शोमैन शब्द अब तक देश में राज कपूर और सुभाष घई जैसे फिल्मकारों के लिए ही इस्तेमाल होता रहा है. राज कपूर को तो आज तक भारतीय सिनेमा का सबसे बड़ा शोमैन माना जाता है क्योंकि उनके लिए उनकी फिल्में उनका ज़ुनून थीं. इस हद तक कि उन्होंने ‘मेरा नाम जोकर’ बनाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था. गिरवी रख दिया था. वे देश ही नहीं यहां से बाहर के दर्शकवर्ग को भी ध्यान में रखकर फिल्में बनाते थे. इसीलिए विदेश में भी उनके प्रशंसक ख़ासी तादाद में आज भी मौज़ूद हैं. फिल्मों के ज़रिए दर्शकों को कोई न कोई बड़ा संदेश देने की भी उनकी कोशिश हमेशा रहती थी.

पिछले कुछ समय से शोमैन नाम का यह शब्द फिल्मी दुनिया से निकलकर राजनीति में भी दाखिल हुआ है. इन दिनों यह कई बार उस हस्ती के लिए इस्तेमाल हो रहा है जिसने हाल के समय में राजनेता और जनता के बीच संवाद के तरीके का कायापलट कर दिया है. बल्कि कइयों का मानना है कि इस शख्स को भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा शोमैन कहा जाए तो भी ग़लत नहीं होगा. बात प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाे रही है जो आज 67 साल के हो रहे हैं.

आज की तारीख़ में नरेंद्र मोदी का आकलन ऐसे राजनेता के रूप में किया जाता है जो छोटी चीज में भी बड़े राजनीतिक निहितार्थ ढूंढ लेता है. और अगर चीजें बड़ी हों तो नरेंद्र मोदी राजनीतिक फायदे का दायरा उससे भी बड़ा बना लेते हैं. राजनेता हैं इसलिए हर घटना से राजनीतिक संदेश देने की कोशिश करते हैं. और ज़रूरी नहीं कि यह संदेश देश की सीमाओं के भीतर से ही दिया जाए. विदेश के मंचाें का भी वे इसके लिए बख़ूबी इस्तेमाल करते हैं. शायद यही वज़ह है कि आज देश से बाहर उनका भी बड़ा प्रशंसक वर्ग तैयार हो चुका है. वे भी बड़े दांव खेलने का जोखिम लेते हैं. लेकिन इतने नपे-तुले तरीके से कि अब तक तो उन्हें कोई ख़ास नुकसान हुआ नहीं दिखता. अपने टारगेट ऑडिएंस यानी भारतीय मतदाताओं तक पहुंचने के लिए वे सभी माध्यमों का इस्तेमाल करते हैं. वह भी सटीक टाइमिंग के साथ.

सो आज मौका है जब उनके बीते एक साल के कम से कम पांच मेगा शो (हैं तो इससे ज़्यादा भी) के बारे में बात की जा सकती है. शुरुआत ताज़ातरीन से ही करते हैं.

1. जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ अहमदाबाद में आठ किलोमीटर लंबा रोड शो

सितंबर की 14 तारीख. जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे भारत आए थे. देश की पहली बुलेट ट्रेन परियोजना (अहमदाबाद-मुंबई) की आधारशिला रखने के लिए. लेकिन भारत में कदम रखते ही उनके साथ एक नया अनुभव जुड़ा. आठ किलोमीटर लंबे रोड शो का जो जापान में शायद ही उन्होंने किया हो. वैसे नरेंद्र मोदी के लिए किसी राज्य में चुनाव के आसपास इस तरह का रोड शो अब आम हो चला है. उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान चार मार्च को अपने संसदीय क्षेत्र वाराणसी में उनका ऐसा ही रोड शो इसकी एक और मिसाल है. इसके ज़रिए आख़िरी मौके पर उन्होंने चुनावी समीकरण उलट-पलट दिए थे.

हालांकि, गुजरात में उन्होंने पहली बार किसी विदेशी नेता अपने रोड शो का हमराह बनाकर एक नया प्रयोग किया. शिंजो आबे को अहमदाबाद एयरपोर्ट पर ही गार्ड ऑफ ऑनर दिया गया और फिर रास्ते में दोनों तरफ बिखरी भारत-जापान की सांस्कृतिक छटा के बीच खुली जीप में दोनों प्रधानमंत्री गांधीनगर पहुंचे. सब अद्भुत और ऐतिहासिक सा. दोनों महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम गए और सीदी सैयद मस्ज़द भी. अगले दिन बुलेट ट्रेन परियोजना की आधारशिला रखी. यह भी अनोखा. क्योंकि पहली बार दो देशों के शासन प्रमुखों ने मिलकर किसी परियोजना की आधारशिला रखी थी.

लक्ष्य : इसी साल होने वाले गुजरात विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र मतदाताओं, ख़ास तौर पर मुस्लिमाें के लिए सीदी सैयद मस्ज़िद जैसी जगह से समरसता का संदेश देना. बुलेट ट्रेन से देश की आंखों में तेज गति के विकास का ‘सपना’ डालना. विश्व में चीन जैसे प्रतिद्वंद्वियों काे शक्ति-संतुलन का इशारा करना.

2. स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण की 125वीं सालगिरह पर पूरे देश के युवाओं को संबोधन

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स्वामी विवेकानंद ने 11 सितंबर 1893 को अमेरिका में शिकागो की धर्म संसद में दुनिया को भारतीय संस्कृति-सभ्यता की गहराई से परिचित कराया था. 11 सितंबर 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिल्ली के विज्ञान भवन से देश के युवाओं काे ‘यंग इंडिया, न्यू इंडिया’ की अपनी परिकल्पना से परिचित करा रहे थे. और दिलचस्प बात देखिए कि इस मौके पर उन्हें कार्यक्रम संचालक ने ‘21वीं सदी में स्वामी विवेकानंद का सच्चा उत्तराधिकारी’ भी बता दिया. हालांकि विपक्ष को यह सब ज्यादा पसंद नहीं आया. लेकिन इसके बाद भी देश के सभी नहीं तो अधिकांश हिस्सों में ‘मोदी की महिमा’ (मंडन) पहुंच ही गई. वह भी सीधे प्रसारण के ज़रिए.

लक्ष्य : देश के 50 फीसदी के करीब युवा (18-35 साल) मतदाता, जिन्हें नरेंद्र मोदी हमेशा ही ध्यान में रखते हैं.

3. जीएसटी पर आधी रात को संसद का सत्र

एक जुलाई 2017 को देश की संसद आधी रात को जाग रही थी. वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जैसा ऐतिहासिक कर सुधार लागू करने के लिए. सुधार निश्चित तौर पर बड़ा था और आयोजन भी. लेकिन कांग्रेस सहित विपक्ष के कई दलों ने इसका बहिष्कार कर दिया. यह कहते हुए कि जीएसटी जैसी संवैधानिक एवं कानूनी पहल को लागू करने के लिए आधी रात को संसद का सत्र बुलाना इस आयोजन की गरिमा को कम करने जैसा है क्योंकि इससे पहले सिर्फ देश के आज़ाद होने या आज़ादी की सालगिरह मनाने के लिए ही आधी रात को संसद का सत्र हुआ है. लेकिन प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को इन दलीलों से ज़्यादा फर्क़ नहीं पड़ा.

लक्ष्य : देश और संभवत: दुनिया के भी उद्योग और क़ारोबारी जगत को बताना कि मौजूदा सरकार कड़े आर्थिक सुधारों को सख़्ती और असरदार तरीके से लागू करती है.

4. नोटबंदी

आठ नवंबर 2016 की रात देश को एक औचक ख़बर मिली. प्रधानमंत्री मोदी टेलीविज़न पर बता रहे थे, ‘1,000 और 500 के नोट चलन से बाहर कर दिए गए हैं. आप लोगों के पास 50 दिन हैं. इस अवधि में आपके पास जो भी पुराने 500-1,000 के नोट हैं उन्हें बैंकों में जमा कर नए नोट ले सकते हैं.’ इसके बाद पूरा देश क़तार में लगा नज़र आया. जो 50 दिन की समय-सीमा दी गई थी वह खत्म हो गई लेकिन क़तारें ख़त्म नहीं हुईं. लोगों में गुस्सा फूटा लेकिन फूटकर बिख़र भी गया क्योंकि ‘शोमैन’ ने अपने इस जोख़िम भरे क़दम को काले धन, जाली मुद्रा और आतंक को मिल रही वित्तीय मदद रोकने के लक्ष्य से जोड़ दिया था. और इसके साथ ही तक़लीफ भरा दौर राष्ट्रीय भावना से भरपूर जलसे में बदल गया.

लक्ष्य : उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा, मणिपुर जैसे राज्यों में विधानसभा चुनाव से पहले लोगों के बीच यह धारणा बनाना कि सरकार काले धन, जाली मुद्रा और आतंक की वित्तीय मदद रोकने के प्रति गंभीर है.

5. सर्जिकल स्ट्राइक

बीते साल 26-27 सितंबर की दरम्यानी रात भारतीय सेना ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (पीओके) में घुसकर आतंकी शिविरों को तबाह किया और 30-40 आतंकियों को मार गिराया. 29 सितंबर-2016 को जब इसका सरकार और सेना की तरफ से ख़ुलासा किया गया और फिर सूचना-संचार के तमाम माध्यमों के ज़रिए जो प्रचार-प्रसार चला तो लगा कि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ. जबकि यह कदम निश्चित रूप से बड़ा था, लेकिन पहला नहीं.

लक्ष्य : देश के साथ ही पड़ोसी पाकिस्तान और अन्य चुनौतीपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय मोर्चाें (ख़ासतौर पर चीन) पर भी यह संदेश देना कि भारत में निज़ाम बदल चुका है.

शोमैन मोदी के मेगा शो का सिलसिला तीन साल से लगातार चल रहा है और आगे भी चलने वाला है

जैसा कि पहले जिक्र हुआ, यह फेहरिस्त पांच पर ही खत्म नहीं होती बल्कि इससे कहीं ज्यादा लंबी और लंबी होती जाती है. कभी किसी महापुरुष की पुण्यतिथि तो कभी जयंती. कभी जनधन और उज्जवला जैसी योजनाओं की राष्ट्रव्यापी लॉन्चिंग तो कभी योग दिवस जैसे आयोजन. स्वच्छ भारत अभियान, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसी सरकारी पहल और इनके बीच-बीच में विदेश यात्राअों पर मेडिसन स्क्वायर जैसे शो.

जानकार मानते हैं कि ‘शोमैन मोदी’ के हर शो की स्क्रिप्ट बेहद चुस्त होती है और टाइमिंग सटीक. अगर ये शो देश में हैं ताे अमूमन शनिवार, रविवार या अन्य सरकारी छुटि्टयों के दिन आयोजित किए जाते हैं. विदेश में हैं तो कुछ ऐसे समय कि भारतीय टेलीविजन चैनलों के प्राइम टाइम पर उन्हें जगह मिले. यानी दर्शक वर्ग की सुविधा का भी पूरा ख्याल रखा जाता है. ताकि वे आराम से इस तरह के जलसों से दो-चार हों. और तसल्ली से इन पर अपनी राय कायम करें.

मई 2014 में केंद्र सत्ता संभालने के चार महीने बाद सितंबर से ही अमेरिका के मेडिसन स्क्वायर से शोमैन मोदी के मेगा शो का सिलसिला शुरू हुआ था. तब से यह अनवरत चल रहा है. अपने जन्मदिन पर रविवार को प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गुजरात में ही सरदार सरोवर बांध राष्ट्र को समर्पित करने का जलसा इस श्रृंखला की ताज़ा कड़ी है. और पूरा यकीन रखा जा सकता है कि जब तक मोदी प्रधानमंत्री हैं उनकी शोमैनशिप में अागे भी इसी तरह एक के बाद एक कई और कड़ियां जुड़ती जाएंगी.