भारत में हिंदी समझने और बोलने वालों की संख्या करीब 70 करोड़ है. देश से बाहर भी करोड़ों लोग इसे ​जानते-समझते हैं. प्रयोग करने वालों की संख्या के लिहाज से यह चीन की मैंडेरिन के बाद दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा है.

लेकिन इसका मतलब कतई नहीं कि यह विश्व की दूसरी सबसे शक्तिशाली भाषा भी है. इस मामले में तो अंग्रेजी सबसे अव्वल है. बात चाहे दूसरे देशों की हो या भारत की, अंग्रेजी दूसरी सभी भाषाओं पर हावी है. हमारे देश में 12 से 15 फीसदी लोग ही अंग्रेजी समझ पाते हैं, जबकि अच्छी अंग्रेजी महज तीन फीसदी लोग बोल पाते हैं. इसके बावजूद यह हिंदी समेत तमाम भारतीय भाषाओं पर हावी है.

पिछले तीन साल से देश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी का दबदबा बना हुआ है. केंद्र के अलावा देश के 13 राज्यों में उसकी सरकार है. भाजपा और उसका पितृसंगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हिंदी समर्थक माने जाते हैं. जीवन के हर क्षेत्र खासकर भाषा और संस्कृति के क्षेत्र में स्वदेशीकरण को बढ़ाना इनका मूल एजेंडा है. ऐसे में हिंदी के तमाम समर्थकों को उम्मीद है कि ये हिंदी भाषा और साहित्य के विकास के लिए कुछ ऐसा करेंगे जो पिछले 70 सालों में नहीं हुआ. आखिर सवाल उठता है कि भाजपा को ऐसे कौन से कदम उठाने चाहिए, जिससे हिंदी तेजी से फैल सके. भाषाविदों सहित तमाम जानकारों से हुई बातचीत के मुताबिक ऐसे दस जरूरी फैसले ये हो सकते हैं:

1. सबसे पहले हिंदी प्रदेश के सभी 10 राज्यों (दिल्ली, उत्तर प्रदेश,​ बिहार, झारखंड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, हरियाणा, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश) को अपने यहां ‘त्रिभाषा सूत्र’ को सख्ती से लागू करना चाहिए. दौलत सिंह कोठारी के नेतृत्व में बने प्रथम शिक्षा आयोग द्वारा सुझाए गए इस सूत्र के अनुसार देश के स्कूलों में तीन भाषाओं को पढ़ाया जाना था. इन तीन भाषाओं में मातृभाषा, अंग्रेजी और दूसरे राज्य की कोई एक भाषा पढ़ाने का सुझाव दिया गया था. लेकिन हिंदी पट्टी के इन राज्यों ने इस मामले में ‘राजनीति’ कर दी. इन राज्यों ने अपने यहां दूसरे राज्यों की भाषा पढ़ाने के बजाय संस्कृत को पढ़ाना शुरू कर दिया.

दूसरी ओर इन्होंने गैर-हिंदी राज्यों पर पूरा कामकाज हिंदी में ही करने का दबाव डालना शुरू कर दिया. लेकिन ये राज्य कभी नहीं समझ पाए कि उनकी यह ‘चतुराई’ खुद उन्हें ही भारी पड़ेगी. इससे हुआ यह कि गैर-हिंदी प्रदेश आज तक उत्तर भारतीय राज्यों का यह दोहरा रवैया स्वीकार नहीं कर पाए. यदि उत्तर भारत के राज्य चाहते हैं कि उनकी हिंदी देश के दूसरे इलाकों में भी फैले तो उन्हें अपनी ‘गलती’ ठीक करनी होगी. उन्हें संस्कृत की जगह दूसरे राज्यों की भाषा पढ़ना शुरू करना चाहिए. ऐसा करने के बाद ही गैर-हिंदी भाषी राज्यों को हिंदी पढ़ने और उसमें काम-काज करने के लिए सहमत किया जा सकेगा.

भाजपा चाहे तो यह काम आसानी से कर सकती है क्योंकि इन 10 राज्यों में से आठ में अभी उसकी सरकार है. वहीं इन राज्यों में देश की 42 फीसदी जनता रहती है. हालांकि पार्टी के लिए ऐसा करना आसान नहीं है क्योंकि माना जाता है कि वह संस्कृत के प्रति जरूरत से ज्यादा मोह रखती है. जानकारों के अनुसार भाजपा को इस मामले में व्यावहारिक रुख अपनाना होगा.

2. पचास के दशक में गठित वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग का पुनर्गठन किया जाना चाहिए. साथ ही शब्द निर्माण के मामले में अब तक की नीति को छोड़ना होगा. सरकार की मौजूदा नीति ने संस्कृत से जुड़ी ऐसी मशीनी भाषा ईजाद की है जो आम तो छोड़िए, हिंदी के जानकार लोगों को भी समझ में नहीं आती. जानकारों के मुताबिक सरकार को चाहिए कि वह जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष और महान भाषाविद् आचार्य रघुवीर की नीति को छोड़ दे. वे भले ही महान भाषाविद थे जिन्होंने हिंदी के छह लाख शब्द गढ़े, पर यह भी सच है कि उन्होंने कई ऐसे शब्द भी बनाए जिसके चलते ​आज तक हिंदी का मजाक उड़ाया जाता है. इसलिए हिंदी के सरकारी शब्दकोशों और दस्तावेजों से कठिन शब्द को हटाए बिना हिंदी का विकास संभव ही नहीं.

शब्दों के मामले में किसी भी भाषा के प्रचलित शब्दों को स्वीकारने की नीति होनी चाहिए. हम आॅक्सफोर्ड शब्दकोश से भी बहुत कुछ सीख सकते हैं, जो हर साल अपने भंडार में आम प्रचलन के कई शब्दों को जोड़ता रहता है. सरकार पत्रकारिता जगत से भी बहुत कुछ सीख सकती है जहां अप्रचलित और कठिन शब्द शायद ही प्रयोग किए जाते हैं.

3. केंद्र और राज्य सरकारों को दसवीं के बजाय 12वीं कक्षा तक हिंदी भाषा और साहित्य को अनिवार्य भाषा बनाना चाहिए. केंद्र सरकार की मौजूदा नीति में कई झोल हैं जिसके चलते अनेक बच्चे अपनी मातृभाषा पढ़ने के बजाय विदेशी भाषा पढ़ने को तवज्जो देते हैं. ऐसी प्रवृत्ति को दूर करना होगा, नहीं तो बच्चे अंग्रेजी, जर्मन तो सीख लेंगे पर हिंदी के बारे में ‘गर्व’ से कहेंगे कि हिंदी में उनका हाथ तंग है.

4. यह जमाना अब कंप्यूटर, लैपटॉप और स्मार्टफोन का है. हम अब कागज पर लिखने के बजाय कीबोर्ड पर ज्यादा लिखते हैं. इसलिए सरकार को चाहिए कि स्कूलों में बच्चों को कागज पर हिंदी लिखना सिखाने के साथ-साथ उन्हें हिंदी टाइपिंग में भी दक्ष बनाए. ऐसा किए बगैर हिंदी पढ़ाने-लिखाने का मकसद अधूरा ही रहेगा.

5. केंद्र सरकार का मूल कामकाज हिंदी में होना भले संभव न हो, लेकिन यह तो हो ही सकता है कि सरकार अपने सभी दस्तावेजों और वेबसाइटों का सहज हिंदी में अनुवाद अनिवार्य रूप से कराए. इसके लिए संसाधनों की कमी का बहाना बनाते रहने से हमारी मातृभाषा लगातार पिछड़ती जाएगी और एक दिन हम अपने ही देश में अंग्रेजी के गुलाम बन जाएंगे. सरकार के इस फैसले से रोजगार के भी बड़े अवसर पैदा होंगे.

6. केंद्र सरकार अभी राजभाषा हिंदी सीखने के लिए अपने कर्मचारियों को अार्थिक प्रोत्साहन देती है. इसके तहत सेवा में रहते हुए हिंदी की परीक्षा पास करनी होती है. उसके बाद कर्मचारियों को एक निश्चित समय पर तय राशि दी जाती है. जानकारों के मुताबिक यहां तक तो ठीक है पर गड़बड़ी यह होती है कि हिंदी प्रोत्साहन के नाम पर पैसे पाने वाले ज्यादातर कर्मचारी कभी हिंदी में कामकाज नहीं करते. सरकार को इस बुरी प्रवृत्ति पर लगाम लगानी चाहिए.

7. देश में इंटरनेट पर करीब 20 प्रतिशत लोग हिंदी में सामग्री खोजते हैं. लेकिन इंटरनेट पर इस भाषा में अच्छी सामग्री का काफी अभाव है. इसलिए सरकार को चाहिए कि वह अपने संसाधनों और निजी प्रयासों से सभी विषयों की हिंदी में सामग्री तैयार करवाकर इंटरनेट पर डलवाए. यह काम धीरे-धीरे करने से बात नहीं बनेगी. सरकार को इसके लिए युद्ध स्तर पर प्रयास करना होगा. ऐसा करके ही हिंदी पर लगने वाले उन लांछनों को दूर किया जा सकेगा कि यह ज्ञान और विज्ञान की भाषा नहीं है.

8. सरकार को हिंदी शब्दों की वर्तनी से जुड़ी विसंगतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए. अंग्रेजी जैसी भाषाओं के विपरीत हिंदी में कई ऐसे शब्द हैं जिन्हें कई तरह से लिखा जाता है. इस समस्या के चलते कई लोगों को हिंदी लिखने ओर सीखने में दिक्कत होती है.

9. सरकार को सुप्रीम कोर्ट से परामर्श करके देश की अदालतों में हिंदी को जिरह करने और फैसला लिखने की भाषा बनाने का प्रयास करना चाहिए.

10. केंद्र सरकार का राजभाषा विभाग अभी गृह मंत्रालय के तहत काम करता है. इसका जिम्मा कई बार अहिंदी-भाषी मंत्री के जिम्मे होता है. ऐसे मंत्री हिंदी के विकास में रुचि नहीं लेते. इसलिए सरकार को तय करना चाहिए कि यह विभाग या तो प्रधानमंत्री कार्यालय के तहत काम करे या इसे वैसे किसी मंत्री को सौंपा जाए जो हिंदी की अहमियत समझता हो. इसके अलावा राजभाषा विभाग को इसके अलावा पर्याप्त अधिकार और बजट भी सौंपने की जरूरत है.

सरकार को इन उपायों के अलावा हिंदी के अनुकूल तकनीकी विकास में भी दिलचस्पी बढ़ानी चाहिए. उसे इस क्षेत्र में अनुसंधान तेज करने के लिए निजी क्षेत्र को भी प्रोत्साहित करना होगा. हालांकि बिना राजनीतिक इच्छाशक्ति, स्पष्ट कार्ययोजना, संवेदनशीलता और ईमानदारी के कोई भी प्रयास इस दिशा में महज रस्म अदायगी बनकर रह जाएगा. अब तक का अनुभव तो ऐसा ही रहा है.