चुनाव में जनादेश चाहती हैं. उधर, एसपीडी की ओर से उन्हें चुनौती देने वाले मार्टिन शुल्त्स पहली बार चांसलर बनने के सपने देख रहे हैं. दोनों के बीच हाल में देश के चार प्रमुख सार्वजनिक और निजी टेलीविज़न चैनलों द्वारा आयोजित डेढ़ घंटे की एक बहस हुई थी. बहस के आरंभ में ही तुर्की सबसे बड़ा मुद्दा बन गया. उसके बड़बोले अहंकारी राष्ट्रपति का मुंहतोड़ जवाब देने के प्रश्न पर दोनों प्रतिद्वंद्वी पूरी तरह एकमत हो गये, जबकि अतीत में उनकी राय जुदा हुआ करती थी. दोनों ने कहा कि चुनाव जीतते ही वे तुर्की के साथ यूरोपीय संघ की सदस्यता संबंधी सारी वार्ताएं रुकवा देंगे.

घोषणा सनसनीखेज़ समाचार बनी

यह घोषणा सनसनीखेज़ समाचार बन गयी. इसकी किसी ने अपेक्षा ही नहीं की थी. जर्मनी की – और यूरोपीय संघ की सरकार की तरह उसके आयोग की भी - घोषित नीति यही रही है कि तुर्की अपनी तरफ से चाहे जितनी उकसाऊ या भड़काऊ बातें करे, यूरोपीय संघ की सदस्यता संबंधी वार्ताओं का दरवाज़ा खुला रहेगा. मार्टिन शुल्त्स चांसलर-पद की दावेदारी के साथ चुनावी अखाड़े में कूदने से पहले यूरोपीय संसद के अध्यक्ष थे. टेलीविज़न बहस में उन्होंने कहा, ‘यूरोपीय संघ में तुर्की की सदस्यता का मैं स्वयं प्रबल समर्थक रहा हूं. किंतु मैं यदि चांसलर बना तो तुर्की के साथ यूरोपीय संघ की सदस्यता-वार्ताएं भंग कर दूंगा.’

मार्टिन शुल्त्स का कहना था कि तुर्की में इस समय जो कुछ हो रहा है, उसे देखते हुए कोई दूसरा विकल्प बचता ही नहीं. स्थिति एक ऐसे बिंदु पर पहुंच गयी है कि तुर्की के साथ आर्थिक व वित्तीय संबंधों सीमाशुल्क-संघ और यूरोपीय संघ की सदस्यता संबंधी वार्ताएं भंग करनी ही पड़ेंगी. उनकी मुताबिक वे यदि चांसलर बने फौरन यूरोपीय संघ के शीर्ष नेताओं की परिषद (यूरोपीय परिषद) से कहेंगे की सदस्यता-वार्ताएं रोक दी जायें.

तुर्की के लोकतंत्र से लोग संत्रस्त

चांसलर मेर्कल ने इस बहस में अपने प्रतिद्वंद्वी का समर्थन करते हुए कहा कि तुर्की सांस थम जाने वाली तेज़ गति के साथ ख़ासकर लोकतांत्रिक तौर-तरीकों से बहुत परे हट गया है. उनका यह भी कहना था कि उसे यूरोपीय संघ की सदस्यता मिल सकने की संभावना उन्होंने पहले भी कभी नहीं देखी थी. तुर्की के साथ इस समय हालांकि कोई वार्ताएं नहीं हो रही हैं, तब भी सदस्यता-वार्ताओं को भंग करने का निर्णय यूरोपीय संघ के देशों को एकमत से लेना होगा. यूरोपीय संघ में जर्मनी के दबदबे को देखते हुए यह निर्णय मुश्किल नहीं होना चाहिये, भले ही जर्मनी के घनिष्ठ मित्र फ्रांस के राष्ट्रपति और कुछ अन्य देशों के नेता तुर्की के साथ बातचीत भंग करने के प्रति अनमनापन दिखा रहे हैं,

तुर्की लगभग आठ करोड़ जनसंख्या वाला एक ऐसा मुस्लिम देश है, जिसके सात लाख 83 हज़ार वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का 97 प्रतिशत हिस्सा एशिया महाद्वीप पर और केवल तीन प्रतिशत यूरोपीय महाद्वीप पर पड़ता है. तब भी उसे एक एशियाई देश कहलाने में शर्म आती है. लगता है कि वह अब तक केवल ईसाई देशों वाले यूरोपीय संघ का सदस्य बन कर, ‘कौवा चला हंस की चाल’ वाली कहावत की तरह अपने आप को यूरोपीय मनवाने और महसूस करने के लिए बेचैन है. यूरोपीय देश नम्रतापूर्वक उसे कई बार संकेत दे चुके हैं कि वह यूरोप वालों की पांत में फिट नहीं बैठता. लेकिन यूरोपीय कहलाने को तरस रहे वहां के आत्ममुग्ध नेता इन संकेतों को अनदेखा कर देने के आदी बन गये हैं.

डेढ़ लाख लोगों की रोज़ी-रोटी छिनी

तुर्की के लिए यूरोपीय संघ की भविष्य में कभी सदस्यता पाने की जो भी क्षीण संभावना हो सकती थी, वह भी न के बराबर हो गई है. इसकी वजह है वहां 15-16 जुलाई 2016 वाली रात के कथित ‘सैनिक तख्तापलट के प्रयास’ की आड़ लेकर राष्ट्रपति एर्दोआन द्वारा चलाया जा रहा अविराम दमनचक्र. 50 हज़ार लोग अब भी जेलों में बंद हैं. सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और सेना के जनरलों से लेकर साधारण शिक्षकों, पत्रकारों और क्लर्कों तक, यहां तक कि साधारण धंधे-रोज़गार वालों तक, 1 50 हजार से अधिक लोगों की रोज़ी-रोटी छिन चुकी है. सरकार जिस किसी को जिस किसी भी कारण से पसंद नहीं करती, उस पर ‘आतंकवादी’ या ‘देशद्रोही’ होने का आरोप मढ़ कर उसकी छुट्टी कर देती है या जेल में ठूंस देती है.

170 से अधिक पत्र-पत्रिकाओं के साथ रेडियो-टेलीविज़न चैनलों को भी बंद कर दिया गया है. न केवल 160 स्थानीय पत्रकार, कई विदेशी पत्रकार भी बिना किसी केस-मुकदमे के जेलों में बंद हैं. जर्मनी की सबसे बड़ी साप्ताहिक पत्रिका ‘देयर श्पीगल’ के संवाददाता को जर्मन दूतावास के संरक्षण में पिछले वर्ष तुर्की से भागना पड़ा. इस समय भी जर्मन नागरिकता वाले पांच पत्रकार तु्र्की की जेलों में बंद हैं. मनगढ़ंत राजनैतिक आरोप झेल रहे 12 जर्मन नागरिकों सहित 50 से अधिक जर्मन नागरिक भी या तो जेलों में हैं या वे तुर्की से बाहर नहीं जा सकते.

जर्मनों को तुर्की न जाने की सलाह

हालत ऐसी हो गयी है कि जर्मनी की सरकार अपने नागरिकों को बार-बार आगाह कर रही है कि वे यदि तुर्की जाते हैं, तो किसी भी समय और किसी भी बहाने से वहां गिरफ्तार हो सकते हैं. जर्मनी सहित कई देशों के नागरिकों के साथ या तो ऐसा हो चुका है या उन्हें बिना कारण बताये हवाई अड्डे पर से ही बैरंग लौटा दिया गया है. तुर्की भी पीछे क्यों रहता! वहां की सरकार ने जर्मनी में रहने वाले या वहां जाने के इच्छुक तुर्कों के लिए बाक़ायदा एक चेतावनी जारी करते हुए उन्हें सावधान किया है कि यदि वे जर्मनी जाते हैं तो वहां उन्हें अपने साथ ‘विदेशियों के प्रति घृणा या नस्लवादी भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है.’ इसके उत्तर में चांसलर मेर्कल को कहना पड़ा कि हर तुर्की नागरिक बेखटक उनके यहां आ सकता है. उन्होंने कहा, ‘हमारे यहां किसी पत्रकार को गिरफ्तार नहीं किया जाता. किसी पत्रकार को हिरासत में नहीं लिया जाता. हमारे यहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और क़ानून का राज है.’

दूसरी ओर, तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन किसी को भी ‘आतंकवादी’ या ‘देशद्रोही’ बता कर उसे बिना किसी सुनवाई के पांच वर्षों तक जेल में सड़ाने का नया क़ानून बनाने तथा मृत्युदंड के पुराने क़ानून को वापस लाने के लिए अधीर हो रहे हैं. ऐसा हो जाने पर यूरोपीय संघ की उसकी सदस्यता के ताबूत में अंतिम कील लग जाना वैसे भी तय है. ऐसे देश, जहां मृत्युदंड का नियम हो, यूरोपीय संघ के कतई सदस्य नहीं बन सकते. लगता है, निरंकुश सत्ता के नशे में चूर एर्दोआन को यूरोपीय संघ की सदस्यता मिलने न मिलने की अब कोई परवाह ही नहीं रही. परवाह है तो इस बात की कि उनका तानाशाही दमनचक्र निर्बाध चलता रहे. मानवाधिकारों और लोकतंत्र के बारे में यूरोप वालों की कर्णकटु टीका-टिप्पणी उन्हें न सुननी पड़े. पर, वे इसे साफ़-साफ़ कहने के बदले ‘उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’ वाली धृष्टता पर उतर आये हैं.

‘सैनिक तख्तापलट’ की पोल

एर्दोआन ‘सैनिक तख्तापलट’ के प्रयास को - कभी अपने घनिष्ठ सहयोगी रहे और अब अमेरिका में रह रहे - फेतुल्ला ग्युलेन के मत्थे मढ़ते हैं. जर्मनी की वैदेशिक गुप्तचर सेवा बीएनडी ने ग्युलेन के बारे में तुर्की के दावों का खंडन करते हुए मार्च 2017 में कहा कि उसे इन दावों की पुष्टि करने वाले कोई संकेत-सुराग नहीं मिले. ‘बीएनडी’ के अध्यक्ष ब्रूनो काल का कहना था, ‘तुर्की ने विभिन्न स्तरों पर हमें पट्टी पढ़ाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसकी दाल गली नहीं.’ बीएनडी के अनुसार, ग्युलेन का आन्दोलन न तो इस्लामी कट्टरपंथी है और न ही आतंकवादी. वह धर्मनिरपेक्ष शिक्षा का एक नागरिक संगठन है. बीएनडी का इसीलिए मानना है कि आतंकवादी बता कर ग्युलेन के जिन वास्तविक या काल्पनिक अनुयायियों का सफ़ाया किया जा रहा है, वह तब भी होता जब तुर्की में कथित तख्तापलट जैसा कोई नाटक नहीं हुआ होता. दूसरे शब्दों में, तुर्की में ऐसे लोगों को हटाने का सफ़ाई-अभियान पहले से ही तय था जो किसी भी कारण से सरकार को पसंद नहीं थे.

तुर्की के राष्ट्रपति एर्दोआन तभी से आपे से बाहर हैं. अपनी जनता के सामने अपने भाषणों में वे जर्मनी की चांसलर, नीदरलैंड के प्रधानमंत्री या ऑस्ट्रिया के नेताओं को नाजी (हिटलर की विचारधारा वाले) और फ़ासिस्ट बताने लगे हैं, उनके लिए ‘आप’ या ‘तुम’ के बदले ‘तू’ का प्रयोग करते हैं. बीते अगस्त में वे जर्मनी जा कर वहां रहने वाले क़रीब 25 लाख तुर्कों से कहना चाहते थे कि उनमें से जिन के पास जर्मन नागरिकता है, उन्हें 24 सितंबर वाले चुनाव के दिन किसे वोट देना चाहिये. स्वाभाविक ही है कि जर्मनी ने अपनी भूमि पर चुनाव-प्रचार करने की अनुमति उन्हें नहीं दी. कोई भी सार्वभौम देश किसी विदेशी सत्ताधारी को अपने चुनावों में हस्तक्षेप करने की अनुमति नहीं देता. लेकिन, एर्दोआन जल-भुन गये. 18 अगस्त को जर्मनी में रहने वाले मताधिकार प्राप्त तुर्कों को तुर्की से ही संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वे वहां की ‘सीडीयू,’ ‘एसपीडी’ या ‘ग्रीन पार्टी’ को तो बिल्कुल ही वोट न दें. उनका कहना था, ‘ये पार्टियां तुर्की की शत्रु हैं... उन्हें तो एक अच्छा सबक सिखाना है.’ एर्दोआन स्वयं तो जर्मनी नहीं आ सके, पर उनकी सलाह और तस्वीर वाले बड़े-बड़े पोस्टर जर्मनी के कई शहरों में देखे गये हैं.

चांसलर मेर्कल के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग

जर्मनी में रहने वाले तुर्कों के नाम अपने संबोधन में एर्दोआन ने चांसलर मेर्कल के लिए अभद्र घटिया भाषा का प्रयोग करते हुए कहा, ‘जर्मनी के शिखर पर जो महिला बैठी है, उसे मैंने 4500 ऐसे आतंकवादियों की लिस्ट दी जिनका तुर्की प्रत्यर्पण चाहता है. पर उसने उसे लिया ही नहीं. दूसरी ओर वह महिला चाहती है कि तुर्की में गिरफ्तार जर्मनों को रिहा कर दिया जाये. मैंने उससे कहा, माफ़ कर, अगर तेरे पास एक न्यायप्रणाली है, तो हमारे पास भी एक न्यायप्रणाली है!’ जर्मनी के उप-चांसलर और विदेशमंत्री ज़ीगमार गाब्रिएल ने जब जर्मनी की प्रभुसत्ता में विदेशी हस्तक्षेप बताते हुए इस संबोधन की निंदा की तो एर्दोआन ने इसी घटिया भाषा में पलटवार किया. कहा, ‘तू कौन है, जो तुर्की के राष्ट्रपति के मुंह लगने की ज़ुर्रत कर रहा है? पहले अपनी औकात तो देख!’

एर्दोआन ने चांसलर मेर्कल को जिन 4500 कथित ‘आतंकवादियों’ की सूची देने की बात कही, वे मुख्य रूप से उनकी नीतियों से असहमत, जर्मनी में लंबे समय से रह रहे तुर्क प्रवासी हैं. इस सूची में बहुत से ऐसे लोगों के नाम भी बताये जा रहे हैं जो विदेशों में तुर्की के कूटनीतिक मिशनों के अधिकारी या कर्मचारी रहे हैं. इनमें वे लोग भी हैं जो नाटो की सैन्य कमान के अंतर्गत जर्मनी में तैनात तुर्क सैनिक रहे हैं और यूरोप में पढ़ या शोध कर रहे ऐसे लोग भी जिन्होंने तुर्की में जुलाई 2016 वाले कथित ‘तख्तापलट के प्रयास’ के बाद स्वदेश लौटने के बदले जर्मनी में रह सकने या शरण पाने की याचना की है.

जर्मनी में तुर्की के 500 जासूस

जर्मनी ने इन लोगों को अपने यहां उदारतापूर्वक शरण देने की नीति अपना रखी है. यह जानते हुए कि तुर्की ने जर्मनी में कम से कम 500 पूर्णकालिक जासूस और 6000 अन्य प्रकार के भेदिये फैला रखे हैं, जर्मन सरकार तुर्की द्वारा मांगे जा रहे इन राजनैतिक शरणार्थियों के बारे में कोई जानकारी नहीं देती. तब भी जर्मन मीडिया यह पता लगाने में सफल रहा कि मई 2017 तक तुर्की के 414 डिप्लोमैटिक पासपोर्ट-धारी कूटनीतिज्ञों, उच्च सरकारी अधिकारियों, जजों और सैनिकों को जर्मनी में राजनीतिक शरण दी गयी है. तुर्की के राष्ट्रपति वास्तव में अपनी निरंकुशता के परिणामों के बारे में सोचने के बदले जर्मनी या अन्य यूरोपीय देशों की उदारता को शत्रुतापूर्ण बताने में लगे हैं.

राष्ट्रपति एर्दोआन के हाथ इतने लंबे हो गये हैं कि अपने देश की गुप्तचर सेवा ‘एमआईटी’ के कार्यों के समन्वय और उसकी देखरेख उन्होंने अब सीधे अपने हाथों में ले ली है. इससे पहले यह काम प्रधानमंत्री के जिम्मे हुआ करता था. प्रधानमंत्री यिल्दीरिम भी हालांकि उनके ढिंढोरची ही हैं, विरोधी नहीं. राष्ट्रपति की अनुमति के बिना ‘एमआईटी’ के निदेशक के विरुद्ध – जो कि निश्चित है कि राष्ट्रपति की मनमर्ज़ी का अनुचर होगा – न तो कोई जांच-पड़ताल हो सकेगी और न उसे किसी संसदीय समिति के सामने गवाही के लिये बुलाया जा सकेगा.

एर्दोआन का अघोषित एजेंडा

‘एमआईटी’ को पहली बार यह अधिकार भी मिल गया है कि अब वही सेना और रक्षा मंत्रालय के भीतर भी ‘जांच-पड़ताल’ करेगी. एर्दोआन लंबे समय से अपने देश की सेना पर अपनी पकड़ बढ़ाने में लगे रहे हैं. इसका कारण यह है कि वर्तमान तुर्की के संस्थापक केमाल अकातुर्क के समय से ही सेना वहां इस बात की पहरेदार रही है कि धर्म (इस्लाम) और राज्यसत्ता के बीच एक स्वस्थ दूरी बनी रहे, राज्यसत्ता पर धर्म हावी न हो सके. एर्दोआन की पार्टी ‘एकेपी’ एक इस्लामवादी पार्टी है. कुछ लोगों के अनुसार उनका अघोषित एजेंडा यही है कि सौ साल पहले जिस तरह तुर्की का सुल्तान इस्लामी जगत का ख़लीफ़ा हुआ करता था, उसी तरह समय आ गया है कि तुर्की एक बार फिर इस्लामी बिरादरी की ख़लीफत कहलाए और वे उसके सुल्तान.

तुर्की में इस समय जर्मन मीडिया के जो पांच पत्रकार गिरफ्तार हैं, वे तुर्की मूल के जर्मन नागरिक हैं. उनमें से एक डेनिस युचेल जर्मनी के एक राष्ट्रीय दैनिक ‘दी वेल्ट’ के वहां संवाददाता थे. वे इस साल फ़रवरी से हिरासत में हैं, पर अभी तक उन्हें यह पता नहीं कि उन पर आरोप क्या हैं! आरोप अज्ञात भले ही हो, राष्ट्रपति एर्दोआन ने अपना फ़ैसला स्वयं ही सरेआम सुना दिया है: वह ‘जासूस है... आतंकवादी है.’ स्पष्ट है कि अदालती सज़ा जब भी सुनायी जागी, उनकी मर्ज़ी के अनुसार ही होगी. ऐसे जज, जो राष्ट्रपति महोदय के इशारों पर नाचते नहीं थे, बेरोज़गार हो चुके हैं या किसी जेल की सींखचों के पीछे अपने भाग्य को कोस रहे हैं.

‘तुर्की का 85 प्रतिशत मीडिया सरकारी लीक पर चल रहा है’

बारिस यारकादास तुर्की के सबसे बड़े विपक्षी दल ‘एचसीपी’ के सांसद हैं. सांसद बनने से पहले वे 20 वर्षों तक पत्रकार रहे हैं. अब भी पत्रकारों की दशा-दुर्दशा की खोज-ख़बर रखते हैं. एक जर्मन दैनिक से उन्होंने कहा, ‘अधिकतर पत्रकार डरे-सहमे हैं, अपनी बातों को खुद ही सेंसर करते हैं, दूसरों ने हिम्मत छोड़ दी और पत्रकारिता से मुंह मोड़ लिया. एर्दोआन ख़ुद तय करते हैं कि सरकार से नज़दीकी रखने वाले किस अख़बार का कौन प्रधान संपादक होगा और कौन राजधानी (अंकारा) में उसका संवाददाता बनेगा... सरकार-भक्त बड़े पत्रकारों की खूब कमाई हो रही है. वे आलीशान घरों में रहते हैं और लंबी-चौड़ी कारें चलाते हैं.... तुर्की का 85 प्रतिशत मीडिया सरकारी लीक पर चल रहा है.’

हिटलर के समय जर्मनी का भी यही हाल था. तुर्की के राष्ट्रपति रजब तैय्यब एर्दोआन आज उसी रास्ते पर चल रहे हैं, जिस रास्ते पर चल कर हिटलर और उसकी नाज़ी पार्टी ने जर्मनी का बंटाधार कर दिया. नाज़ियों के आत्मघाती अहंकार से शिक्षा लेने के बदले एर्दोआन नाज़ियों के 72 साल बाद नाज़ियों वाले ही अनिष्टकारी रास्ते पर चलने की भूल कर रहे हैं और कह रहे हैं कि वे नहीं, जर्मनी के वर्तमान नेता नाज़ीवादी हैं.

हिटलर के साथ एर्दोआन की एक और समानता हैः जर्मनी के नाज़ी यदि अपनी आर्य नस्ल की श्रेष्ठा का सिक्का जमाना चाहते थे तो ख़लीफ़त की चाह में एर्दोआन भी इस्लाम की श्रेष्ठता का सिक्का जमाना चाहते हैं. आईएस (इस्लामी स्टेट), हमास और मुस्लिम ब्रदरहुड को पालने-पोसने में उनका भी बड़ा हाथ रहा है. कुर्दों के खून की उन्हें उसी तरह प्यास रहती है जिस तरह हिटलर को यहूदियों के खून की प्यास रहा करती थी. सीरिया और इराक में जो अनावश्यक खून बहा है, उसके लिए एर्दोआन भी कम दोषी नहीं हैं.