निर्देशक : हंसल मेहता

लेखक : अपूर्व असरानी, कंगना रनोट

कलाकार : कंगना रनोट, सोहम शाह, किशोरी शहाणे, हितेन कुमार

रेटिंग : 2.5/ 5

सिमरन उर्फ प्रफुल्ल पटेल पूरी सिरफिरी है. अपने हिसाब से जिंदगी जीना चाहती है और किसी की भी सुनती नहीं है. उसके अपने सपने हैं जिन्हें पूरा करने के उसके अपने तरीके हैं. जिंदगी में दोस्त-रिश्तेदार-आशिक तो हैं लेकिन खुद में खोई रहने वाली इस लड़की की सबसे पक्की सहेली वो खुद है और आशिकी भी उसे खुद से ही भरपूर है. जाहिर बात है, ऐसी विशेषताओं वाले किरदार की जरूरत हमारे समय में सिर्फ कंगना रनोट ही पूरी कर सकती हैं.

‘सिमरन’ इसीलिए न सिर्फ कंगना रनोट की उत्कृष्ट अभिनय प्रतिभा का एक और दस्तावेज है, बल्कि फिर से किया गया यह ऐलान भी है कि परदे पर कहानी कहने के लिए अब इस अभिनेत्री को वाकई में किसी खान या सुपरस्टार की जरूरत नहीं है. बॉलीवुड के धन्नासेठ कितना भी उसे कोसें, सच यही है कि अब वे सिर्फ अपनी प्रतिभा के दम पर दर्शकों को आसानी से दो-ढाई घंटे तक बांधे रख सकती हैं.

शऊर से ऐसा करने के लिए लेकिन, उच्चतम स्तर वाली कहानी और निर्देशन की जरूरत अभी भी कंगना को है. और ‘सिमरन’ में ये दोनों ही चीजें करीब-करीब नदारद हैं. फिल्म अमेरिका में रहने वाली संदीप कौर नामक महिला पर आधारित है जिसकी त्रासद जिंदगी में उदासी स्वाभाविक तौर पर मौजूद है. लेकिन चूंकि हंसल मेहता और कंगना रनोट ‘सिमरन’ को एक ‘फील-गुड’ फिल्म बनाना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इसे ‘ट्रेजेडी में डूबी कॉमेडी’ के रूप में रचा. बैकग्राउंड स्कोर की खूब मदद ली गई, जिंदादिली से भरे गाने भरे गए, कंगना की खिलखिलाहट हर जगह उपयोग हुई, और संवादों से मनोरंजन करने की भरपूर कोशिश की गई.

लेकिन इसके बावजूद फिल्म का ट्रीटमेंट मेहता की ही डार्क फिल्म ‘शाहिद’ के करीब वाला ज्यादा लगता है. ऐसी फिल्मों को जिस ‘लाइट टच’ की जरूरत होती है वो हंसल मेहता का निर्देशन इसे नहीं दे पाता. मेहता की इस फिल्म का कैमरा भी अनुज धवन ने संभाला है और फर्स्ट कट की एडीटिंग अपूर्व असरानी ने की है. ऐसे भारी-भरकम तरीके की वजह से कहानी का स्वर बहुत बार ऊंचा-नीचा (टोनल शिफ्ट) होता दिखाई देता है.

‘शाहिद’ और ‘अलीगढ़’ की तरह सिमरन के कई दृश्य भी बिना किसी बैकग्राउंड स्कोर की मदद लिए इत्मीनान से रचे गए हैं तो बैंक डकैती और एक हास्यास्पद तरीके से फिल्माए गए कार चेज के दृश्यों में बौरा जाने वाले स्कोर उपयोग किया गया है. नायिका के लिए सहानभूति पैदा करने के लिए भी संगीत का जमकर उपयोग किया गया है, लेकिन हर जगह नहीं. इससे लगता है कि खुद मेहता भी दर्शकों की भावनाओं को मैन्यूपुलेट करने के इस तरीके को लेकर आखिर तक मुतमईन नहीं थे.

कहानी में कंगना के अलावा किसी भी और कलाकार पर खास ध्यान नहीं दिया गया है और न ही उन्हें डैवलप किया गया है. और कंगना की जो एक लव-स्टोरी रूमानियत पैदा करने के लिए रची गई है, उसमें भी सोहम शाह बिलकुल नहीं जंचते हैं.

फिल्म में कई बॉलीवुड क्लीशे का भी इस्तेमाल हुआ है - कभी हाई एनर्जी गाने के तुरंत बाद फिल्मी स्टाइल में वहां गुंड़े टपक पड़ते हैं तो कभी बैंक डकैती के बाद जैसाकि होता आया है, कार स्टार्ट नहीं होती. फिल्म में अमेरिकी बैंक कर्मचारियों से लेकर वहां के गैंगस्टर व पुलिस वालों तक को कैरीकेचर बना दिया गया है और बैंक इतने आसानी से लूट लिए जाते हैं कि एक-दो बार के बाद फिल्म पर यकीन कम होता चला जाता है. फिल्म का सबसे बड़ा क्लीशे ये है कि वह अपना नाम भी एक मशहूर नाम से बस यूं ही ले लेती है. जबकि इन फार्मूला-ग्रसित चीजों की जरूरत आलातरीन ‘शाहिद’ के वक्त से ही हंसल मेहता को कभी नहीं पड़ी थी.

‘सिमरन’ की एक और बहुत बड़ी कमजोरी इसकी पटकथा है और उसे लेकर एक तथ्य रेखांकित करना जरूरी है. यह फिल्म अमेरिका की बैंक चोर 24 वर्षीय संदीप कौर की इतनी ज्यादा कहानी है कि अनाधिकारिक बॉयोपिक सी लगती है. कुछ मामूली हेरफेर और नाटकीयता के छौंक के साथ. अगर आप तफ्सील से उस जिंदगी के बारे में पढ़ें और फिर फिल्म देखें तो आपको हैरत होगी है कि क्या लेखक-निर्देशक ने इस विषय पर कोई जमीनी रिसर्च भी की थी! फिल्म में ऐसी किसी लेखकीय गुणवत्ता के भी दर्शन नहीं होते जो रियल लाइफ कहानी को फिक्शन के हाथ से पकड़कर एक अलग ही लेवल पर ले जाती है.

शायद इसीलिए यह सवाल करना बनता है कि जब कहानी संदीप कौर की है (जिसे उनसे इजाजत लेकर बनाया है या नहीं, अभी पता नहीं), और उसमें कुछ अविश्वसनीय नया जोड़ा नहीं गया, तो फिर कंगना रनोट और अपूर्व असरानी के बीच राइटिंग क्रेडिट्स को लेकर हुए विवाद का कितना औचित्य है? या फिर जितना असरानी ने जताया, क्या उतनी मौलिक और मेहनत लिए पटकथा उन्होंने लिखी भी है?

जाते-जाते मुख्य अदाकारा के काम की व्याख्या करें तो ‘सिमरन’ की तमाम कमियों को कंगना रनोट अपने अभिनय से छिपा तो नहीं पातीं, लेकिन उसे अंत तक दर्शनीय जरूर बनाए रखती हैं. ठीक बात है कि यह किरदार भी ‘क्वीन’ और ‘तनु वेड्स मनु’ वाले उनके सुविधाजनक स्पेस में है, लेकिन जिस मेहनत से वे सिमरन के किरदार को आत्मसात करती हैं, सीधे आपकी आत्मा छूती हैं. उनका बेबात हंसना, खिलखिलाना, पागल हो जाना और अजीब सी चाल चलना, किसी महान नायिका की तरह सुंदर-सजीला और दूर से टकटकी लगाकर देखने वाला अभिनय नहीं है, बल्कि निरा अपना-सा लगने वाला एक किरदार बन जाना है. 30 का होने और तलाकशुदा होने के बावजूद आजाद रहने वाले सीन में उनके चेहरे के भाव हों, या फिर सोहम शाह को जुए और चोरी की लत के बारे में बताते हुए लूज-मोशन की बात करने वाला कॉमिक सीन, या फिर टाइटेनिक वाला पोज देकर तितली होने की ख्वाहिश जताना, कंगना इस फिल्म के हर उस दृश्य को रोशन कर देती हैं जिसमें वे मौजूद होती हैं.

फिल्म के तकरीबन हर सीन में कंगना रनोट मौजूद हैं, यही ‘सिमरन’ की इकलौती खास बात है.