चंद्रमा पर के काले धब्बों को देख कर प्राचीनकाल में सभी लोग यही अनुमान लगाते थे कि धब्बों वाली जगहों पर ज़रूर सागर-महासागर होंगे. आधुनिक काल में यह माना जाने लगा था कि चंद्रमा एक निहायत सूखा हुआ जीवनहीन आकाशीय पिंड है. उसके काले धब्बे गहरे गड्ढों के अलावा और कुछ नहीं हैं. 1969 से 1972 तक चले अमेरिका के 6 चंद्र-अभियानों के दौरान अंतरिक्षयात्री चंद्रमा पर उतरे, वहां विचरण किया और वहां की धूल-मिट्टी तथा कंकड़-पत्थर के नमूने लेकर आये. उनके अध्ययन-विश्लेषण से यह पता नहीं चल पाया कि चंद्रमा पर कहीं पानी भी है या नहीं. किसी विश्वसनीय प्रमाण के अभाव में यही माना जाने लगा कि चंद्रमा पर पानी शायद नहीं है,

यह गुत्थी सबसे पहले पक्के तौर पर सुलझायी भारत के प्रथम चंद्रयान ने. 22 अक्टूबर 2008 को प्रक्षेपित चंद्रयान-1 पांच दिन बाद 27 अक्टूबर 2008 को चंद्रमा के पास पहुंचा था. वहां पहले तो उसने चंद्रमा से 1000 किलोमीटर दूर रह कर एक वृत्ताकार कक्षा में उसकी परिक्रमा की. कुछ समय बाद वह चंद्रमा के और नजदीक गया. अब वह ध्रुवीय कक्षा में रह कर 200 किलोमीटर की दूरी पर से, और अंततः 12 नवंबर 2008 से, केवल 100 किलोमीटर की दूरी पर से हर दो घंटे में चंद्रमा की परिक्रमा पूरी करने लगा.

जब चंद्रमा पर पंडित नेहरू का जन्मदिन मना

इसी दौरान दो ही दिन बाद, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के जन्मदिन, यानी 14 नवंबर के दिन, चंद्रयान-1 ने मून इम्पैक्ट प्रॉब नाम का 29 किलो भारी एक परीक्षण-उपकरण चंद्रमा के उत्तरी ध्रुव के पास गिराया. एक मासस्पेक्ट्रोमीटर, वीडियो कैमरे और एक ऊंचाई-मापी रडार से लैस इस उपकरण ने नीचे गिरते समय चंद्रमा की ऊपरी सतह के अनेक चित्र लिये, उसके अत्यंत विरल वायुमंडल के अवयवों का विश्लेषण किया और दूसरे कई आंकड़े भी ऊपर परिक्रमा कर रहे चंद्रयान-1 को भेजे.

दो वर्षों के अपेक्षित जीवनकाल के बदले केवल 312 दिनों की सक्रियता के बाद, 29 अगस्त 2009 को, परिक्रमारत चंद्रयान-1 के साथ संपर्क टूट गया और कभी जुड़ नहीं सका. तब तक उसने जो चित्र और आंकड़े भारतीय अभियान नियंत्रण केंद्र को भेजे थे, उन्हें उन देशों के साथ भी साझा किया गया, जिनके उपकरण चंद्रयान-1 अपने साथ ले गया था. रेडियों-संपर्क टूटने के बाद भी चंद्रयान-1 काफ़ी समय तक चंद्रमा की परिक्रमा करते हुए 2012 में उससे टकरा कर नष्ट हो गया.

संक्षिप्त जीवनकाल, दीर्घजीवी उपलब्धियां

चंद्रमा के वायुमंडल और उसकी ऊपरी सतह की जांच-परख के लिए चंद्रयान-1 अपने साथ जो वैज्ञानिक उपकरण ले गया था, उनमें से पांच भारतीय वैक्षानिकों ने स्वयं बनाए थे और और छह विदेशी थे. इन छह विदेशी उपकरणों में से तीन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी ईएसए, दो अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा और एक बुल्गारिया ने दिया था. चंद्रयान-1 का जीवनकाल भले ही बहुत संक्षिप्त रहा, पर उसने चंद्रमा के बारे में जो जानकारियां भेजीं वे उतनी ही दीर्घजीवी और महत्वपूर्ण सिद्ध हो रही हैं. उनका विश्लेषण आज तक चल रहा है.

चंद्रमा की भौगोलिक बनावट के बारे में चंद्रयान-1 द्वारा भेजी जानकारियों के आधार पर 2009 में पहला महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाला गया कि चंद्रमा के ध्रुवों के पास बर्फ के रूप में भारी मात्रा में पानी है. यह पानी भावी चंद्र-यात्राओं और वहां बस्तियां बसाने के काम आ सकता है. पानी केवल पानी के तौर पर ही इस्तेमाल नहीं हो सकता, उसके अणुओं के विखंडन द्वारा प्राप्त ऑक्सीजन का मानवीय श्वसनक्रिया के लिए और ऑक्सीजन और हाइड्रोजन का रॉकेटों के ईंधन के तौर पर भी उपयोग हो सकता है.

चंद्रयान-1 ने जितनी कम ऊंचाई पर से चंद्रमा के फेरे लगाए थे, उतनी कम ऊंचाई पर से उससे पहले किसी दूसरे देश के अंतरिक्षयान ने उसकी परिक्रमा नहीं की थी. इस कारण चंद्रमा की ऊपरी सतह की बनावटों को उसके कैमरे ने जिस बारीक़ी के साथ देखा, उसके आधार पर चंद्रमा का एक नया और कहीं सटीक नक्शा बनाना संभव हो गया.

चंद्रतल के नीचे पानी

2009 में हुए पहले अध्ययनों में चंद्रमा के ध्रुवों के पास बर्फीले पानी की पुष्टि चंद्रयान-1 के इन्फ्रारेड (अवरक्त किरण) मापी की सहायता से हुई थी. इन मापनों के आंकड़ों का जर्मनी के डोर्टमुंड तकनीकी विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों और उनके रूसी सहयोगियों ने हाल ही में दोबारा अध्ययन किया. इस नये अध्ययन के लिए उन्होंने एक नयी विश्लेषण विधि का उपयोग किया और पाया कि चंद्रमा के केवल ध्रुवों पर ही नहीं, बल्कि उसकी पूरी ऊपरी सतह के ठीक नीचे एक ऐसी परत है, जिसमें ऑक्सीजन और हाइड्रोजन के यौगिक छिपे रहते हैं

इस नये अध्ययन से यह बात भी सामने आयी कि पानी वाले यौगिकों की यह उपस्थिति दिन के प्रहर के अनुसार बदलती रहती है. चंद्रमा के उत्तरी और दक्षिणी गोलार्धों के पठारों-जैसे इलाकों में पानी वाले यौगिकों की सांद्रता (कॉन्सनट्रेशन) कुल मिलाकर ‘मारे’ (सागर) कहलाने वाली गहराइयों की अपेक्षा अधिक होती है. दोपहर आने के साथ पठारों पर की यह सांद्रता कम होती जाती है और शामों को फिर बढ़ जाती है.

पानी आता कहां से है?

इस प्रश्न का उत्तर अब भी रहस्य बना हुआ है कि चंद्रमा पर न तो बादल होते हैं और न बरसात होती है, तो फिर पानी आता कहां से है? जर्मन और रूसी वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यह पानी, जो कि हमारे सागरों या नदियों-तालाबों के पानी की तरह तरल पानी नहीं है, अंशतः सौर आंधियों के प्रभाव से चंद्रमा पर ही बनता है. उनका कहना है कि सौर आंधी के साथ चंद्रमा पर प्रोटॉन कणों की जो बौछार होती है, वह संभवतः उसकी ऊपरी सतह की चट्टानों और पत्थरों में निहित ऑक्सीजन के अणुओं के साथ अभिक्रिया द्वारा जल (एचटूओ) और हाइड्रॉक्सिल (ओएच) अणुओं का निर्माण करती है. यह दोनों यौगिक दिन की गर्मी के साथ भाप बन जाते हैं, इसीलिए चंद्रतल की सबसे ऊपरी परत में हाइड्रोजन-ऑक्सीजन यौगिकों की सांद्रता बदलती रहती है.

डोर्टमुंड तकनीकी विश्वविद्यालय के शोधकों का मानना है कि चंद्रमा के पठारी इलाकों में ऐसी जगहें भी होनी चाहिये, जहां पानी का बिल्कुल ही नहीं या फिर आसानी से वाष्पीकरण नहीं होता हो. उनका कहना है कि जलभंडारों वाली इन जगहों का पता लगाना अब अगली चुनौती है.

चंद्रयान-2 की तैयारी

हो सकता है कि भारत का अगला चंद्रयान, चंद्रयान-2 इस चुनौती को कुछ आसान बना दे. उसे 2017 में ही चंद्रमा पर पहुंच जाना चाहिये था. पर तकनीकी कारणों से इसमें विलंब हो रहा है. इसरो ने बीती मई में बताया कि चंद्रयान-2 को 2018 की पहली तिमाही में छोड़ा जायेगा. वह चंद्रयान-1 की अपेक्षा कहीं बड़ा और भारी होगा और अपने साथ चंद्रमा पर उतरने वाला एक अवतरणयान (लैंडर) भी ले जायेगा, जिसमें चंद्रमा पर विचरण करने वाला एक रोवर भी होगा.

प्रक्षेपण के समय चंद्रयान-2 का कुल वज़न 3250 किलो, यानी सवा तीन टन होगा. मुख्य यान चंद्रयान-1 के समान ही चंद्रमा से 100 किलोमीटर दूर रह कर उसकी परिक्रमा करेगा. लैंडर कुछ समय बाद मुख्य यान से अलग हो कर चंद्रमा की सतह पर हौले-से उतरेगा और उसमें रखा रोवर, सब कुछ ठीक होने पर, बाहर निकल कर लैंडर के आस-पास घूमता हुआ तस्वीरें तो लेगा ही, चंद्रमा की ज़मीनी बनावट के नमूने लेकर विभिन्न उपकरणों की सहायता से उनकी जांच-परख करेगा.

रोवर

रोवर का वजन 20-30 किलो के बीच होगा और वह पहियों के सहारे सौर ऊर्जा से चलेगा. वह जो भी चित्र आदि लेगा या जानकारियां जुटाएगा, उन्हें लैंडर के माध्यम से चंद्रमा की परिक्रमा कर रहे मुख्य यान तक को भेजा जाएगा जो उन्हें भारत में मिशन नियंत्रण केंद्र तक पहुंचायेगा. इस प्रकार मुख्य यान और लैंडर भारत में बैठे वैज्ञानिकों के साथ संपर्क के रिले-स्टेशन का काम करेंगे.

लैंडर और रोवर का सम्मिलित वजन लगभग 1250 किलो होगा. पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति चंद्रमा की अपेक्षा छह गुना अथिक होने के कारण यह वज़न वहां केवल 208 किलो के बराबर रह जायेगा. शुरुआत में यह लैंडर रूस और भारत के बीच सहयोग से विकसित किए जाने की उम्मीद थी. पर रूस ने जब 2015 से पहले लैंडर के विकास में अपनी असमर्थता जताई, तो भारतीय अधिकारियों ने स्वतंत्र रूप से उसे विकसित करने का निर्णय लिया. इस समय उसकी कार्यकुशलता और मज़बूती के कुछ अंतिम परीक्षण चल रहे हैं. आशा करनी चाहिये कि चंद्रयान-2 भी चंद्रमा पर पहुंच कर भारत और उसके अंतरिक्ष वैज्ञानिकों की प्रतिष्ठा में एक बार फिर चार चांद लगायेगा.