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इस शुक्रवार को कंगना रनौत की फिल्म सिमरन रिलीज हो रही है और इसके प्रमोशन के लिए वे आजकल अलग-अलग मंचों पर नजर आ रही हैं. बीते हफ्ते कंगना एक न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू को लेकर चर्चा में थीं. इसमें उन्होंने एक वक्त खुद से जुड़े रहे कई बड़े नामों के बारे में हैरतअंगेज खुलासे किए थे. इसी के साथ दो दिन पहले ‘द बॉलीवुड डीवा सॉन्ग’ टाइटल के साथ उनका एक वीडियो यू-ट्यूब चैनल एआईबी पर जारी हुआ है. कंगना बॉलीवुड के लैंगिक भेदभाव वाले व्यवहार बारे में जो बातें लंबे समय से कहती आ रही हैं, वीडियो उन्हीं पर आधारित है. यह वीडियो तमाम न्यूज वेबसाइटों की वायरल कैटेगरी में नारीवादी विशेषणों के साथ नजर आ रहा है. इसके साथ ही सोशल मीडिया पर हो रही चर्चाओं में भी इसे क्रांति के उद्घोष की तरह लिया जा रहा है.

लेकिन एक बात जिस पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है वह यह कि (कथित) नेक इरादे से बनाए गए इस व्यंगात्मक वीडियो की भाषा और तरीका उतना ही सेक्सिस्ट है जितना कि हमारा फिल्म उद्योग. वीडियो सबसे ज्यादा जोर लगाकर इस बात की शिकायत करता नजर आता है कि हमारा सिनेमा महिलाओं को ऑब्जेक्टिफाई करता है, लेकिन यहां विरोधाभास यह है कि यह कहते हुए वीडियो भी ठीक वही कर रहा होता है. इस गाने का मुखड़ा है – ‘कॉज आई हैव वजाइना रे...’ यह फिल्म रॉय के ‘चिट्टियां कलाइयां’ की पैरोडी है और वजाइना को महिला होने का एकमात्र प्रतीक मानकर अपने ‘नेक’ इरादे हमारे सामने रखने की कोशिश करता है. यह वीडियो सीधे-सीधे यह कहने की बजाय कि मैं महिला हूं इसलिए मेरे साथ ऐसा हो रहा है, यह कहता है कि मेरे पास वजाइना यानी स्त्री जननांग है इसलिए मेरे साथ ऐसा हो रहा है.

सवाल यह है कि अगर कलाइयों को ऑब्जेक्टिफाई करना गलत है तो वजाइना को करना कैसे सही हो गया! महिलाओं की पहचान को सिर्फ उनके जननांग तक सीमित कर देना भी कैसे सही हो सकता है! इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करना क्या बिल्कुल वैसा ही नहीं है जैसे हम सामने वाले को नंगा बताने के लिए अपने ही कपड़े उतारना शुरू कर दें!

कुछ लोगों की राय यह है कि ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बातें ज्यादा चुभती हैं. लेकिन क्या ऐसा करने के लिए ‘वजाइना...’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना जरूरी है. क्या इसके लिए कुछ और बेहतर और क्रिएटिव नहीं सोचा जा सकता था. क्या महिलाओं के जननांग के इतने फूहड़ प्रयोग के जरिये उनसे जुड़े मुद्दों पर ध्यान खींचना उतना ही सेक्सिस्ट नहीं है, जितना स्क्रीन पर महिलाओं की कमर या क्लीवेज दिखाना? क्या यह महिलाओं और उनके शरीर को उसी तरह अपने फायदे के लिए एक्सप्लॉइट करना नहीं है जैसा अक्सर बॉलीवुड में होता रहा है. यहां पर बॉलीवुड कम से कम इस मायने में इन विरोध करने वालों से बेहतर हो जाता है कि वह जो करता है, उसे करते हुए, अपने आप को महान और क्रांतिकारी नहीं बताता.

एआईबी अलग-अलग मुद्दों पर मजेदार और ईमानदार वीडियो बनाता रहा है जो अपने कंटेट के चलते लोकप्रिय भी हुए हैं, लेकिन इस बार उसने कंटेंट की भरपाई सिर्फ कंट्रोवर्सी से करने की कोशिश की है. पता नहीं क्यों एआईबी के निर्देशक तन्मय भट्ट सहित ज्यादातर क्रिएटिव व्यक्ति यह समझने से चूक जाते हैं कि सिनेमा और सोशल मीडिया के लिए फेमिनिज्म वैसे भी दुधारू गाय है, इसके लिए बम फोड़कर नींद तोड़ने वाले अंदाज में कुछ दिखाने की जरूरत नहीं है. या फिर शायद उन्हें यह लगता है कि फेमनिज्म का इतना इस्तेमाल किया जा चुका है कि उसमें अब नया करने के नाम पर इसके अलावा कुछ और नहीं किया जा सकता.

किसी बड़े मकसद को आड़ बनाकर पेश की गई ऐसी रचनात्मकता इसलिए भी सही नहीं मानी जा सकती कि यह स्वस्थ बातचीत का माहौल बनाने के बजाय, पहले से जारी किसी बहस को गलत दिशा में ले जाने की वजह बन जाती है. इस लिहाज से अगर लैंगिक पक्षपात गलत है तो विरोध जताने के ये तरीके भी गलत की श्रेणी में ही आने चाहिए. और अगर इस वीडियो का मकसद इतना ही वजनदार और यह इतना ही क्रिएटिव होता तो कंगना रनौत खुद वीडियो के आखिरी दस सेकंड में इस बात की सफाई देती क्यों नजर आती हैं कि यह गाना उन्होंने नहीं लिखा है!