राष्ट्रीय फिल्म संग्रहालय (एनएफएआई) का मुख्य उद्देश्य भारतीय फिल्मों और विश्व सिनेमा को सहेजना है. लेकिन हाल ही में इंडियन एक्सप्रेस में छपी विस्तृत रिपोर्ट बताती है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की जद में आने वाली यह सरकारी संस्था, सिनेमा की अमर कृतियों को संरक्षित करने के प्रति कितनी उदासीन है.

रिपोर्ट के मुताबिक सत्यजीत रे से लेकर अकीरा कुरोसावा जैसे फिल्मकारों की तकरीबन 9,200 फिल्में इस संस्था के संग्रहालय से ‘लापता’ हैं. संस्था के रिकॉर्ड्स में इनकी एंट्री होने के बावजूद फिल्म रील के 51,500 कैन और 9,200 से ज्यादा प्रिंट्स संग्रहालय में मौजूद नहीं हैं. ऊपर से 1,112 फिल्में ऐसी हैं जिनकी रिकॉर्ड्स में कोई एंट्री नहीं है, लेकिन वे पुणे स्थित इस नेशनल फिल्म आर्काइव ऑफ इंडिया की इमारत में मौजूद हैं!

इन लापता फिल्मों में सैकड़ों ऐसी हैं जो महान फिल्मकारों की अनमोल और ऐतिहासिक कृतियां हैं. सत्यजीत रे की ‘पाथेर पांचाली’, ‘अपराजितो’ व ‘चारुलता’ से लेकर मेहबूब खान की ‘मदर इंडिया’, राज कपूर की ‘मेरा नाम जोकर’ व ‘आवारा’, मृणाल सेन की ‘भुवन शोम’ और गुरु दत्त की ‘कागज के फूल’ के सेल्यूलाइड प्रिंट्स संस्था में मौजूद नहीं हैं. विश्व सिनेमा की धरोहर ‘बॉयसिकल थीव्ज’ भी नहीं है और रोमन पोलैंस्की की ‘नाइफ इन द वॉटर’ से लेकर अकीरा कुरोसावा की ‘सेवन समुराई’ भी नदारद है.

इसके अलावा यह सरकारी संस्था अपनी मर्जी से 1995 और 2008 में कुल 28,401 फिल्म रीलें नष्ट कर चुकी है.

फिल्मों को सहेजने, रीस्टोर और आर्काइव करने के प्रति ये उदासीनता कोई नयी बात नहीं है. दशकों से ऐसा होता रहा है और कभी आग इन्हें खाक कर देती है, तो कभी सरकारी संस्थाएं इसकी जिम्मेदार होती हैं और कभी वे निर्माता जो सालों पहले अपनी ही फिल्मों को कबाड़ में बेच चुके होते हैं.

पुराने दौर में तो ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के नेगेटिव इसलिए भी नष्ट हो जाते थे क्योंकि फिल्मों की रील में चांदी मौजूद होती थी. अपनी जिन फिल्मों में निर्माता की दिलचस्पी नहीं होती, वे उन फिल्मों को कबाड़ियों को बेच देते थे और कबाड़ी उन फिल्म रीलों को नष्ट कर उनमें से चांदी निकाल लिया करते थे.

विश्वास हो न हो, आर्देशिर ईरानी निर्देशित हिंदुस्तान की पहली बोलती फिल्म ‘आलम आरा’ का ओरिजनल कैमरा निगेटिव भी उसके अंदर मौजूद चांदी की वजह से नष्ट हुआ था. पैसा कमाने के लिए ईरानी साहब के बेटे ने इसे बेच दिया था और सितम देखिए, आज के समय में इस ऐतिहासिक महत्व वाली फिल्म का कोई भी प्रिंट मौजूद नहीं है. आप ईश्वर से प्रार्थना कर लें, या फिर कोई चिराग रगड़कर जिन्न बुला लें, लेकिन इस फिल्म को कहीं देख नहीं सकते.

कुछ आंकड़ों के मुताबिक, 1964 से पहले बनी भारतीय फिल्मों में से 70-80 प्रतिशत फिल्में हम खो चुके हैं. न उनके निगेटिव मौजूद हैं न ही कोई डुप्लीकेट कॉपी. इसलिए अब ये फिल्में सिर्फ सामान्य ज्ञान के तौर पर फिल्म इतिहास का हिस्सा हैं, न कि चलती-फिरती-नाचती-गाती छवियों के रूप में.

1964 से पहले ही, सत्यजीत रे की महानतम अपु ट्रायोलॉजी भी बनी (1955-1959), जो उस दौर की 70-80 प्रतिशत फिल्मों की ही तरह बाद में नष्ट हो गई. लेकिन दशकों बाद अथक प्रयासों से इन्हें रीस्टोर किया गया और इनके पुनर्जीवित होने की कठिनतम यात्रा उदासीन और लापरवाह संस्थाओं के लिए एक ऐसा जरूरी सबक बनी, जिसे वे बार-बार भूल जाते हैं. कि हर फिल्म को वक्त रहते सहेजना जरूरी है, चूंकि हर फिल्म सत्यजीत रे की फिल्मों जितनी भाग्यशाली नहीं होती.

सत्यजीत रे ने दुनिया से विदा लेने के 24 दिन पहले 1992 में अपने बिस्तर पर लेटे-लेटे लाइफटाइम अचीवमेंट श्रेणी का ऑस्कर पुरस्कार ग्रहण किया था. उन्हें ऑस्कर देने के बाद उसी साल दुनिया में इस चेतना का संचार हुआ कि सत्यजीत रे की फिल्में बुरी अवस्था में हैं और यदि उनकी फिल्मों के ओरिजनल निगेटिव अभी नहीं बचाए गए तो हो सकता है कि आने वाली पीढ़ियां उनकी फिल्मों को उनके मौलिक रूप में देखने से महरूम रह जाएं.

इसी चिंता के साथ रे की फिल्मों को उनकी मृत्यु के अगले साल लंदन की मशहूर हैंडरसन फिल्म लेबोरेट्री में रेस्टोरेशन के लिए भेजा गया. लेकिन यह काम होता उससे पहले ही जुलाई 1993 में इस लैब में आग लग गई, और रे की कई सारी फिल्में खराब हो गईं. फिल्मों के ओरिजनल निगेटिव इतने ज्यादा जल चुके थे कि उन पर काम करना अब संभव नहीं था. लेकिन यह तथ्य जानने के बावजूद ऑस्कर पुरस्कार देने वाली अमेरिकी संस्था एकेडमी ऑफ मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज ने इन अधजले-अधबचे ओरिजनल निगेटिव्स को लंदन से लॉस एंजेलिस भेज दिया, अपनी फिल्म आर्काइव में सुरक्षित रखने के लिए. रे की फिल्मों के जले हुए ओरिजनल निगेटिव फिर, अगले 20 साल तक सुरक्षित तालों में सोते रहे.

इस तरह सत्यजीत रे के मास्टरपीस दोबारा जिंदा हुए

पुरानी फिल्मों को सहेजने का बेहद संजीदा काम करने वाली अमेरिका की मशहूर क्रायटीरियन कलेक्शन नामक कंपनी ने 2013 में रे की ‘अपु ट्रायोलॉजी’ को सहेजने का जिम्मा उठाया. आपको शायद लगे कि 2013 में तो तकनीक इतनी बेहतर हो चुकी होगी कि आसानी से ये फिल्में रीस्टोर हो गईं होंगी. लेकिन ऐसा नहीं था. क्रायटीरियन कलेक्शन ने ऑस्कर एकेडमी से उन फिल्मों के जले-बचे नेगेटिव तो ले लिए लेकिन अगले एक साल तक उसे ऐसे तकनीशियन नहीं मिले जो इन पर काम कर सकें. लंबे अरसे बाद, इटली में मौजूद दुनिया की श्रेष्ठतम रेस्टोरेशन लैबों में से एक के तकनीशियनों की मदद लेकर, ढेर सारा पैसा खर्च कर, और कई महीनों व हजारों घंटों की मेहनत लगाकर, तीनों फिल्मों का कुछ-कुछ हिस्सा रीस्टोर किया गया. जो जले हुए प्रिंटों में नहीं मिल सका उसे दुनियाभर की फिल्म संस्थाओं के पास मौजूद डुप्लीकेट लेकिन ठीक-ठाक क्वॉलिटी वाले प्रिंटों से हासिल किया गया.

अपु ट्रायोलॉजी की तीन फिल्मों में पहली ‘पाथेर पांचाली’ की सिर्फ नौ ओरिजनल फिल्म रीलें ही आग से बची थीं. ‘अपराजितो’ की किस्मत तीन फिल्मों में सबसे बेहतर थी, इसलिए जलने के बावजूद 11 बची फिल्म की रीलें इस लायक थीं कि रीस्टोर हो सकें. लेकिन ‘अपुर संसार’ के सिर्फ दो निगेटिव आग से बच पाए, वे भी बुरी दशा में. यहां पर ब्रिटिश फिल्म इंस्टीट्यूट और दूसरी विदेशी संस्थाओं के पास मौजूद डुप्लीकेट निगेटिव काम आए और अपु ट्रायोलॉजी की इस आखिरी फिल्म को भी उच्च क्वॉलिटी में रीस्टोर कर लिया गया.

इस स्तर की असाधारण मेहनत के बाद ही संपूर्णता में अपु ट्रायोलॉजी डिजिटली रीस्टोर हो सकी और जब 2015 की मई में न्यूयॉर्क के ऐतिहासिक म्यूजियम ऑफ मॉडर्न आर्ट में ‘4k’ क्वॉलिटी में ‘पाथेर पांचाली’ का प्रीमियर हुआ, तो लोगों की तालियों और आसुंओं से वह दिन हमेशा के लिए यादगार बन गया. 60 साल पुरानी जिन फिल्मों का साफ-सुधरा प्रिंट तक मौजूद न था, आज रे की वे फिल्में लेटेस्ट ‘4k’ तकनीक के सहारे डीवीडीऔर ब्लू-रे में घर-घर देखी जा सकती हैं.

लेकिन क्या हमारी हर खाक और लापरवाही से लापता फिल्म की किस्मत में यह बेतहाशा मेहनत बदी है?

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