मैं कई दशकों से यह कहता आया हूं कि शास्त्रीय संगीत और शास्त्रीय नृत्य की विपुल, समृद्ध और सघन स्थिति के बावजूद उनकी आलोचना का घोर अभाव है. इस दारुण स्थिति पर विचार के लिए शिमला के इण्डियन इन्स्टीट्यूट में, मेरे सुझाव पर, तीन दिनों का एक परिसंवाद हुआ जिसमें कुछ संगीतकारों, नर्तकों, आलोचकों और युवा अध्येताओं ने भाग लिया. इस अवसर पर मैंने कुछ प्रश्न उठाये. भारतीय परम्परा में संगीत और नृत्य पर विचार और शास्त्र निर्माण होता रहा है जो आधुनिक काल में बहुत क्षीण, लगभग लुप्त हो गया. आधुनिकता के प्रलोभन में आये साहित्य, ललित कलाओं और रंगमंच की तो आधुनिक आलोचना विकसित हुई पर ऐसा शास्त्रीय क़रार दे दिये गये संगीत और नृत्य के क्षेत्र में नहीं हुआ. जो कुछ थोड़ी-बहुत आलोचना विकसित हुई भी तो उसमें सिद्धान्त-निरूपण और आलोचनात्मक विश्लेषण बहुत कम हैं. इस आलोचना में निरन्तरता और संरक्षण पर इतना ज़ोर रहा है कि उसमें इन दोनों कलाओं में आये परिवर्तनों पर बहुत कम ध्यान दिया गया है और उनकी व्याख्या न्यून है.

इन कलाओं में अध्यात्म खोजने पर इतना बल रहा है कि उनमें चरितार्थ ऐन्द्रियता और श्रृंगार की अनदेखी होती रही. ऐसा भारत में विक्टोरियन नैतिकता के बढ़ते प्रभाव के कारण हुआ और इसलिए भी कि उस समय एक तरह के राष्ट्रवाद का उदय और विस्तार हुआ था जिसमें अध्यात्म तो फ़िट होता था, श्रृंगार नहीं. इन कलाओं के अपेक्षाकृत अधिक लोकतांत्रिक आस्वाद के अवसर बढ़े हैं पर उन पर रसिकों-विशेषज्ञों के आलोचनात्मक ध्यान में गिरावट आयी है. ख़राब और मीडियॉकर को ऐसा बताने की हिम्मत करने वाले बहुत कम रह गये हैं.

यह विचित्र है कि शास्त्रीय कलाओं को स्थिर, शाश्वत और लगभग विजड़ित मानने का दुराग्रह बहुत लोकप्रिय है जबकि उन सभी में हमारे देखते-सुनते कई निर्णायक परिवर्तन हुए हैं. परंपरा में जो परिवर्तन होते हैं वे कई बार अलक्षित रह जाते हैं. इस पर भी बहुत कम ध्यान दिया गया है कि जहां तक औपनिवेशिकता का संबंध है, उसका प्रभाव तथाकथित आधुनिक कलाओं पर बहुत गहरा पड़ा है जबकि शास्त्रीय कलाओं ने उस प्रभाव की अवहेलना कर, एक तरह से, उसका प्रतिरोध किया. शास्त्रीय कलाओं की इस गहरी राजनैतिक चेतना को हमने प्रायः हिसाब में नहीं लिया है.

एक विडम्बना यह भी है कि शास्त्रीय कलाओं की आलोचना में अकसर प्राचीन और मध्यकालीन ग्रन्थों का सहारा लिया जाता है, उनकी पुनर्व्याख्या आदि किसी भी हद तक होती है. पर कोई नया सिद्धान्त विकसित नहीं हो पाया है जबकि साहित्य-ललित कलाओं आदि के ‘आधुनिक’ क्षेत्र में ऐसा हो सका है. इस आलोचना का अन्य कलाओं की आलोचना से कोई संवाद, कई बार तो परिचय तक नहीं है.

अगर शास्त्रीय कलाएं आलोचना के अभाव में या उसकी पर्याप्त उपस्थिति के अभाव में बडे़ कलाकार पैदा करती रही हैं तो यह एक तरह से आलोचना की अन्ततः व्यर्थता की ओर इशारा करता है. दूसरी ओर, इस अभाव ने शिक्षा व्यवस्था में बहुत शून्य उपजाया-पोसा है. स्वयं शास्त्रीय कलाओं में इस समय जो मीडियाक्रिटी लगातार फैल-बढ़ रही है उसका विरोध करने, सकारण उसकी निन्दा करने वाली आलोचना का अभाव है.

इस पर भी विचार नहीं हुआ है कि गै़र शास्त्रीय तत्वों जैसे ध्वनि-प्रसारण, मंदिर और दरबार से अलग मंच, फ़िल्म संगीत के उदय और विस्तार, समर्थन और प्रोत्साहन के घटते स्रोत और अवसर, रसिकता का बदलता छोटा होता वितान आदि ने हमारे समय की शास्त्रीयता को कैसे प्रभावित किया है. शास्त्रीय कलाओं की भंगुरता पर भी कोई चिन्तन सुलभ नहीं है.

कई अछूते पहलू

जो बातचीत हुई उसमें अनुपस्थिति के अलावा उपस्थिति का भी भले वह क्षीण है, आभास हुआ. ज़्यादातर बातचीत में अंग्रेजी में लिखी जाने वाली आलोचना की प्रमुखता रही. अन्य भाषाओं में आलोचना का ज़िक्र कम ही हुआ. इधर जो शोध हो रहा है उसका अधिकांश संगीत और नृत्य की सामाजिकता, आर्थिकी, व्यापक सांस्कृतिक परिदृश्य आदि पर है, स्वयं संगीत और नृत्य की तकनीकी विवेचना उसमें बहुत कम है. यह भी स्पष्ट हुआ कि शास्त्रीय संगीत और नृत्य पर केन्द्रित पत्र-पत्रिकाएं बहुत कम हैं. कई भारतीय भाषाओं में तो एक भी नहीं है.

सदानन्द मेनन ने इस ओर विस्तार से ध्यान खींचा कि शास्त्रीय नृत्य से, विशेषतः भरतनाट्यम में भले श्रृंगार गायब या बहुत कम हो गया हो, वह भारतीय सिनेमा में बना रहा. वहां कम से कम श्रृंगार को लेकर कोई छुईमुईपन नहीं रहा है. उनका यह भी मत है कि श्रृंगार की कथक में भरतनाट्यम के मुकाबले कम हानि हुई है.

इस ओर भी ध्यान गया कि आलोचना के क्षेत्र में संगीत और नृत्य की स्थिति एक जैसी नहीं है. नृत्य के क्षेत्र में अधिक काम हुआ, संगीत को लेकर कम. इस पर भी शायद अध्ययन होना बाकी है कि स्वयं शास्त्रीय शैलियों ने एक-दूसरे को कैसे और कहां प्रभावित किया है.

यह निश्चय किया कि इस तरह के परिसंवाद वार्षिक हों. रज़ा फ़ाउण्डेशन ऐसी एक श्रृंखला शुरू करने का विचार कर रहा है.

कविता और गद्य

हमारे समय में गद्य का वर्चस्व है: कविता की जगह कम है. कविता ने गद्य से काफ़ी सीखा है और कई बार वह गद्य तक हो जाती है. विनोद कुमार शुक्ल का उदय तो कवि के रूप में हुआ था और वे एक प्रमुख कवि हैं लेकिन उन्होंने उपन्यास भी लिखे: वे कवि-उपन्यासकार हैं. उनकी कथाभाषा में कविता की मौजूदगी स्पष्ट देखी-सुनी जा सकती है. कृष्णा सोबती, निर्मल वर्मा, फणीश्वरनाथ रेणु और कृष्ण बलदेव वैद के गद्य के बारे में यह कहा जा सकता है कि वह कई बार गद्य में कविता है.

हाल में राजकमल प्रकाशन से मराठी के मूर्धन्य गद्यकार भालचन्द्र नेमाड़े का हिन्दी अनुवाद में एक कविता संग्रह आया है ‘देखणी’. मुझे पता नहीं था कि वे कवि भी हैं. बल्कि उन्होंने इस संग्रह की भूमिका में लिखा है: ‘कुछ भी लिखने के बारे में सोचनेवाले व्यक्ति से मेरा परामर्श है कि प्रत्यक्ष में कविता चाहे बने या न बने, पर उसे कम-से-कम यह सपना तो देखना ही चाहिये कि रोज़मर्रा के जीने का आसवन होकर प्रतिदिन उसकी कविताओं की ध्वनि-परतों का उद्गम होता रहता है. मेरा प्रदीर्घ अनुभव यह कहता है कि इस स्थिति में अपनी सम्पूर्ण चेतना को भाषा के इस नशीले द्रव्य के नीचे अपने समूचे व्यक्तित्व को निर्णायक रूप में लगा देने पर हर लिखनेवाले को संत तुकाराम द्वारा वर्णित ‘रात-दिन हम युद्ध से घिरे’ का अनुभव अमूल्य लगने लगता है. यह स्वाभाविक ही है, क्योंकि इस नशीली भाषा के न्यूनाधिक संस्पर्श पर ही कुल मिलाकर साहित्य की भाषा का दारोमदार होता है. इसी कारण कविता सभी विधाओं का केंद्रबिंदु होती है.’

नेमाड़े की कविता में उफनती जिजीविषा के बारे में प्रकाश केजकर ने बहुत खूब कहा है: ‘इस संग्रह में एक वरदान मांगा गया है कि ज़िन्दगी का रमणीय सतरंगी बुलबुला व्यर्थ न हो, कि दरख़्तों से झांकता रोशन सूर्य अस्त न हो; विनाश तत्व के झपट्टे में भूमि की उग्रगंधी धूल गमकती रहे और जीने का समृद्ध कबाड़ पूरे घर में जमा होता रहे.’ हम याद कर सकते हैं कि हमारे समय का बहुत सारा साहित्य और कविता, कबाड़ का सामना करने और उसे खखूरने की कोशिश करते रहे हैं. इस कबाड़ में हमारे कई विद्रूप, विडम्बनाएं, आकांक्षाएं और स्मृतियां होती हैं और वह सब बरबादी भी जो दुनिया हम पर थोपती है. साहित्य यह याद दिलाता रहता है कि जिस कबाड़ को हम जमा कर रहे हैं या जिससे हम हमेशा घिरे हैं वह सिर्फ़ दुनिया ने नहीं हम पर थोप दिया है: हमने भी उसे बनाया है.

कबाड़ से कला रचने के कई उदाहरण ललित कला में हैं. कई बार लगता है कि इधर झूठ का जो कबाड़ हर दिन हमारे आगे या पिछवाड़े फेंका जा रहा है क्या उसे सहने-समझने के लिए हमें साहित्य के कबाड़ से मदद मिल सकती है? अध्यात्म के कबाड़ जैसा वह कम से कम हिंसक और हत्यारा तो नहीं है.