लेखक–निर्देशक : संजय छैल

संगीत : ललित पंडित

कलाकार : परेश रावल, ऋषि कपूर, वीर दास, पायल घोष, भारती आचरेकर, दिव्या सेठ

रेटिंग : 2/5

लंबे अरसे तक हमें अपनी फिल्मों से शिकायत रही है कि ये हीरो और हीरोइन का मिलना-बिछड़ना-फिर मिलना छोड़कर नया कुछ नहीं दिखातीं. वहीं बीते सालों में बॉलीवुड ने कुछ हद तक अपना रुख बदला है और बदलते हुए वक्त के हिसाब से फिल्में भी बनाई हैं. इससे सिनेमा के परदे पर बहुत कुछ नया तो देखने को मिला, लेकिन पिछले दिनों एक नई शिकायत भी पैदा हो गई. शिकायत यह कि कुछ महीनों से लगातार एजेंडा फिल्मों की गिनती बढ़ रही है. ‘पटेल की पंजाबी शादी’ का ट्रेलर देखते हुए भी यही आशंका पैदा हुई थी, लेकिन सरप्राइज के तौर पर ही सही ‘पटेल की पंजाबी शादी’ में शामिल इस इकलौते मेहमान को उस ठंडे और अंधेरे थिएटर में मनोरंजन की गर्माहट मिली.

फिल्म की कहानी गुजराती सोसाइटी में एक पंजाबी परिवार के आने से शुरू होती है. शुरूआती दृश्यों में ही फिल्म गुग्गी टंडन यानी ऋषि कपूर और हंसमुख पटेल यानी परेश रावल के बीच हुई झड़प से फिल्म के पंजाब वर्सेस गुजराती मिजाज का अंदाजा दे देती है. हंसमुख पटेल पंजाबियों को लेकर एक तरह के पूर्वाग्रह से ग्रस्त नजर आते हैं और इसके पीछे उनका अपना अनुभव है जिसका पता आपको आखिरी सीन में ही चलता है, लेकिन तब तक आप सैकड़ों अंदाजे लगा चुकते हैं. यह सस्पेंस जोरदार न होते हुए भी मजा देने वाला है.

जैसा कि डर था फिल्म अलग-अलग प्रांत के किरदारों को दिखाकर ‘फिर भी दिल है हिंदुस्तानी टाइप’ कोई संदेश देने की कोशिश करेगी, लेकिन राहत की बात है कि यह ऐसा कुछ भी नहीं करती. इसके बजाय यह पंजाबियों-गुजरातियों की कुछ खासियतें चुनकर कुछ मजेदार मैशअप वाले सीक्वेंस दिखाती है. इनमें बहुत सारी क्लीशे कही जाने वाली बातें भी शामिल हैं जो सही इस्तेमाल के चलते बुरी नहीं लगतीं. कुछेक जगह यह तभी पता चलती हैं जब सही जगह पर नहीं होतीं. हर निवाले में अलग स्वाद की तरह मिल रहे इस मनोरंजन में जैसे ही ट्विस्ट के नाम पर मिर्ची आती है, आप जलन से सी-सी करते हैं. और यह मिर्ची कई बार फंसती है. यानी कि फिल्म ट्विस्ट के नाम पर कई बार झटके लेकर रिस्टार्ट होती है.

थोड़े झोल वाली इस पटकथा को इंडस्ट्री के दो सबसे बेहतरीन अभिनेताओं का सहारा मिलता है. परेश रावल की बात करें तो गुस्सैल गुजराती बनकर वे कमाल का अभिनय करते हैं. यहां पर चुटकी लेते हुए हम कह सकते हैं कि राजनीति ने उनके अभिनय में निखार लाने का ही काम किया है. क्लाइमैक्स में एक सीन है जिसमें वे एक ही सांस में एक मिनट तक गुजराती में कुछ कवितानुमा बोलते हैं. यह सीन उनके गुजराती होने के साथ-साथ ऊर्जावान होने की पहचान भी करवा देता है. गुग्गी टंडन बने ऋषि कपूर खुद को ही जीते हैं और यहां उतने ही खिलंदड़ हैं, जितने ट्विटर पर नजर आते हैं और अपनी कमाल की कॉमिक टाइमिंग का एक और नजारा भी पेश करते हैं.

इन दोनों के अलावा वीर दास और उनकी मां की भूमिका में दिव्या सेठ भी मजा देते हैं, वहीं पायल घोष इतराने और मुस्कुराने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं करतीं. सरप्राइज एलीमेंट के तौर पर रखे गए प्रेम चोपड़ा फिल्म में अपना मशहूर डायलॉग ‘प्रेम नाम है मेरा’ दोहराते नजर आए हैं. ऋषि कपूर के पिता की भूमिका में वे कुछ मनोरंजक दृश्यों की वजह बनते हैं. ऐसी ही कुछ दृश्यों भारती आचरेकर बराबरी से उनका साथ देती हैं. प्रेमालाप के एक दृश्य में प्रेम चोपड़ा के ‘एज’ पूछने पर वे जिस अंदाज में ‘वही ओल्ड एज’ कहकर अपनी उम्र बताती हैं, मोह लेती हैं.

कुल मिलाकर ‘पटेल की पंजाबी शादी’ देखते हुए गुजरात के रंगों में पंजाब की मस्ती मिलाकर एक सतरंगी-खुशमिजाज फिल्म बनाने की कोशिश दिखती है. इसके लिए एक औसत कहानी को बढ़िया ट्रीटमेंट के साथ पेश किया जाना था, लेकिन सीक्वेंस सही क्रम में ना बिठाने के चलते यह मजा पूरी तरह सध नहीं पाता. हालांकि फिल्म को बेहतर अभिनय का साथ जरूर मिलता है, लेकिन निर्देशन, संवाद लेखन और सिनेमैटोग्राफी की कमियां इसे बिगाड़ देती हैं. लेखक-निर्देशक संजय छैल के फेसबुकिया अंदाज में लिखे गए तुकबंदी वाले संवाद आपको कई बार चिढ़ाते हैं और कई बार मजा दे जाते हैं. इन सब खामियों के बावजूद फिल्म दो काम नहीं करके मनोरंजक बनी रहती है. एक तो यह पंजाबियों और गुजरातियों की बात करते हुए भी यह हिंदुस्तानी होने का पहाड़ा नहीं पढ़ाती और दूसरे ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ जैसी लाइनें इस्तेमाल करने के बावजूद एजेंडा फिल्म बनने की कोशिश नहीं करती.

थोड़ी अव्यवस्थाओं के बावजूद आप पटेल की पंजाबी शादी में खुशी-खुशी शामिल हो सकते हैं, क्योंकि शादी-ब्याह में तो यह सब लगा ही रहता है!