तुलसीदास ने अपने रामचरित मानस की शुरुआत में ही संतों के बारे में लिखा है. संत कौन होते हैं, कैसे होते हैं, समाज के लिए उनके होने की उपयोगिता क्या है. इसमें एक स्थान पर वे लिखते हैं- ‘बंदउं संत समान चित ,हित अनहित नहिं कोइ.’ यानी मैं संतों को प्रणाम करता हूं, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु! वही तुलसीदास रामचरित मानस के अंत में आते-आते कहते हैं कि

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी। कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी।।
जाके नख अरु जटा बिसाला। सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला।।’

यानी जो आचारहीन है उसे ही कलियुग में ज्ञानी और बैरागी कहा जाता है. और जिसने अपने नाखून बढ़ा लिए और लंबी-लंबी जटाएं रख लीं, उसे ही कलियुग में प्रसिद्ध तपस्वी कहा जाता है.

जिन तुलसी, कबीर और नानक को हमने संतों का दर्जा दिया हुआ है, उन्हें स्वयं अपने आप में संत होने का गुमान तो नहीं था, लेकिन संतों और असंतों की पहचान उन्हें अवश्य थी. कबीर ने तो सबसे ज्यादा कटाक्ष संतों का वेष धारण करनेवाले असंतों पर ही किया है. हालांकि इसके पीछे उनकी करुणा ही थी कि असंत भी इन कटाक्षों से चेतकर संत बनने का सही मार्ग चुन लें.

स्वयं कबीर के शब्दों में, साधु भया तो क्या भया, माला पहिरी चार। बाहर भेस बनाइया, भीतर भरा भंगार।’ या फिर यह कि तन को जोगी सब करै, मन को करै न कोय। सहजै सब सिधि पाइये, जो मन शीतल होय।।’ लेकिन आज के कथित संतों के बीच अपने नाम के आगे-पीछे लंबे-लंबे और हास्यास्पद विशेषण लगाने की होड़ मची हुई है. कोई भी अपने नाम के साथ ‘स्वामी’ और ‘महाराज’ लगा बैठता है. जिन्हें देखो वही अपने साथ शास्त्री, आचार्य, महामण्डलेश्वर, प्रतिवाद भयंकर, शास्त्रार्थ-महारथी, तर्कपंचानन, विद्यावाचस्पति, विद्यावागीश, विद्यावारिधि, साहित्यालंकार और नये-नये विशेषण लगाए बैठे हैं.

जबकि हम पहले के ऋषियों तथा संतों को देखें तो नारद, सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार, व्यास, वसिष्ठ, शुकदेव आदि सादे नाम हैं. नानक, रैदास, रज्जब और मीरा को किसी उपाधि की जरूरत नहीं पड़ती. इसी तह कबीर को देखें तो वे अपनी पूरी वाणी में अपना नाम हमेशा ‘कबीर’ ही बोलते हैं. यदि कहीं विशेषण आता भी है, तो कबीर से साथ केवल ‘दास’ लगाते हैं.

आजकल जातिगत या पारिवारिक सरनेम के रूप में तो लोग फिर भी ‘दास’ लिख लेंगे, लेकिन कथित संतों को अपने आपको ‘दास’ कहने में लज्जा आती है. इनमें से कुछ लोग तर्क देंगे कि दास तो गुलामी का शब्द है. पहले दास-प्रथा थी, इसलिए उससे उपजा शब्द दास रखना ठीक नहीं है. परन्तु गुलाम दास और संतों-भक्तों के नामों में लगे दास से कोई सम्बन्ध ही नहीं है. जैसे कोई अपने आप को स्वामी या साहेब लिख ले, तो वह मन-इन्द्रियों पर विजयी नहीं हो जाएगा. और जिसने अपने मन तथा इन्द्रियों पर सचमुच विजय पाई है उसके नाम में कुछ भी विशेषण लगा हो या न लगा हो, वह वास्तव में स्वामी ही होगा.

दरअसल संसार के हर मनुष्य में और हर तत्व में ईश्वर के दर्शन करनेवाले संत हों, तभी तो उनमें आध्यात्मिक दास बनने की विनम्रता और सहजता आएगी. अभी तो कई लोग इस विशेषण तक से घबरा जाते हैं. और जिन्होंने ‘दास’ लगा भी रखा है, उनमें दासत्व वाली विनम्रता, समर्पण और करुणा कम होती है, महंती का अहंकार ज्यादा होता है.

हमने इसी मंच पर हाल के एक आलेख में यह प्रश्न उठाया था कि बहरूपियों के दौर में हम सच्चे संतों की पहचान कैसे करें? यह संयोग ही है कि इसी बीच ‘अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद’ नाम के एक संगठन ने कथित तौर पर कुछ फर्जी संतों की सूची जारी की है और आगे भी ऐसी और सूचियां जारी करने की बात कही है. यह एक विचित्र स्थिति है जिसमें अब संतों को भी आधिकारिक मान्यता और लाइसेंस प्रदान करने की बात की जा रही है.

कुछ भोले लोगों को प्रथम दृष्ट्या यह ठीक भी लग सकता है कि चलो अब कोई ऐसा अधिकरण तो सामने आया जो उनकी सुविधा के लिए यह फैसला कर दे कि कौन असली संत है और कौन नकली. फिर इससे उन भोले श्रद्धालुओं के कलेजों को तात्कालिक ठंडक भी पहुंच सकती है, जो स्वयं को इन कथित संतों द्वारा ठगा गया महसूस करते होंगे.

लेकिन गौर से देखने पर इसकी दूसरी परतें भी साफ नज़र आने लगती है. मनुष्य के सामाजिक इतिहास के एक लंबे दौर में ऑर्गेनाइज्ड रिलीजन या धर्मसंस्था अपने आप में एक सत्ता का रूप धारण करती गई है. पहले इस सत्ता का स्वरूप सामुदायिक और सामाजिक भर होता था. लेकिन जब से यह राजनीति के साथ जा जुड़ी, तब से इसने समाज में विभाजन और हिंसा को बढ़ाने का ही कार्य किया है. यूरोप में क्रूसेड और रिफॉर्मेशन से लेकर पश्चिम एशिया में चल रहे गृहयुद्धों तक धर्म की यही राजनीति काम करती रही है. आज भारत में भी स्थिति यह हो गई है कि धर्म का आध्यात्मिक स्वरूप कहीं पीछे छूटता जा रहा है और इसका राजनीतिक स्वरूप ही स्थापित होता जा रहा है.

सच्चे संत वास्तव में मानव धर्म के पहरुए होते थे. उनकी सामाजिक हैसियत का कारण उनका त्याग और तप से भरा संग्रह रहित और सत्यनिष्ठ जीवन होता था. एकमात्र संत ही ऐसे होते थे जिन्हें न राजनीति के प्रति आकर्षण होता था और न ही राजनेताओं से भय होता था. कठिन से कठिन समय में भी संत सत्य बोल सकते थे. इसलिए उल्टे राजनीति ही संतों से भय खाती थी. लेकिन बदले दौर में जबसे कथित संतों को वैराग्य की जगह वैभवशाली जीवन का रोग लगा, तबसे वह राजनीति के हाथों के खिलौने बनते गए हैं. उनकी आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति क्षीण होती गयी है. उनकी समता और निष्पक्षता बरकरार नहीं रह पाई है. और वह निर्वैर क्या हो पाएंगे जबकि उनमें आपस में ही घोर कलह मची रहती है.

अभी हाल तक ज्योतिर्मठ के दो शंकराचार्यों के बीच कोर्ट में इस बात का मुकदमा चला है कि उनमें से असली शंकराचार्य कौन हैं. इनमें से एक शंकराचार्य इलाहाबाद उच्च न्यायालय में नकली साबित हुए, तो अब वे राजनीतिक स्तर पर इसकी लड़ाई लड़ रहे हैं. एक राजनीतिक पार्टी पहले का आशीर्वाद लेती है, तो दूसरी राजनीतिक पार्टी दूसरे की पीठ ठोकती है कि कोर्ट के कहने से क्या होगा, हम तो आप ही को असली शंकराचार्य मानते हैं. आप बस घूम-घूम कर हमारा और हमारी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार करते रहिए.

पिछले संसदीय चुनावों में तो शंकराचार्यों ने किसी पार्टी के पक्ष में तो किसी के विरोध में प्रचार तक किया था. कथित साधु और साध्वियां तो सांसद से लेकर मंत्री तक बने बैठे ही हैं. यह तो स्थिति है हमारे आज के कथित निर्भयी, निर्वैर और निष्पक्ष साधु-संतों की.

किसी समय बुद्ध के सामने आते ही अंगुलिमाल जैसे क्रूर हत्यारे के पसीने छूट गए थे और उसके हाथ कांपने लगे थे. हाल तक विनोबा के सामने चंबल के बागियों ने स्वेच्छा से आत्मसमर्पण किया था. लेकिन आज उल्टे मठाधीशों और महंतों के साथ बंदूकधारी अंगरक्षकों की फौज चलती है. हत्यारों का हृदय-परिवर्तन वे क्या कर पाएंगे, जो स्वयं अपनी मृत्यु से इतना भय खाते हैं? चेलों, अंधभक्तों और धन-संपदा का इतना संग्रह कर लिया है कि अब इसके लिए भी कलह मची रहती है कि इसका उत्तराधिकारी कौन होगा. ऐसे ही संतों के लिए कबीर ने एक रमैनी में कहा था-

ऐसा योग न देखा भाई। भूला फिरै लिये गफिलाई।।
महादेव को पंथ चलावै। ऐसो बड़ो महन्त कहावै।।
हाट बजारै लावै तारी। कच्चा सिद्ध माया प्यारी।।

तो आज के विज्ञापनकारी और आत्मप्रचारक महंतों को माया ही प्यारी है. इसलिए वे राजनीति और सत्ता के दास और मोहरे हो गए हैं. उन्हें खुद से कहना और कहलवाना पड़ रहा है कि वे सचमुच के संत हैं. आनेवाली नस्लों को हम ज्यादा दिनों तक मूर्ख बनाए नहीं रख पाएंगे. काल के इस चक्र में देर-सवेर ऐसे लोग और समुदाय स्वयं अपनी महत्ता खो रहे हैं और जल्दी ही पूरी तरह खो देंगे. ये कालबाह्य हो जाएंगे. अंधविश्वास के घनघोर अंधेरे में भी ज्ञान का एक ही दीया काफी होगा. अध्यात्म का तो विज्ञान ही इस नींव पर खड़ा हुआ है कि उसे कोई संस्थात्मक बिचौलिया या एजेंसी नहीं चाहिए. संतों का जीवन ही उनका संदेश होता था, इसलिए उनकी वाणी में प्रभाव होता था. वे स्वयं उदाहरण बनते थे. अंधभक्तों का मालिक या भगवान बनकर खुद को पुजवाते नहीं थे.

अब संस्थात्मक अखाड़े में अब इस बात की राजनीतिक कुश्ती लड़ी जाएगी कि असली, आधिकारिक और मान्यता प्राप्त संत कौन है और नकली कौन. इसके बाद आप ट्रेनी, इंटर्न और प्रोबेशनरी संतों का सर्टिफिकेट भी बांटेंगे. जिस ‘अखाड़ा परिषद’ ने संतों को प्रमाण-पत्र बांटने का ठेका लिया है, उनकी खुद की राजनीतिक निष्ठा जगजाहिर है. अब ऐसे संगठन हमें क्या बताएंगे कि कौन संत है और कौन असंत. स्वयं इस परिषद के किसी संत की निर्वैरता, निष्पक्षता और समदर्शिता के बारे में कौन सी सर्वस्वीकार्यता हमारे बीच बची है. यह तो वही बात हुई कि आप मियां फजीहत, औरों को नसीहत.

सच्चे और ढोंगी संत की पहचान हम कैसे करेंगे उसके लिए कबीर दास कह गए हैं-

साधु-साधु सब एक हैं, जस अफीम का खेत।
कोई विवेकी लाल हैं, और सेत का सेत।।’

और यह भी कि

फाली फूली गाड़री, ओढ़ि सिंह की खाल।
सांच सिंह जब आ मिले, गाड़र कौन हवाल।।’

तो अफीम के खेत की तरह या सिंह की खाल में भेड़ की तरह संत और असंत को हम अपने खुद के विवेक से पहचानेंगे. आज की पीढ़ी के तेवर में और उन्हीं के शब्दों में आपसे कहें तो ऐसे कहेंगे कि ‘आप रहने दीजिए, आपसे ना हो पाएगा’.