धर्मगुरुओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना कितना घातक हो सकता है, इसका एक उदाहरण हाल ही में गुरमीत राम रहीम की गिरफ्तारी के दौरान पूरी दुनिया ने देखा है. राम रहीम की राजनीतिक पैठ अगर इतनी मजबूत न होती तो शायद हिंसा पर उतारू उनके समर्थकों को बहुत पहले ही रोका जा सकता था और उस हिंसा से बचा जा सकता था. इसीलिए इस घटना के बाद से यह सवाल कई बार उठा है कि धर्मगुरुओं को राजनीतिक संरक्षण मिलना और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों का उनके आगे नतमस्तक होना कितना सही है?

संवैधानिक पदों पर रहते हुए धर्मगुरुओं का महिमामंडन करना सिर्फ नैतिकता से जुड़ा मामला नहीं है. कई बार ऐसे धर्मगुरुओं के चलते संवैधानिक मान्यताओं और परंपराओं तक से समझौते हुए हैं. गुरमीत राम रहीम के बहाने छिड़ी यह बहस अभी ठंडी भी नहीं हुई कि ऐसा ही एक और मामला सामने आ गया. इस बार गुवाहाटी उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस अजित सिंह पर आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर का स्वागत करने के नियमों का उल्लंघन करने के आरोप लगे.

हाल ही में रविशंकर पूर्वोत्तर राज्यों के दौरे पर थे. वहां उनका स्वागत करने जस्टिस अजित सिंह भी पहुंचे. परंपरा है कि उच्च न्यायिक पदों पर रहते हुए इस तरह के आयोजनों में शामिल होने से बचा जाता है. लेकिन जस्टिस अजित सिंह न सिर्फ इसमें शामिल हुए बल्कि वे खुद ही कार चलाते हुए रविशंकर को अपने साथ भी ले गए. मुख्य न्यायाधीश के ऐसा करने पर गुवाहाटी हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने ऐतराज जताया है. एसोसिएशन के पदाधिकारियों का कहना है कि जस्टिस अजित सिंह ने मुख्य न्यायाधीश रहते हुए एक धर्मगुरु के साथ इस तरह से जाकर उच्च न्यायालय के नियमों का उल्लंघन किया है और वे लोग देश के मुख्य न्यायाधीश से इसका संज्ञान लेने और जस्टिस अजित सिंह के खिलाफ कार्रवाई की मांग करेंगे.

यह पहली बार नहीं है जब किसी धर्मगुरु के लिए नियमों को इस तरह से ताक पर रखा गया हो. ऐसी घटनाएं पहले भी हुई हैं जिनमें से कुछ मुख्य इस तरह हैं:

बलात्कार के आरोपित आसाराम का मध्य प्रदेश विधान सभा में प्रवचन

साल 2004 की बात है. उमा भारती तब मध्य प्रदेश की मुख्यमंत्री हुआ करती थीं. इसी दौरान उन्होंने प्रदेश विधान सभा भवन में आसाराम का प्रवचन आयोजित करवाया. वही आसाराम जो पिछले कुछ सालों से नाबालिग बच्ची के साथ बलात्कार करने के आरोप में जेल में हैं और जिन पर और भी कई गंभीर आरोप हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इस प्रवचन में मध्य प्रदेश भाजपा के सभी विधायक और पूरा मंत्रिमंडल भक्तिभाव से उपस्थित था. मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से पत्रकारों को भी आमंत्रित किया गया था और मध्य प्रदेश शासन के जनसंपर्क महकमे ने बाकायदा उनके प्रवचन के प्रेस नोट छाप कर हिंदी और अंग्रेजी अख़बारों में बांटे थे.

एक धर्मनिरपेक्ष देश में किसी राज्य सरकार का एक धर्मगुरु को विधान सभा में बुलाना और उसके प्रवचनों के प्रेस नोट बनाकर बांटना साफ़ तौर से नियमों के प्रतिकूल था. लेकिन इस घटना पर इतनी चर्चा नहीं हुई क्योंकि आसाराम का व्यापक जनाधार था और इसलिए विपक्ष भी आसाराम के खिलाफ बोलने में हिचकिचाता था.

धर्मगुरु तरुण सागर के प्रवचनों से हरियाणा विधान सभा सत्र की शुरुआत

हरियाणा की मौजूदा मनोहरलाल खट्टर सरकार ने पिछले साल एक अनोखा रिकॉर्ड अपने नाम किया. देश के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ कि किसी राज्य की विधान सभा में सत्र की शुरुआत एक धर्मगुरु के प्रवचनों से हुई. लेकिन इस रिकॉर्ड को बनाते हुए हरियाणा सरकार ने विधान सभा की तमाम स्थापित परंपराओं की आहुति भी दे डाली. विधान सभा राज्य की सर्वोच्च संवैधानिक संस्था होती है. जब भी कोई व्यक्ति विधान सभा का सदस्य बनता है वह संविधान की शपथ लेता है. लेकिन हरियाणा के विधान सभा सदस्यों ने तमाम संवैधानिक परंपराओं को धता बताते हुए विधान सभा भवन के भीतर राज्यपाल, मुख्यमंत्री और विधान सभा अध्यक्ष से ऊंची कुर्सी लगाकर एक धर्मगुरु को उस पर बैठाया और उनके ‘कड़वे प्रवचन’ सुने.

जिस देश का संविधान धर्म को राजनीति से अलग रखने की बात कहता है, उस देश की विधान सभा के भीतर तरुण सागर ने विधायकों को पढ़ाया, ‘राजनीति पर धर्म का अंकुश होना जरूरी है. धर्म पति है और राजनीति पत्नी. हर पति की ये ड्यूटी होती है कि अपनी पत्नी को संरक्षण दे और हर पत्नी का धर्म होता है कि वो पति के अनुशासन को स्वीकार करे. अगर राजनीति पर धर्म अंकुश न हो तो वो मग्न-मस्त हाथी की तरह हो जाती है.’ महिला विरोधी होने के साथ ही ये बातें साफ़ तौर से संविधान के खिलाफ थीं, लेकिन संविधान की शपथ लेकर उसका अनुपालन करने वालों को धर्मगुरु की इन बातों से कोई आपत्ति नहीं हुई.

धर्मगुरु के जन्मदिन पर जब देश के राष्ट्रपति ने कविता पढ़ी

डॉक्टर अब्दुल कलाम देश के उन राष्ट्रपतियों में से एक हैं जिन पर कभी कोई गंभीर आरोप नहीं लगे और जिन्हें सबसे लोकप्रिय भी माना जाता रहा है. लेकिन एक धर्मगुरु के चलते अब्दुल कलाम भी विवादों से घिर चुके हैं. ये घटना नवम्बर 2006 की है. अब्दुल कलाम तब देश के राष्ट्रपति हुआ करते थे. इसी दौरान विवादित धर्मगुरु साईं बाबा के जन्मदिन पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था जिसमें उन्हें भी बुलावा आया. अब्दुल कलाम नसिर्फ इस कार्यक्रम में पहुंचे बल्कि उन्होंने साईं बाबा की तारीफ़ में अपनी लिखी कविता भी पढ़ी.

राष्ट्रपति अब्दुल कलाम का यह कदम कई कारणों से गलत माना जाता है. ये वही साईं बाबा थे जो हवा से राख निकाल कर अपने भक्तों को उनकी सारी समस्याओं के समाधान के रूप में बांटा करते थे. अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति ने ऐसे बाबाओं की पोल खोलने के लिए कई कार्यक्रम किये और लोगों को बताया कि धर्म के नाम पर हाथ की सफाई दिखाने वाले ये लोग ठग से ज्यादा कुछ नहीं. माना जाता है कि ऐसे बाबाओं की पोल खोलने की कीमत अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति के संस्थापक नरेंद्र दाभोलकर ने सीने पर गोलियां खाकर चुकाई. लेकिन देश के राष्ट्रपति, जो खुद एक वैज्ञानिक भी थे, ऐसे ही एक बाबा की तारीफ में कसीदे पढ़ रहे थे.

हमारा संविधान कहता है कि लोगों में वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा देना राज्य की जिम्मेदारी होनी चाहिए. ऐसे कई कानून भी हैं जो जादू-टोने के दम पर लोगों का इलाज करने वालों को दण्डित करने की बात कहते हैं. लेकिन जब देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ही ऐसे बाबाओं का महिमामंडन करने लगे तो इसकी उम्मीद कम ही बचती है कि आम लोग उसके ढोंग को समझ पाएंगे.

इन मामलों के अलावा और भी कई बार ऐसा हुआ है जब राजनेताओं ने धर्गुरुओं को कभी कौड़ियों के भाव जमीनें आवंटित कीं तो कभी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उन्हें वित्तीय लाभ पहुंचाया. लेकिन समस्या यह है कि जब तक ऐसे धर्मगुरु किसी गंभीर आरोप में दोषी साबित नहीं हो जाते, तब तक राजनेताओं और संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों की इनसे नजदीकी पर ज्यादा सवाल नहीं उठाए जाते. यदि सवाल उठने लगें तो शायद उस तरह की स्थितियों से बचा जा सकता है जैसी कुछ समय पहले राम रहीम की गिरफ्तारी वक्त हरियाणा में पैदा हो गई थी.