एक लेखक को गोलियों से भूनकर शांत कर दिया गया है तो उसके बाद अब दूसरे को मानहानि के दीवानी और फौजदारी मुकदमों से चुप कराने की कोशिश है. यहां हम प्रसिद्ध इतिहासकार रामचंद्र गुहा की बात कर रहे हैं. एक इंटरव्यू में रामचंद्र गुहा ने चर्चित पत्रकार गौरी लंकेश की हत्या में संघ परिवार का हाथ होने की संभावना जताई थी. इस पर भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें लीगल नोटिस भेजकर अपने बयान के लिए माफी मांगने को कहा है. ऐसा न करने पर पार्टी ने उन पर मानहानि का मुकदमा करने की चेतावनी दी है.

गुहा ने कई दूसरे नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं की तरह आशंका जताई थी कि गौरी लंकेश की हत्या की वजह उनके हिंदू राष्ट्रवाद विरोधी विचार हो सकते हैं. वहीं भाजपा समर्थकों ने आरोप लगाया था कि नक्सलवादी गौरी लंकेश की गतिविधियों से नाराज थे.

सार्वजनिक बहस के दौरान आमतौर पर विचारधाराओं को लेकर एक-दूसरे पर हमला किया जाता है, यहां विवादास्पद तर्क दिए जाते हैं, निजी हमले भी होते हैं और कभी-कभार हिंसा के लिए उकसाया भी जाता है. लेकिन इस बहस के बीच निजी हमले को राजनीतिक हमले और हिंसा को आक्रामकता से अलग करके देखना महत्वपूर्ण है ताकि इस प्रक्रिया में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बची रहे.

रामचंद्र गुहा ने गौरी की हत्या के पीछे व्यक्ति विशेष या पार्टी का नाम नहीं लिया है. अगर सामान्य आरोपों के आधार पर ही मानहानि के केस दायर किए जाने लगें तो फिर इनका अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर बुरा असर पड़ेगा.

अगर हर आरोप के बदले आरोप लगाने वाले को अदालत में घसीटा जाएगा तो फिर देश में किसी भी प्रकार की राजनीतिक बहस की गुंजाइश नहीं बचेगी. अगर यह मान भी लिया जाए कि गुहा ने इशारों-इशारों में किसी पर आरोप लगाया था तो हमें यह भी सोचना चाहिए कि चुनाव के समय नेता और राजनीतिक दल सीधे-सीधे ही एक-दूसरे पर कितने झूठे-सच्चे आरोप मढ़ देते हैं.

इस तरह यह साफ-साफ दिख रहा है कि मानहानि का मुकदमा रामचंद्र गुहा को चुप कराने की कोशिश है. और यह भद्दी कोशिश अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की यही छवि पेश करेगी कि हमारे यहां लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है.

तीन दिन पहले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने विदेशी राजनयिकों के एक समूह से मुलाकात की थी. इस दौरान उनका कहना था, ‘हिंदू होने का मतलब कुछ विशेष पहनना और खाना नहीं है. इसके साथ ही हिंदुत्व का मतलब किसी पर कुछ जबर्दस्ती थोपना भी नहीं है.’ देश में बढ़ रही असहिष्णुता और पिछले दिनों भीड़ द्वारा की गई हिंसा के चलते भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचा है. संघ प्रमुख ने अपने इस संदेश से भारत की छवि बचाने की कोशिश की है, लेकिन गुहा जैसे बुद्धिजीवी, जिनकी किताबें दुनियाभर में पढ़ी-सराही जाती हैं, को धमकाने की कोशिशें इस संदेश को बेमानी कर सकती हैं. (स्रोत)