देश में हिंदू-मुस्लिम शरणार्थियों के साथ भेदभाव की एक नई बहस शुरू हो सकती है. क्योंकि केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार एक तरफ तो म्यांमार से आए रोहिंग्या शरणार्थियों को देश से बेदखल करने की तैयारी कर रही है. वहीं पाकिस्तान के पूर्वी हिस्से (अब बांग्लादेश) से भारत में आकर बसे चकमा और हजोंग शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता दिए जाने की तैयारी की जा रही है. सूत्रों के हवाले से डीएनए अख़बार ने यह ख़बर दी है.

अख़बार ने केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से बताया है कि चकमा और हजोंग शरणार्थियों को भारतीय नागरिकता देने के मसले पर बुधवार को ही एक उच्चस्तरीय बैठक बुलाई गई है. इसकी अध्यक्षता केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह करेंगे. इसमें अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी हिस्सा ले रहे हैं क्योंकि यह मामला सीधे तौर पर उनके राज्य से जुड़ता है. मंत्रालय के एक अधिकारी इसकी पुष्टि करते हुए बताते हैं कि इस बैठक में इन शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए विभिन्न तौर-तरीकों पर विचार किया जा सकता है.

बताते चलें कि चकमा और हजोंग शरणार्थियों की तादाद भारत में करीब एक लाख है. ये 1960 के दशक में पूर्वी पाकिस्तान से भारत के पूर्वाेत्तर इलाकों, ख़ासतौर पर अरुणाचल में आ बसे थे. उस वक़्त पूर्वी पाकिस्तान के काप्ती बांध के ओवरफ्लो हो जाने से आई बाढ़ के कारण ये लोग अपनी ज़मीन से उजड़ गए थे. चूंकि इनके पास अब तक भारत की नागरिकता नहीं है इसलिए जिन इलाकों में ये रहते हैं वहां मूलभूत सुविधाओं के लिए भी ये लोग तरसते रहते हैं. इसीलिए 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इन्हें नागरिकता देने का केंद्र को निर्देश दिया था.

लेकिन चूंकि इस प्रस्ताव का पूर्वोत्तर में स्थानीय स्तर पर विरोध हो रहा है इसलिए अब तक इन्हें नागरिकता नहीं दी जा सकी. हालांकि अब धीरे-धीरे उसका रास्ता बनता दिख रहा है. यहां एक बात और ग़ौर करने की है कि चकमा शरणार्थी मूल रूप से बौद्ध समुदाय से ताल्लुक रखते हैं. जबकि हजोंग हिंदू समुदाय से. और यही तथ्य आगे किसी बहस को हवा दे सकता है. क्योंकि रोहिंग्या शरणार्थी मुस्लिम हैं जिन्हें म्यांमार ने अपना नागरिक मानने से इंकार करते हुए वहां से खदेड़ दिया है. और अब भारत राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें बेदख़ल कर रहा है.