फिल्मकार हंसल मेहता के लिए यह हफ्ता बेहद खास होने जा रहा है. 11 सितम्बर को उनके निर्देशन में बनी ‘ओमेर्टा’ का टोरंटो फिल्म फेस्टिवल में प्रीमियर हुआ है. पाकिस्तानी आतंकवादी उमर सईद शेख पर आधारित इस फिल्म में मुख्य भूमिका राजकुमार राव ने निभाई है. वहीं 15 सितम्बर को कंगना रनोट अभिनीत ‘सिमरन’ हिंदुस्तान में रिलीज होगी. हंसल की इस फिल्म में कंगना एक ऐसी तलाकशुदा गृहणी का किरदार निभा रही हैं जो चोर बन जाती है. इन फिल्मों से इतर हंसल मेहता ऑल्ट बालाजी की वेब सीरीज ‘बोस : डैड/अलाइव’ के भी क्रिएटिव प्रोड्यूसर हैं जिसमें राजकुमार राव, सुभाष चंद्र बोस के किरदार में नजर आने वाले हैं.

हंसल मेहता के करियर ने 2013 में आई ‘शाहिद’ नामक बॉयोपिक से दोबारा रफ्तार पकड़ी थी. उससे पहले वे ‘दिल पे मत ले यार’ (2000), ‘छल’ (2002) और ‘वुडस्टॉक विला’ (2008) बना चुके थे जिन्हें खास पसंद नहीं किया गया.

सत्याग्रह की सहयोगी वेबसाइट स्क्रोल के साथ बातचीत में हंसल मेहता ने ‘सिमरन’ और ‘ओमेर्टा’ के निर्माण से जुड़ी कई दिलचस्प बातें साझा की हैं. इस बातचीत के अंश :

इस हफ्ते आपकी फिल्म ‘सिमरन’ हिंदुस्तान में रिलीज होने जा रही है तो वहीं ‘ओमेर्टा’ टोरंटो में रिलीज हो चुकी है. कैसा लग रहा है?

फिल्में बनाने के लिए यह बेहद बढ़िया समय है. मेरी खुशकिस्मती है कि मुझे इन फिल्मों के लिए कंगना और राजकुमार जैसे दो सर्वश्रेष्ठ एक्टर मिले. ‘सिमरन’ और ‘ओमेर्टा’ दोनों ही मेरे लिए खास फिल्में हैं.

‘सिमरन’ को लेकर मैं वैसे भी बहुत उत्साहित हूं. मेरे हिसाब से यह एकदम मजेदार फिल्म है, बेहद मनोरंजक और एक ऐसी फिल्म जिस पर मैं गर्व करता हूं. लंबे अरसे बाद मैंने ऐसी कोई फिल्म बनाई है जिसमें मेरा मुख्य किरदार मरता नहीं है! जब आप थियेटर छोड़कर जाएंगे, तो शर्तिया आपके चेहरे पर एक लंबी सी मुस्कान होगी.

आखिर किस तरह ‘सिमरन’ की स्क्रिप्ट एक क्राइम ड्रामा कहानी से शुरू होकर स्लाइस-ऑफ-लाइफ कॉमेडी बनी?

2014 से ही मैं कंगना के साथ काम करना चाहता था. लेकिन कोई विषय नहीं मिल रहा था. 2015 में ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ की शूटिंग के समय भी मैंने उनसे संपर्क साधा, लेकिन तब भी ऐसा कोई सब्जेक्ट तय नहीं हो पाया जिस पर हम दोनों सहमत हों.

इसके कुछ समय बाद मैं एक फिल्म फेस्टिवल अटेंड करने अमेरिका चला गया और वहां मैंने छोटे-मोटे क्राइम करने वाले बेहद साधारण प्रवासियों के बारे में पढ़ा. वो आर्टिकल्स मैंने कंगना से साझा किए और उन्होंने हां करते हुए कहा कि चलो करते हैं!

मेरी हर फिल्म की स्क्रिप्ट वक्त के साथ विकसित होती है. ‘सिमरन’ की कहानी भी हमेशा से एक प्रवासी की कहानी थी, लेकिन बाद में हमने उसमें ह्यूमर डाला और बेहद नजदीक से एक प्रवासी की जिंदगी को देखना शुरू किया. इससे हुआ ये कि धीरे-धीरे स्क्रिप्ट बदल गई. गुजराती समुदाय भी कहानी का हिस्सा बन गया, जो कि मेरे खुद के कल्चरल बैकग्राउंड का हिस्सा रहा है और क्राइम, सिमरन के कैरेक्टर ग्राफ का एक दूसरा हिस्सा बना रहा.

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कंगना रनोट के साथ ‘सिमरन’ आपकी पहली फिल्म है.

बिलकुल. वे बहुत काफी लगन के साथ काम करती हैं और मैं उनकी बुद्धिमता की कद्र करता हूं. बतौर एक अभिनेत्री वे लगातार आपको चौंकाती हैं. खूब तैयारी के साथ आती हैं लेकिन साथ ही स्पॉन्टेनियस भी हैं... वे हमारी पीढ़ी के सर्वश्रेष्ठ एक्टरों में से एक हैं.

लेखक अपूर्व असरानी के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा?

मैं इस सवाल का जवाब देकर विवाद नहीं खड़ा करना चाहता. एक जवाब सोशल मीडिया पर 20 अलग-अलग तरह की बातों का सबब बन जाता है.

एक खबर के अनुसार सेंसर बोर्ड (सीबीएफसी) को ‘सिमरन’ में कंगना द्वारा बोली गई भाषा पर आपत्ति है. क्या यह बात सच है?

यही दुख की बात है. यह बिना सच्चाई जाने प्रकाशित की गई रिपोर्ट है. अगर सेंसर बोर्ड कुछ ऐसा करता तो मैं वो पहला व्यक्ति होता जो आपत्ति दर्ज कराता. याद कीजिए, मैंने तब भी आवाज उठाई थी जब ‘अलीगढ़’ के ट्रेलर को एडल्ट सर्टिफिकेट मिला था. इस फिल्म के लिए सीबीएफसी ने बस कुछ ऑडियो कट्स मांगे थे और मैंने उनकी बात मानी है. इन कट्स के बारे में मैं शिकायत नहीं कर सकता क्योंकि वे लोग भी पुराने दिशा-निर्देशों से बंधे हैं.

अगर ये दिशा-निर्देश, यानी कि गाइडलाइन्स ही मुख्य वजह हैं, तो क्या सेंसर बोर्ड का अध्यक्ष बदलने से कुछ होगा?

नहीं. मेरा हमेशा से मानना है कि हम व्यक्ति-विशेष पर जरूरत से ज्यादा फोकस करते हैं. मैं तकरीबन 20 साल से फिल्में बना रहा हूं और मैंने कई तरह के चेयरपर्सन देखे हैं. हर किसी का अपना व्यक्तित्व होता है, राजनीतिक विचारधाराओं की तरफ झुकाव होता है और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि होती है. ‘दिल पे मत ले यार’ के दौरान आशा पारेख चेयरपर्सन थीं तो ‘अलीगढ़’ के समय में लीला सैमसन. लेकिन हम आखिर कब तक व्यक्ति-विशेष पर इस मुद्दे को केंद्रित करते रहेंगे? असल काम है गाइडलाइन्स को बदलना. इसके लिए एक नया सिनेमेटोग्राफर एक्ट तुरंत ड्राफ्ट किया जाना चाहिए.

आपकी फिल्म ‘ओमेर्टा’ का मुख्य किरदार उमर शेख निहायत ही अंसवेदनशील व्यक्ति है. इस बारे में कुछ बताइए?

बतौर एक फिल्मकार आप चुनौतियां ढूंढ़ते हैं. ‘शाहिद’, ‘सिटीलाइट्स’ और ‘अलीगढ़’ के बाद मैं अपनी ही फिल्ममेकिंग के बने-बनाए तौर-तरीकों को बदलना चाहता था क्योंकि त्रासदी में डूबी फिल्में अब मैं आसानी से बना सकता हूं. ‘सिमरन’ के साथ भी मैंने एक खुशनुमा फिल्म बनाने की कोशिश की है.

वहीं ‘ओमेर्टा’ में उमर शेख कठोर या असंवेदनशील जरूर है, लेकिन वो फिल्म एक कैरेक्टर स्टडी है. किस तरह शैतान या ईविल होना भी एक इंसानी विशेषता है. इस फिल्म में हम एक ऐसे दिमाग को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं जो दुनिया को नष्ट करने के लिए ही साजिशें रचता है. एक आदमी जिसका परिवार है, आम जिदंगी है फिर भी वो तबाही मचाने के एक ऐसे सफर पर निकलता है जिसे वो अपनी नजरों में सही ठहरा सके. इस किरदार के बहाने, ‘ओमेर्टा’ उस वक्त को समझना भी है, जिसमें हम जी रहे हैं.

राजकुमार राव के साथ यह आपकी चौथी फिल्म है.

‘बोस : डैड/अलाइव’ को गिने तो पांचवीं बार हम साथ काम कर रहे हैं. हमारे इस रिश्ते को परिभाषित करना भी थोड़ा मुश्किल है! वो और उसका परिवार मुझे पसंद है और मैं हमेशा उससे कहता हूं कि मैं अहसानमंद हूं कि उस वक्त वो मेरे दफ्तर आया, जब कि मैं ‘शाहिद’ की कास्टिंग कर रहा था. बिना राजकुमार के ‘शाहिद’ नहीं होती, और ‘शाहिद’ नहीं होती तो मैं आज यहां नहीं होता.

‘बोस : डैड/अलाइव’ से आप किस तरह जुड़े?

एकता कपूर और उनकी टीम ‘बोस : डैड/अलाइव’ की स्क्रिप्ट पर डेढ़ साल से काम कर रही थी. हालांकि इस भूमिका के लिए राजकुमार को बाद में चुना गया. वहीं मैंने मार्च में क्रिएटिव प्रोड्यूसर की जिम्मेदारी संभाली थी. इस शो को पुलकित निर्देशित कर रहा है जो कि युवा होने के साथ-साथ एक बढ़िया निर्देशक भी है.

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फिल्मकार बनने की अपनी यात्रा के बारे में कुछ बताइए?

काफी रोमांचक यात्रा रही! मैं संयोगवश ही फिल्मकार बना. बचपन काफी अच्छा बीता, कुछ बुरी यादें नहीं रहीं, और बड़े होकर मैं कम्प्यूटर प्रोग्रामर बन गया. लेकिन जिंदगी बेहाल तब हुई जब मैंने फिल्ममेकिंग बिजनेस में कदम रखने का फैसला लिया!

चूंकि मुझे हमेशा से खाना पकाना बेहद पसंद था तो मैंने एक फूड शो का प्रस्ताव जी टीवी के सामने रखा था. इसी तरह संजीव कपूर के साथ ‘खाना खजाना’ शुरू हुआ और संजीव कपूर ही मेरी पहली ‘सक्सेस स्टोरी’ थे!

खर्चा चलाने के लिए मैं फिल्मों का संपादन भी किया करता था. विशाल भारद्वाज और मनोज बाजपेयी से इसी तरह दोस्ती हुई. उसी समय जी टीवी शॉर्ट फिल्में बनाने के लिए लोगों को ढूंढ़ रहा था और मैंने उनके लिए एक लघु फिल्म बनाई, हालांकि मुझे फिक्शन बनाने का कोई अनुभव नहीं था, लेकिन यह लोगों को पसंद आई और उन्होंने मुझे फीचर फिल्में बनाने का प्रस्ताव दे दिया. तब मैं इस पर भरोसा नहीं कर पा रहा था, लेकिन देखिए, आज ‘सिमरन’ मेरी 14वीं फिल्म है और मुझे अभी भी हैरत होती है कि आखिर कैसे मैंने फिल्में बनाना शुरू कर दिया था? वो भी इतनी सारी!

बुरे वक्त में आपने जिंदगी की गाड़ी कैसे संभाली?

छोटे-मोटे काम-धंधे कर के. मैंने टेलीविजन में काम किया, विज्ञापन बनाए और किसी तरह सर्वाइव किया. ये आसान नहीं था. मुझे असफलताओं से भी उबरना था, लेकिन अच्छी बात यह रही कि मैंने फिल्में बनाना नहीं छोड़ा. हालांकि ‘वुडस्टॉक विला’ (2008) के बाद मैंने फैसला कर लिया कि मुझे रुकना ही होगा. कुछ सालों तक फिल्म इंडस्ट्री को छोड़ना होगा और खुद को फिर से गढ़ना होगा. कुछ सालों बाद फिर मैंने ‘शाहिद’ (2013) बनाई.

‘शाहिद’ से पहले के आपके करियर पर कभी-कभार ही चर्चा होती है. इस बारे में कुछ बताइए?

मैंने ‘जयते’, ‘दिल पे मत ले यार’ और ‘छल’ जैसी तीन दिलचस्प फिल्में बनाई हैं. लेकिन चूंकि वे अपने वक्त से आगे की फिल्में थीं इसलिए इन्हें पर्याप्त दर्शक नहीं मिले, और न ही सही मंच नसीब हुआ.

आज अगर आप पूछें तो ‘मैं दिल पे मत ले यार’ फिर से बनाना चाहूंगा. उस वक्त भी मैं इसे सुपर 8 कैमरा पर शूट करना चाहता था (जिस पर 60 और 70 के दशक में होम वीडियोज बना करते थे और नोलन जैसे फिल्मकार भी जिन्हें अपनी युवावस्था में उपयोग कर चुके हैं). लेकिन ‘सत्या’ के बाद मनोज बाजपेयी बड़े स्टार बन चुके थे और फिर हमें उसी हिसाब से इसे फीचर फिल्म वाले तयशुदा ढांचे में बनाना पड़ा.

लेकिन उसी फिल्म के साथ, प्रवासियों की कहानी मेरी फिल्मों का स्थायी हिस्सा बन गई. अगर आप ध्यान दें, तो मेरी कई सारी फिल्में प्रवासियों से जुड़े मुद्दों की बात करती है और बाहरी लोगों की कहानियां कहती है. भले वो ‘अलीगढ़’ के रामचंद्र सिरस हों, ‘सिमरन’ की प्रफुल्ल पटेल, ‘सिटीलाइट्स’ का दीपक सिंह या फिर ‘दिल पे मत ले यार’ का राम सरन पांडे.

लेकिन आपकी पैदाइश तो मुंबई की है.

मैं पैदा ‘बॉम्बे’ में हुआ. लेकिन अब रहता ‘मुंबई’ में हूं.