आखिर क्यों फरहान अख्तर दिल चाहता है का सीक्वल बनाना नहीं चाहते?

फरहान अख्तर के सितारे इन दिनों गर्दिश में चल-दौड़ रहे हैं. भाग मिल्खा भाग के बाद उनके अभिनय से सजी कोई फिल्म सफल नहीं रही और न ही दुनिया उनकी मेहनत की कद्र कर रही है. शादी के साइड इफेक्ट्स, वजीर, रॉक ऑन 2 और लखनऊ सेंट्रल दर्शकों को पसंद नहीं आई और इन फिल्मों उनके अभिनय के भी लोग मुरीद नहीं हुए. ऊपर से उन्होंने 2011 (डॉन 2) के बाद कोई फिल्म भी निर्देशित नहीं की.

जाहिर सी बात है कि बैक टू बैक असफलताओं के बाद फिल्म सितारे वही काम दोबारा करना चाहते हैं जिसमें कि वे सबसे ज्यादा निपुण हों. फरहान भी निर्देशक कमाल के हैं, इसलिए शायद सफलता पाने के लिए अब वे वापस निर्देशक की कुर्सी संभालने का मन बना चुके हैं. इसकी संभावना इसलिए भी बनती हुई नजर आ रही है क्योंकि जब हाल ही में उनसे पूछा गया कि क्या डॉन की सीक्वल पर काम चल रहा है तो बिना टाल-मटोल किए उन्होंने सीधे कहा कि डॉन 3 बनाने की पूरी योजना है. और चूंकि डॉन की कहानी प्लॉट आधारित है, इसलिए उसे आसानी से आगे बढ़ाया जा सकता है. मतलब, लगभग पक्का है कि कुछ ही वक्त में डॉन 3 पर फरहान अख्तर काम शुरू करने वाले हैं और छह साल बाद फिर से शाहरुख खान के साथ लौटकर दोनों की ही नैया पार लगाने की कोशिश करने वाले हैं.

इन सब में दिलचस्प यह है कि इसी दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या कल्ट ‘फिल्म दिल चाहता है’ का सीक्वल भी वे बनाएंगे तो उन्होंने साफ तौर से इंकार कर दिया. उन्हें यह विचार भी पसंद नहीं आया कि इसे तीन नायिकाओं के साथ भी बनाया जा सकता है और वे साफ बोले कि जहां तक होगा वे खुद दिल चाहता है नहीं बनाएंगे. क्योंकि उसे बनाने के लिए एक खास तरह की ऊर्जा, मूड और वह ‘स्पेस’ चाहिए जिसमें वे 16 साल पहले हुआ करते थे, और आज चाहकर भी वहां पहुंच नहीं सकते हैं.

कुछ स्टार कितने भी व्यावसायिक हो जाएं, समझदार बने रहते हैं!

विज्ञान की बारीक बातें समझने वाले हमारे सुशांत सिंह राजपूत फिल्मी ज्ञान से लगातार मात खाते जा रहे हैं!

पता चला है कि इंजीनियरिंग की डिग्री कमा चुके सुशांत सिंह राजपूत हीरो बनने के बाद भी बेहद पढ़ाकू हैं! उन्हें खगोल भौतिकी में खास दिलचस्पी है और हाल ही में उन्होंने एक ऐसा टेलीस्कोप खरीदा है जिससे वे हर ग्रह को बेहद नजदीक से देख सकते हैं. सुशांत के घर में 100 से ज्यादा किताबें भौतिकी, ब्लैक होल और वॉर्म होल सिद्धांतों से जुड़ी हुई मौजूद हैं और ब्रह्माण्ड के रहस्यों का नैनसुख लेने के लिए ही अब उन्होंने बेहद आधुनिक, महंगा और बेहद विशाल टेलीस्कोप खरीदा है.

लेकिन बदकिस्मती देखिए, बॉलीवुड के रहस्यों की सूक्ष्म पड़ताल करने वाला टेलीस्कोप आज तक नहीं बन पाया है! आशंका है कि जिस फिल्म ‘चंदा मामा दूर के’ के लिए सुशांत बेहद जोर-शोर से तैयारी कर रहे थे, वो शायद डिब्बाबंद हो सकती है. जबकि इस फिल्म के लिए हॉलीवुड के स्पेशलिस्ट से महंगा स्पेस सूट तैयार करवाया जा चुका है, और सुशांत नासा तक जाकर ट्रेनिंग ले चुके हैं, लेकिन इसका भविष्य इरोस नामक स्टूडियो की वजह से हाल-फिलहाल अधर में लटका हुआ है.

वजह है कि संजय पूरन सिंह चौहान निर्देशित इस फिल्म के बढ़ते बजट से इरोस घबरा गया है और हाथ पीछे खींचने का पूरा मन बना चुका है. संजय पूरन सिंह चौहान भी दूसरे निर्माताओं को ढूंढ़ने में लगे हैं और अगर इस महंगी फिल्म के पीछे कोई दमदार निर्माता जल्द ही खड़ा न हुआ, तो ‘रोमियो अकबर वॉल्टर’ के बाद यह दूसरी फिल्म होगी जिसके लिए सुशांत ने तैयारियां तो कीं, लेकिन फिल्म नहीं बनी.


‘फेमिनिज्म किसी भी समाज का हिस्सा नहीं होना चाहिए क्योंकि ऐसा होने पर हम यह साबित कर देते हैं कि वहां महिलाओं को समानता का अधिकार नहीं दिया जाता. इस तरह की बीमारी के लिए फिर फेमिनिज्म नाम की दवाई लेनी पड़ती है!’

— कंगना रनोट, फिल्म अभिनेत्री

फ्लैशबैक | जब महबूब खान को बंटवारे के बाद पाकिस्तान रास नहीं आया और लौटकर उन्होंने मदर इंडिया जैसी फिल्म हिंदुस्तान को दी

कम ही लोग जानते हैं कि 1957 में ‘मदर इंडिया’ बनाकर विश्वख्यात हुए महबूब खान बंटवारे के वक्त पाकिस्तान चले गए थे. 1947 से पहले की उनकी फिल्में भले ही ‘मदर इंडिया’ की तरह हिंदुस्तानी आवाम पर गहरा असर नहीं छोड़ पाई थीं, लेकिन ‘अलीबाबा’ (1940), ‘औरत’ (1940), ‘हूमायूं’ (1945) और नरगिस अभिनीत ‘अनमोल घड़ी’ (1946) की वजह से वे बॉम्बे फिल्म इंडस्ट्री में एक मंझे हुए फिल्मकार के तौर पर पहचाने जाते थे.

इसी दौर में उन्होंने अपनी निर्माण कंपनी महबूब प्रोडक्शन्स की भी स्थापना की थी और मुंबई के बांद्रा इलाके में महबूब स्टूडियो की नींव रखी थी. लेकिन इतना सबकुछ होने के बावजूद जब हिंदुस्तान का बंटवारा हुआ तो वे नूरजहां जैसी कई दूसरी फिल्मी हस्तियों की तरह ही सपरिवार पाकिस्तान चले गए.

कोई नहीं जानता कि वहां उन्होंने क्या भोगा, लेकिन कुछ वक्त बाद ही वे और उनके दोस्त व फिल्मकार एआर करदार चुपचाप हिंदुस्तान लौट आए. आने या जाने के कारणों का उन्होंने कभी सार्वजनिक मंच पर कोई जिक्र नहीं किया, इसीलिए शायद उनके पाकिस्तान जाने के बारे में कम ही जानकारियां पब्लिक डोमेन में मौजूद हैं.

हिंदुस्तान लौटने के बाद भी लेकिन, उनकी मुसीबतें कम नहीं हुईं. मौजूदा कानून के चलते तब तक भारत सरकार उनकी सम्पत्ति जब्त कर चुकी थी और कई एकड़ में फैले महबूब स्टूडियो पर भी सरकारी कब्जा था. लगातार कोशिशों के बावजूद जब महबूब खान अपनी ही सम्पत्ति का मालिकाना हक वापस नहीं पा सके तो तंग आकर उन्होंने अपने घनिष्ट मित्र बाबूराव पटेल की मदद ली. बाबूराव पटेल न सिर्फ उस वक्त की मशहूर फिल्म मैगजीन ‘फिल्म इंडिया’ के मालिक थे, बल्कि सितारों से लेकर कई नेताओं तक से उनके करीबी रिश्ते थे. बॉम्बे के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई को भी वे निजी तौर पर जानते थे और कई ऊंचे ओहदों वाले सरकारी अधिकारियों के साथ उनका उठना-बैठना था.

बाबूराव के दखल के बाद महबूब खान को उनकी सम्पत्ति और महबूब स्टूडियो की जमीन आसानी से वापस मिली और कहते हैं, उन्हीं की सहायता लेकर महबूब खान ने अपने स्टूडियो के आसपास के रेसिडेंशियल स्पेस को कमर्शियल स्पेस में भी तब्दील करवा लिया. इस तरह चंद ही वर्षों में फलता-फूलता महबूब स्टूडियो शूटिंग के लिए कई चर्चित निर्देशकों की पसंद बन गया और यह कहानी भी उसके साथ जुड़ गई कि इसकी मुख्य इमारत में मौजूद मेकअप रूम में दिलीप कुमार और मधुबाला का प्रेम छिपकर परवान चढ़ा था.

पाकिस्तान से लौट आना महबूब खान के लिए भी सही फैसला साबित हुआ. उन्होंने न सिर्फ महबूब स्टूडियो को ऊंचाइयों पर पहुंचाया बल्कि अपने करियर की सर्वश्रेष्ठ फिल्में भी पाकिस्तान से लौटकर ही बनाई. चाहे राज कपूर, नरगिस और दिलीप कुमार के अभिनय से सजी ‘अंदाज’ (1949) हो, ‘आन’ हो या महान फिल्म ‘मदर इंडिया’, मातृभूमि लौटकर आने के बाद ही महबूब खान सिनेमा के इतिहास में हमेशा के लिए दर्ज हुए.