अहमदाबाद और गांधीनगर में हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनके जापानी समकक्ष शिंजो आबे की बैठक फिर से याद दिलाती है कि एशिया में रणनीतिक समीकरण बदल रहे हैं. इसमें भी कुछ प्रमुख बातें साफ-साफ देखी जा सकती हैं. जैसे आर्थिक मोर्चे पर छलांगें लगा रहा चीन अब अपने सैन्य रुख को लेकर भी आक्रामक हो गया है. उधर, डोनाल्ड ट्रंप की अगुवाई वाले अमेरिका अब एशिया-प्रशांत क्षेत्र की तरफ से उदासीन दिखता है.

एशिया की दो बड़ी शक्तियां जापान और भारत अब भी आर्थिक मोर्चे और वैश्विक मुद्दों पर चीन के साथ सार्थक सहयोग चाहती हैं. लेकिन चीन की सैन्य महत्वाकांक्षाएं अब सबको पता हैं. चीन दक्षिण चीन सागर के 90 फीसदी हिस्से पर दावा करता है जिसको लेकर उसका इस इलाके से लगते सभी देशों के साथ विवाद चल रहा है. एक विवादित द्वीप को लेकर उसका जापान से भी सैन्य टकराव चल रहा है. हाल ही में डोकलाम को लेकर भारत के साथ विवाद में भी उसका रुख कुछ ऐसा ही रहा.

ये सब साफ संकेत हैं कि क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक माहौल बदल रहा है. यह अच्छी बात है कि नई दिल्ली और टोक्यो ने चीन के इरादों को कुछ पहले ही भांपना शुरू कर दिया था. नवंबर 2013 में जापान के सम्राट और उनकी पत्नी भारत आए थे. यह एक दुर्लभ बात थी. फिर जनवरी 2014 में शिंजो आबे गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि बने. नरेंद्र मोदी की अगुवाई में इन संबंधों ने और भी तेज रणनीतिक रफ्तार पकड़ ली है. अहमदाबाद में दोनों नेता जब मिले तो यह बीते तीन साल में उनकी दसवीं मुलाकात थी. लेकिन इस रिश्ते को सैन्य साझीदारी की तरह देखना भूल होगी, हालांकि दोनों नेताओं की मुलाकात के दौरान एशिया-प्रशांत क्षेत्र की समुद्री सुरक्षा पर भी बात हुई.

बैठक के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य में दोनों देशों ने अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से लड़ने की बात कही. साथ ही इसमें पाकिस्तान से चल रहे आतंकी संगठनों का भी जिक्र किया गया. वक्तव्य में इशारों-इशारों में वन बेल्ट वन रोड परियोजना के क्रियान्वयन के तरीके को लेकर चीन की आलोचना भी की गई. इसमें कहा गया कि आपसी जुड़ाव बढ़ाने के लक्ष्यों के तहत जो काम हो रहे हैं उनमें दूसरे की संप्रभुता का सम्मान करने की जरूरत है.

शिंजो अाबे ने कहा कि वे और नरेंद्र मोदी उत्तर कोरिया के मुद्दे को लेकर एकराय हैं. ऐसा लगता है कि उनकी आपसी बातचीत में उत्तर कोरिया को परमाणु हथियार और मिसाइल बनाने के लिए पाकिस्तान और चीन की मदद का भी जिक्र हुआ. दक्षिण चीन सागर का जिक्र साफ-साफ तो नहीं हुआ लेकिन इसे एशिया प्रशांत क्षेत्र में ही शामिल कर लिया गया.

भारत और जापान अब अनैन्य परमाणु सहयोग की राह पर भी आगे बढ़ चुके हैं. जापान ने इस मुद्दे पर वह संकोच छोड़ दिया है जो वह पहले दिखाया करता था. साथ ही दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से भारत में बुलेट ट्रेन की आधारशिला रख दी है. बुनियादी ढांचे के विकास को लेकर आपसी साझेदारी की दिशा में यह एक बड़ा कदम है. आगे इस सपने में भारत की लुक ईस्ट नीति के तहत पूर्वोत्तर का विकास और अफ्रीक-एशिया आर्थिक गलियारे का निर्माण भी शामिल है. हालांकि यूए2आई एंफिबियस एयरक्राफ्ट की खरीद के मुद्दे पर जापान से सहमति बननी अब भी बाकी है लेकिन यह साफ है कि दोनों देशों की गहरी साझेदारी अब धीरे-धीरे स्थिर हो रही है जिसमें वह रणनीतिक दिशा भी है जो इस समय बहुत जरूरी है. (स्रोत)