इंदौर में रहने वाले विशाल शर्मा कंस्ट्रक्शन के कारोबार में हैं.


बात उस समय की है, जब मैं आठ साल का रहा होउंगा. यह साल था 1984 जो बहुत सी बातों के लिए याद किया जाता है जैसे - प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या, सिख दंगे, भोपाल गैस त्रासदी. हालांकि यह साल मुझे दो अलग वजहों से याद है. पहली यह कि उसी साल से मैंने अखबार पढ़ना शुरू किया था. और दूसरी यह कि हमारे मध्य प्रदेश के तत्कालीन सीएम अर्जुन सिंह की कृपा से हमें उस साल स्कूल में जनरल प्रमोशन मिल गया था यानी हम परीक्षा दिए बगैर ही अगली कक्षा में पहुंच गए थे.

मेरे घर पर तीन बहनों के बाद मैं सबसे छोटा था. दीदियां पापा की लाड़ली थीं और मैं मम्मी का. पापा की एक खासियत थी कि उनको गुस्सा बहुत आता था. इतनी जोर का कि उनके आगे मम्मी की भी नहीं चलती थी. फिर पुलिस की नौकरी भी हो तो ज्यादातर वक्त गुस्से में चार चांद लगे ही रहते हैं. हम कुछ भी मस्ती करें, शैतानी करें, लड़ाई-झगड़ा करें उसकी सुनवाई पापा ही करते थे और सजा भी वो ही सुनाते थे. उनकी तरफ से मिलने वाली सजा अक्सर यह होती थी कि हमें घर से बाहर कर आधे-एक घंटे के लिए दरवाजा बंद कर लिया जाता था. मेरे साथ बुरा यह था कि सबसे ज्यादा सजा मुझे मिलती थी. हम भाई-बहनों के झगड़े में दीदी की गलती होने पर भी निन्यानवे प्रतिशत चांस होते कि सजा मुझे मिलेगी. यहां पर मुझे पापा का दीदियों के लिए पक्षपात साफ नजर आता था.

ये तो हुआ हमारे परिवार का ब्यौरा, अब किस्से पर आते हैं. पापा सरकारी नौकरी में थे सो हमारा तबादला होता रहता था. उस साल यह तबादला (तब मप्र और अब छत्तीसगढ़ के) बिलासपुर जिले में हुआ. जैसा कि आपको भी पता ही होगा कि सरकारी घर मिलने में अक्सर समय लग जाया करता है. हमारे साथ भी ऐसा ही कुछ हुआ इसलिए कुछ दिन रेस्ट हाउस में रहने के बाद हम सरकारी घर मिल जाने तक एक किराए के मकान में शिफ्ट हो गए. इस मकान की खासियत यह थी कि इसके सामने एक स्कूल था जिसका नाम था - शेफर स्कूल. इस स्कूल के अगल-बगल में कोई खास मकान नहीं थे. हमारे घर के पीछे की तरफ कब्रिस्तान-श्मशान था और हमारी रसोई की खिड़की से दिन में शव दहन या खाक-सुपुर्दगी का सारा कार्यक्रम नजर आता था.

उस घर में रहते हुए ऐसा कई बार हुआ कि मैं कोई शरारत करता या बहनों से लड़ाई-झगड़ा करता तो बाहर निकाल दिया जाता. मैं तब शायद दूसरी या तीसरी क्लास में रहा होउंगा. किसी शरारात के बाद एक दिन मैं ऐसे ही बाहर निकाल दिया गया. समय रहा होगा रात के साढ़े सात या आठ बजे का. उस समय ना वाट्सएप होता था, ना हर घर में टीवी, इसलिए कायदे से वह वक्त रात माना जाता था.

अब जरा सोचिए, मैं बाहर और घर का दरवाजा बंद. घर के पीछे कब्रिस्तान था तो मेरे दिमाग में लगातार डरावने ख्याल आ रहे थे. बाहर मुझे इतना ज्यादा डर लग रहा था कि मैं बार-बार दरवाजे से चिपक जाता. पलटकर देखने पर घर के आस-पास सन्नाटा और सामने स्कूल का ख़ाली ग्राउंड ही नजर आता था. बाहर वाले डर की इंतिहा तो थी ही पर पापा से भी बहुत डरता था इसलिए रो भी नहीं पाया. अंदर ही अंदर मैं कितना रोया और कितना डरा, यह कभी किसी को नहीं कह पाया. वो बीस मिनट या आधे घंटे मेरे जीवन के सबसे डरावने पल थे. बाहर कुछ नहीं घटा था, लेकिन मेरे मन में बहुत कुछ घट चुका था. फिर जैसे ही दरवाजा खुला मुंह से एक शब्द नहीं निकाला, सीधे अपने बिस्तर पर नजर आया.

सात साल की उम्र में मिली वह सजा मेरे जेहन में कुछ यूं जम गई कि आज चालीस साल का होने पर भी मुझे वह वाकया पूरी तरह याद है. खैर, हमारे पापा का सजा देने का यह तरीका तो तब भी जारी रहा जब हमें विकास नगर कॉलोनी में सरकारी घर मिल गया. कॉलोनी में रहते हुए कई बार दीदी को भी मेरे साथ सजा मिलती थी. लेकिन तब तक हम बेशर्म हो चुके थे इसलिए कॉलोनी में घूमने निकल जाया करते थे. बात यूं थी कि अगर घर के बाहर खड़े रहते और अड़ोस-पड़ोस से कोई यह पूछ लेता कि क्यों खड़े हो तो इसके जवाब में तो हमारी इज्जत का फालूदा बन जाता.

खैर जब बड़े हुए तो उस डर ने इतना तो सिखाया ही कि अकेलापन या भूत-प्रेत डरने वाली बातें नहीं हैं. बावजूद इसके मेरी बेटी के साथ मैंने ऐसा कभी नहीं किया. मैंने तो उस सजा से बाद में बहुत-कुछ सीखा भी, लेकिन कुछ बच्चों के लिए ऐसे अनुभव खतरनाक हद तक नकारात्मक भी हो सकते हैं.

(पाठक बचपन से जुड़े अपने संस्मरण हमें mailus@satyagrah.com या anjali@satyagrah.com पर भेज सकते हैं.)