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भटकते सुरों में ‘सेल्फी मैंने ले ली आज’ गा-गाकर ढेर सारा नाम कमाने वाली ढिंचक पूजा फिलहाल ट्रेंडिंग लिस्ट और खबरों, दोनों से बाहर हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी जगह खाली पड़ी है. आजकल पूजा की जगह एक नए यूट्यूबर ओमप्रकाश मिश्रा लोकप्रियता बटोर रहे हैं. दिलचस्प यह है कि खुद को रैप किंग बताने वाले ओमप्रकाश अपने किसी ताजा कारनामे की जगह से नहीं, बल्कि करीब दो साल पहले अपलोड किए गए अपने एक वीडियो को लेकर चर्चा में हैं. 2015 में जारी किया गया मिश्रा का यह वीडियो, जिसे वो ‘अंटी की घंटी’ कहते हैं, पिछले दिनों किसी देसी ह्यूमर की वेबसाइट ने खोज निकाला. इसके बाद यह क्रिंज पॉप से जुड़े लिस्टिकल का हिस्सा बनकर पॉपुलर होना शुरू हो गया. इसे यू-ट्यूब पर करीब 27 लाख से ज्यादा बार देखा जा चुका है.

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क्रिंज पॉप की बात करें तो इसकी खासियत होती है कि यह इतना बेसुरा और फूहड़ होता है कि इसे सुनकर हंसी आना स्वाभाविक है. यह कुछ लोगों को मजेदार लगता है और इसीलिए पसंद भी किया जाता है. इसके उदाहरण ‘सेल्फी मैंने...’ फेम ढिंचक पूजा और ‘मैन काइंड एंजेल’ के लिए जाने गए पाकिस्तानी सिंगर - ताहिर शाह - हैं. बात अगर सिर्फ क्रिंज पॉप के मजे लेने और फेसबुक-ट्विटर पर शेयर करने तक ही सीमित होती तो इसके बारे में बात करने की जरूरत भी नहीं थी. लेकिन इस तरह के फूहड़ गानों का प्रभाव इससे कहीं ज्यादा होने लगा है.

बीते 11 सितंबर को दिल्ली के कनॉट प्लेस में हजारों लोग जोर-जोर से ‘आंटी की घंटी’ गाते हुए नजर आए. ऐसा नहीं है कि यूं ही चलते-फिरते लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई थी. ये सारे लोग बाकायदा एक फेसबुक इवेंट के जरिए यहां पर इकट्ठा हुए थे. यह इवेंट शिट इंडियन सेज नाम के एक फेसबुक पेज ने आयोजित किया था जिसका विषय था ‘शाउटिंग – बोलना आंटी आऊं क्या.’ 17 सितंबर को ऐसा ही एक आयोजन मुंबई की मरीन ड्राइव पर भी होना है जिसे अनऑफिशियल – ब़ॉम्बे हाई कोर्ट नाम के पेज ने आयोजित किया है. फेसबुक पर दोनों ही इवेंट पोस्ट्स में करीब 15-15 हजार लोग इसमें इंटरेस्टेड दिखे और लगभग तीन से चार हजार लोग इसमें शामिल होने का इरादा जताते नजर आए.

‘शाउटिंग – बोलना आंटी आऊं क्या’ जैसे इवेंट और ‘अंटी की घंटी’ जैसे गाने सिर्फ इसलिए बुरे नहीं हैं कि ये सोशल मीडिया के एक हिस्से का मानसिक दिवालियापन दिखाते है. ये इसलिए और भी बुरे हैं कि इनके जरिये इंटरनेट का खतरनाक उदारवाद असल दुनिया में भी पेंठ बनाने की कोशिश कर रहा है. भाषाई शिष्टाचार की हर मर्यादा को ताक पर रखने वाले ‘अंटी की घंटी’ के बोलों को अगर सुनें तो पता चलता है कि यह किस तरह से महिलाओं से जुड़ी कुंठा का गान है. अगर हम कनॉट प्लेस में हुई इवेंट का हिस्सा बन चुके हैं या मरीन ड्राइव वाली का बनने वाले हैं तो हमें सोचना होगा कि आगे से महिलाओं के बारे में किस तरह की और कैसी टिप्पणियों को हमें गलत कहने का अधिकार होगा और किन्हें नहीं!

क्योंकि ‘बोलना आंटी आऊं क्या’, कनॉट प्लेस या मरीन ड्राइव पर गर्व से चिल्लाने की नहीं शर्म से सर झुकाने देने वाली बात है.