बैंकिंग सेक्टर में करियर बनाने की इच्छा रखने वालों के लिए एक बुरी ख़बर है. विशेषज्ञों की मानें तो अगले पांच साल में बैंकों की 30 प्रतिशत नौकरियां ख़त्म हो जाएंगी. सिटी ग्रुप में आर्थिक संकट के दौरान काम कर चुके विक्रम पंडित के हवाले से इकनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि तकनीकी विकास के चलते नौकरियों की संख्या में गिरावट आएगी. हालांकि विक्रम ने यह बात अमेरिका और यूरोप के संदर्भ में कही है, लेकिन ये बदलाव भारतीय बैंकिंग तंत्र पर भी लागू होंगे.

ब्लूमबर्ग टेलीविज़न को दिए एक इंटरव्यू में विक्रम ने बताया है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और रोबोटिक्स ने कामगारों की भूमिकाएं सीमित की हैं. पासबुक अपडेशन, कैश डिपॉज़िट, ग्राहक संबंधी सूचनाओं का वेरिफ़िकेशन, सैलरी अपलोड जैसे काम अब डिजिटल तरीक़े से किए जा रहे हैं. इससे बेकारी बढ़ रही है. ऐक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक और एचडीएफ़सी बैंक इन क्षेत्रों में तकनीक को बढ़ावा दे रहे हैं. इससे मानवीय श्रम की ज़रूरत कम होती जा रही है.

ऐक्सिस बैंक में रिटेल बैंकिंग के प्रमुख राजीव आनंद बताते हैं, ‘आप चेक बुक के आवेदनों को देखें, 75 प्रतिशत काम डिजिटली हो रहा है. पहले इनके ग्राहक हमारी शाखाओं में आते थे.’ उन्होंने कहा, ‘शाखाओं में स्वचालन बढ़ गया है. हमारे यहां कैश जमा करने की 1500 मशीनें हैं. अब मुझे कैश गिनने के लिए किसी व्यक्ति की ज़रूरत क्यों होगी?’

इस चलन से बैंकिंग तो आसान हुई है, लेकिन स्टाफ़ की नियुक्ति में गिरावट आई है. हालांकि नौकरियां हैं, लेकिन अब उनमें अलग तरह की कार्यकुशलता की आवश्यकता है. बॉस्टन कन्सल्टिंग ग्रुप में साझीदार और निदेशक सौरभ त्रिपाठी कहते हैं, ‘अगले तीन सालों में डेटा एंट्री जैसे कामों की ज़रूरत नहीं रहेगी और बैंकिंग सेक्टर में नौकरियों की वृद्धि में निश्चित ही कमी आएगी.’

ऐसा केवल निजी क्षेत्र के बैंकों के साथ नहीं है. सरकारी बैंक भी अब रोबोटिक्स का इस्तेमाल करने लगे हैं. एचडीएफ़सी द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वर्चुअल असिस्टेंट (ईवीए) लॉन्च किए जाने के बाद अब भारत का सबसे बड़ा सरकारी बैंक स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया (एसबीआई) भी ग्राहकों के सवालों के जवाब देने और रिटेल प्रॉडक्ट व सर्विसेज़ को समझाने के लिए चैटबॉट का परीक्षण कर रहा है.

क़रीब छह लाख करोड़ रुपये की फंसे हुए कर्जे के दबाव के बीच मज़बूती से बने रहने के लिए सरकारी बैंकों को लागत घटाने के नए रास्ते खोजने होंगे. केंद्र सरकार सरकारी बैंकों के मर्जर की कोशिश कर रही है. माना जा रहा है कि इसके बाद सरकारी बैंकों की संख्या 27 से घटकर छह रह जाएगी. इस दौरान भी नौकरियों की संख्या में कमी आने की आशंका जताई जा रही है.