ये तो सब जानते हैं कि योगी ने विधानसभा चुनाव लड़ने का मन भी बना लिया था. वे अयोध्या से लेकर गोरखपुर तक विधानसभा सीटों का निरीक्षण कर चुके थे. दोनों ही जिलों के कई विधायक उनके लिए अपनी सीटें छोड़ने का ऑफर भी दे चुके थे. अब सवाल यह है कि जब मुख्यमंत्री खुद चुनाव जीतकर विधानसभा में बैठना चाहते थे तो उन्हें ऐसा करने से क्यों रोका गया? सुनी-सुनाई से कुछ ज्यादा है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा फिलहाल कोई चुनाव नहीं लड़ना चाहती. भाजपा नेतृत्व को पक्की खबर मिली है कि चुनाव विधानसभा का हो या लोकसभा का, भाजपा के उम्मीदवार को हराने के लिए पूरा विपक्ष एक हो सकता है. इस सीधे मुकाबले में भाजपा के उम्मीदवार की विजय मुश्किल हो सकती है. इसलिए भाजपा ने जोखिम न उठाने का फैसला किया और योगी के चाहने के बावजूद उन्हें चुनाव लड़ने से रोक दिया गया.

एक और वजह है जिसकी चर्चा लखनऊ से लेकर दिल्ली तक है. योगी आदित्यनाथ अगर गोरखपुर से विधानसभा का चुनाव लड़ते तो मुमकिन है विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार होने के बावजूद चुनाव जीत जाते. लेकिन उस हालत में योगी के दो उपमुख्यमंत्रियों और दो मंत्रियों को भी चुनाव जीतना पड़ता. इसके लिए चार और सीटें खाली करानी पड़तीं. तमाम कोशिशों कें बाद भी उत्तर प्रदेश में भाजपा को ऐसी पांच सुरक्षित सीटें नहीं मिलीं जिनसे वह अपने सभी मंत्रियों की विजय सुनिश्चित कर सके.

अगर इनमें से एक भी चुनाव हार जाता तो पार्टी की जबरदस्त किरकिरी होती और उत्तर प्रदेश में प्रचंड बहुमत से बने माहौल की हवा निकल जाती. इसलिए भाजपा ने विधानसभा की पांच सीट खोजने का प्रयास बीच रास्ते ही छोड़ दिया और विधान परिषद की पांच सीटों का इंतजाम हुआ. इसके लिए ‘एडजस्ट’ करने का भरोसा देकर समाजवादी पार्टी के चार और बसपा के एक विधान पार्षद से इस्तीफा दिलवाया गया.

उत्तर प्रदेश में भाजपा की अभी कोई भी चुनाव न लड़ने की रणनीति से मुख्यमंत्री और उनके मंत्री पांच साल के लिए निश्चिंत हो गए हैं. लेकिन दिल्ली में उत्तर प्रदेश के एक कद्दावर भाजपा नेता के साथ इसी वजह से धोखा हो गया. सुनी-सुनाई है कि पूर्व केंद्रीय मंत्री कलराज मिश्र आजकल पार्टी नेतृत्व से बैहद नाराज़ चल रहे हैं. इस बार मंत्रिमंडल विस्तार में उनका मंत्रिपद चला गया. उन्हें भरोसा दिया गया था कि उन्हें राज्यपाल बनाया जाएगा. लेकिन अब कहा जा रहा है कि अगर राजभवन भेजा गया तो उन्हें अपनी लोकसभा छोड़नी पड़ेगी जोकि भाजपा अभी चाहती नहीं है.

पूर्वी उत्तर प्रदेश से ताल्लुक रखने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार बताते हैं कि कलराज मिश्र को भाजपा अध्यक्ष ने भरोसा दिया था कि उन पर कैबिनेट में 75 वर्ष की उम्र सीमा का बंधन लागू नहीं होगा. इस बाबत अमित शाह ने एक बार बयान भी दिया. लेकिन जब मंत्रिमंडल विस्तार की बात आई तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ा.

सुनने में ये बातें आश्चर्यचकित करने वाली हैं कि 2014 में 80 में से 73 लोकसभा सीटें जीतने वाली पार्टी अब लोकसभा की एक सीट पर भी चुनाव कराने से बचना चाहती है. उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बंपर बहुमत पाने वाली पार्टी पांच विधानसभा सीटों पर चुनाव कराने से भी पीछे हट रही है. आखिर ऐसी नौबत आई कैसे?

सुनी-सुनाई है कि गुजरात चुनाव से पहले किसी भी सूरत में भाजपा माहौल अपने पक्ष में बनाकर रखना ही चाहती है. ऐसा हिसाब भी निकाला जा रहा है कि अब योगी आदित्यनाथ के शहर गोरखपुर में भी लोकसभा चुनाव गुजरात चुनाव के बाद ही हो तो अच्छा रहेगा.