इस किताब के अध्याय ‘घट रही है दोस्ती की गुंजाइश’ का एक अंश : ‘वैसे जिन संबंधों में भावुकता, रूढ़िवादिता, दहशत और उन्माद हावी हो, वहां तर्क और सदाशयता का होना असंभव ही है. इन भावनाओं, उन्माद और दहशत को पीढ़ियों से शिक्षा प्रणाली ने इस क़दर बढ़ावा दिया है कि यह एक आभासी सिद्धांत-सा बनकर लोगों के दिमाग पर हावी हो गया है. पाकिस्तानी इतिहासकार केके अज़ीज़ के मुताबिक पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली में किताबें ऐतिहासिक गलतियों से भरी पड़ी हैं... सामाजिक अध्ययन की 66 स्कूली किताबों और पाकिस्तानी कोर्स की अन्य किताबों, जो कि पाकिस्तानी स्कूली शिक्षा के अनिवार्य विषय हैं, का परीक्षण कर अज़ीज़ ने तर्क दिया कि ये किताबें पाकिस्तान में सैन्य शासन की समर्थक हैं, हिंदुओं के खिलाफ नफ़रत बढ़ाने वालीं, युद्ध को महिमामंडित करने वालीं और 1947 के पहले के क्षेत्रीय इतिहास, जिसमें पाकिस्तान शामिल है, उसको तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करती हैं.

अज़ीज़ के मुताबिक पाकिस्तान में तालीम की शुरुआत में ही बच्चों को यह सिखाया और विश्वास दिलाया जाता है कि ‘पाकिस्तान इस्लाम का दुर्ग था’, ‘इस्लाम के आने से हिंदू समाज में सुधार हुए’, ‘मुस्लिम जब इस देश में आए तो वे अपने साथ एक स्वच्छ और संभ्रांत संस्कृति और सभ्यता लेकर आए और हिंदुओं को हमेशा मुस्लिम संस्कृति और सभ्यता का ऋणी होना चाहिए’ और ‘हिंदू स्वतंत्रता के बाद भारत की सत्ता संभालना चाहते थे. ब्रिटिश शासन ने उनका साथ दिया, लेकिन मुसलमानों ने इस निर्णय को नहीं माना.’



किताब : भारत vs पाकिस्तान
लेखक : हुसैन हक़्क़ानी
अनुवादक : सुशील चंद्र तिवारी
प्रकाशक : जगरनॉट बुक्स
कीमत : 250 रुपये


फांस चाहे जितनी भी बारीक हो, जब भी शरीर के किसी हिस्से में धसती है तो पूरे वजूद को परेशान कर देती है. शरीर में रह गई फांस की खासियत यह है कि वह खुले जख्म की तरह दिखती नहीं, पर भीतर ही भीतर नासूर बन जाती है. विडम्बना यह है कि फांस सिर्फ इंसानी जिस्म में ही नहीं, बल्कि मुल्क के सीने में भी गड़ सकती है. पाकिस्तान भारत के सीने में धंसी वही फांस है, जो अब भीतर ही भीतर पक चुकी है... और लगभग यही ख्याल पाकिस्तान का भारत के बारे में भी होगा. हुसैन हक़्क़ानी की यह किताब इन दोनों मुल्कों के सीने में धंसी इस फांस को साफ तौर पर दिखाने की बेहद ईमानदार कोशिश है.

संयुक्त राज्य अमेरिका में पाकिस्तान के राजदूत रह चुके हुसैन हक़्क़ानी एक पत्रकार भी हैं. साथ ही वे बेनज़ीर भुट्टो समेत चार पाकिस्तानी प्रधानमंत्रियों के सलाहकार भी रह चुके हैं. इस दौरान उन्होंने भारत-पाकिस्तान के रिश्ते को काफी करीब से देखा-समझा है और इस किताब में काफी हद तक तटस्थ तरीके से बयान किया है. मूल रूप से अंग्रेजी में लिखी गई इस किताब में पांच लंबे आलेखों के जरिये उन्होंने दोनों देशों के इस रिश्ते की जड़ों से लेकर, वर्तमान में दरख़्त बनने तक के सफर की निशानदेही की है.

एक जगह वे लिखते हैं - ‘भारत-पाकिस्तान संबंध दरअसल दो समानांतर और प्रतिस्पर्धी राष्ट्रवाद के शिकार रहे हैं. सैन्य शासन के प्रभाव में पाकिस्तानी राष्ट्रवाद का विकास भारत विरोधी विचारधारा के तौर पर ही हुआ है. पाकिस्तान के नामी विचारक खालिद अहमद के मुताबिक, ‘पाकिस्तानी राष्ट्रवाद, 95 फीसदी भारत से नफरत से बना है. वे इसे इस्लाम कहते हैं, क्योंकि यही एक तरीका है, जिससे हमने अपने आप को भारत से अलग वजूद के तौर पर पहचाना है.’

कश्मीर, भारत और पाकिस्तान संबंधों के बीच एक ऐसी हड्डी बन गया है जिसे दोनों में से कोई उगलना नहीं चाहता, लेकिन जिसे कोई निगल भी नहीं पा रहा है. 1972 में पाकिस्तान में अमेरिका के राजदूत सिडनी सोबन का कहना था कि बांग्लादेश गंवाने के बाद, पाकिस्तान के साथ कश्मीर की आज़ादी का मुद्दा और भी ज्यादा भावनात्मक ढंग से जुड़ गया है. हुसैन हक़्क़ानी का मानना है कि कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान आज भी किसी सोची-समझी रणनीति पर काम नहीं कर रहा है.

इस मसले पर हक्कानी लिखते हैं - ‘इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्तानी ये मानते हैं कि ‘कश्मीर पाकिस्तान के गले की नस है’. कहा जाता है कि यह वाक्य जिन्ना का है, जो उन्होंने बंटवारे के समय कहा था. आज यह वाक्य हर पाकिस्तानी बच्चे को स्कूल से लेकर घर तक कंठस्थ कराया जाता है. हाल में तो जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक और बहुत ही विख्यात बयान दिया कि ‘कश्मीर हमारे खून में है’, लेकिन यह अवधारणा या फिर पाकिस्तान का यह दावा सिवाय बयान के आगे कभी भी किसी शानदार रणनीति या फिर सोची-समझी ज़मीनी हक़ीकत वाली कार्ययोजना तक का अमली जामा नहीं पहन सका.’

इस किताब में हक़्क़ानी कश्मीर के प्रति पाकिस्तान की इस सोच पर सवाल उठाते हुए पूछते हैं - ‘क्या कश्मीर सच में पाकिस्तान के गले की नस है, और अगर है तो कोई देश इसके बिना 69 साल कैसे ज़िंदा रहा? भारत और पाकिस्तान के अस्तित्व के लिए अगर यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, तो अब तक ना सुलझाए जा सकने वाले इस विवाद को लेकर परमाणु विभीषिका झेलने तक का जोखिम हम क्यों उठाने को तैयार हैं?’

पूरी दुनिया में उत्तर कोरिया के अलावा पाकिस्तान दूसरा ऐसा देश है जो परमाणु बम का ‘पहले इस्तेमाल न करने’ का वादा करने को आज भी तैयार नहीं है. पाकिस्तान भारत के प्रति डर को अपने परमाणु बम कार्यक्रम की बुनियाद बताता है. जबकि हक़्क़ानी इस बात से इत्तेफाक नहीं रखते. वे कहते हैं - ‘पाकिस्तान दुनिया का इकलौता ऐसा देश है जो खुलेआम कहता है कि उसके परमाणु हथियार सिर्फ़ एक देश यानी भारत से सुरक्षा के लिए बने हैं...’

‘...2016 के दौरान पाकिस्तान के विदेश मामलों के सलाहकार सरताज अज़ीज ने कहा कि, ‘इस इलाके के लिए आतंकवाद नहीं, बल्कि भारत सबसे बड़ा खतरा है’...भारत सबसे बड़ा खतरा है, ये दावा इसलिए झूठा लगता है क्योंकि आंकड़ों के मुताबिक आतंकवादियों के हाथों लगभग 40 हज़ार पाकिस्तानी या तो मारे गए हैं या फिर घायल हुए हैं... सरताज अज़ीज, पाकिस्तान की सुई के बार-बार भारत पर अटक जाने की उस मनोदशा को बयां कर रहे थे, जिसे एक बार अमेरिकी प्रधानमंत्री जॉर्ज बुश ने ‘सनक’ करार दिया था.’

यहां तक कि अमेरिका को भी इस बात का साफ तौर पर अहसास है कि भारत जैसा शांत देश पाकिस्तान के लिए खतरा बिल्कुल नहीं है. मुंबई हमलों के बाद अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलीज़ा राइस ने पाकिस्तानी सुरक्षा सलाहकार मेजर जनरल महमूद दुर्रानी से कहा था - ‘उस भारतीय खतरे पर अपनी ऊर्जा केंद्रित करना, जो है ही नहीं, एक भारी भूल है. पाकिस्तान को एक रणनीतिक फैसला लेना होगा ताकि उसका आतंकियों से हर तरह से जुड़ाव खत्म हो सके.’

सुशील चन्द्र तिवारी ने अपने उम्दा अनुवाद से हुसैन हक़्क़ानी के बयान और जज्बे का पूरा सम्मान किया है. यह किताब पढ़कर बहुत साफ तौर पर समझ में आता है कि पाकिस्तान एक डरा हुआ देश है. उसे आज भी हर पल इस बात का डर सता रहा है कि भारत कहीं उसके एक अलग मुल्क के तौर पर अस्तित्व को खत्म करके फिर से अखंड भारत की तरफ कदम न बढ़ाने लगे. हुसैन हक़्क़ानी ने इस किताब में काफी सुलझे और सीधे तरीके से उन तथ्यों को दर्ज किया है, जो साफ तौर पर इशारा करते हैं कि भारत और पाकिस्तान कभी दोस्त नहीं हो सकते!

इस किताब में पाकिस्तान से जुड़े कई दिलचस्प खुलासे भी हैं. हुसैन ने इस किताब में अपने मुल्क की गलतियों पर कई जगह निर्ममता से उंगलियां रखते हुए कहा है कि भारत को लेकर पाकिस्तान की सनक ही दोनों देशों की समस्याओं के केन्द्र में है. यह किताब भारत और पाकिस्तान के अतीत और भविष्य के रिश्तों पर बेहद तथ्यात्मक तरीके से तर्कों की रोशनी डालती है. और इसलिए इन दोनों देशों के भावी अच्छे रिश्तों को लेकर कोई भी हवाई किला हमारे जेहन में नहीं बनाती.