किसी सामाजिक कल्याणकारी योजना के साथ ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि कोई सरकार पहले तो इसे पिछली सरकार की नाकामी का सबूत बताए और फिर बाद में इसे राष्ट्रीय सम्मान का प्रतीक. ऐसा ही कुछ फरवरी, 2006 में तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए-1) सरकार द्वारा शुरू की गई मनरेगा (महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी) योजना के साथ हुआ.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने फरवरी, 2015 में संसद के बजट सत्र के दौरान लोकसभा में मनरेगा के लिए कांग्रेस की खिंचाई की थी. उन्होंने कहा था, ‘मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा कभी बंद मत करो क्योंकि मनरेगा आपकी (कांग्रेस) विफलताओं का जीता–जागता स्मारक है. और मैं गाजे- बाजे के साथ इस स्मारक का ढोल पीटता रहूंगा.’ प्रधानमंत्री का आगे कहना था कि इस योजना को ताकत देने के लिए जो भी करना होगा, किया जाएगा.

हालांकि, इसके एक साल के अंदर ही मोदी सरकार ने ढोल तो पीटा, लेकिन इसकी उपलब्धियों पर. मोदी सरकार ने 2016 में मनरेगा के 10 साल पूरे होने के मौके पर इसे राष्ट्रीय गर्व और सम्मान का विषय बताया.

लेकिन बीते तीन वर्षों के दौरान मनरेगा को लेकर किए गए कई फैसले और खुद सरकार के ही आंकड़े इस बात की काफी हद तक पुष्टि करते दिखते हैं कि इसके नाम पर वाहवाही लूटने वाली मोदी सरकार इसे कमजोर करने का भी काम कर रही है. उदाहरण के लिए केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक साल 2013-14 में मनरेगा के तहत पूरे 100 दिनों का रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 46,59,347 थी जो साल 2016-17 में घटकर 39,91,169 रह गई.

मनरेगा को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ना गैर-जरूरी

इसी महीने की शुरुआत में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा गठित एक समिति ने मनरेगा के तहत दी जानी वाली मजदूरी को न्यूनतम वेतन के साथ जोड़ने को गैर-जरूरी करार दिया है. इससे पहले जुलाई, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा था कि मनरेगा की मजदूरी को राज्यों के न्यूनतम वेतन के बराबर लाया जाए. हालांकि, समिति ने पाया है कि 17 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में मनरेगा की मजदूरी खेत-मजदूरों को दिए जाने वाली रकम से भी कम है. साथ ही, राष्ट्रीय स्तर पर महिला कामगारों को न्यूनतम मजदूरी का औसतन 78 फीसदी हिस्सा ही मिल पाता है. इस योजना के तहत कामगारों को मजदूरी खेतिहर मजदूर के लिए निर्धारित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (1983) के आधार पर दी जाती है. न्यूनतम वेतन कानून (1948) के तहत राज्य अपने खेतिहर मजदूरों के लिए मजदूरी तय करते हैं. दूसरी ओर, मनरेगा के लिए न्यूनतम मजदूरी तय करने की जिम्मेदारी केंद्र पर है.

न्यूनतम मजदूरी में बढ़ोतरी के नाम पर कामगारों के साथ मजाक

इससे पहले चालू वित्तीय वर्ष (2017-18) में कई राज्यों में मनरेगा की मजदूरी में बढ़ोतरी ने भी सरकार के दावों पर सवाल खड़े किए थे. जानकारी के मुताबिक एक अप्रैल, 2017 से बिहार, असम, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के मनरेगा कामगारों की मजदूरी में केवल एक रुपये की बढ़ोतरी की गई. इसके अलावा ओडिशा में यह मजदूरी दो और पश्चिम बंगाल में चार रुपये बढ़ाई गई. राष्ट्रीय स्तर पर बात करें तो बीते साल की तुलना में इस साल मजदूरी में औसतन 2.7 फीसदी की ही बढ़ोतरी की गई. इससे पहले 2016-17 में यह आंकड़ा 5.7 फीसदी था. यहीं नहीं, यह बढ़ोतरी योजना लागू होने के बाद अब तक की सबसे कम बढ़ोतरी है.

द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार का तर्क था कि महंगाई दर कम होने की वजह से ही मजदूरी में कम बढ़ोतरी की गई. इस बारे में अखबार के साथ बातचीत में मजदूर किसान शक्ति संगठन से जुड़े सामाजिक कार्यकर्ता निखिल डे ने सरकार के दोहरे रवैये पर सवाल उठाया था. उनका कहना था कि सरकार अपने कर्मचारियों के मामले में इस दलील को नहीं मानती. इसके अलावा निखिल डे का कहना था कि केंद्र ने 2014 में महेंद्र देव समिति की सिफारिश के आधार पर मनरेगा मजदूरी और न्यूनतम मजदूरी के अंतर को घटाने की सिफारिश पर भी कोई कदम नहीं उठाया. इसके अलावा मनरेगा के वास्तुकार माने जाने वाले अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज ने एक अखबार के साथ बातचीत में इसे मनरेगा के साथ खेतिहर मजदूरी का भी मामला बताया. उनका मानना था कि यह देश के विकास में कामगारों की हिस्सेदारी के दावे को नकारना है.

भुगतान में देरी से संबंधित मुआवजे में कमी

सरकार ने न केवल न्यूनतम मजदूरी में न के बराबर बढ़ोतरी की है बल्कि, मजदूरों को मिलने वाले भुगतान में देरी से संबंधित मुआवजे में भी कमी की है. साथ ही, इस न्यूनतम मुआवजे का कुछ हिस्सा ही पूरे देश में लाभार्थियों को मुहैया कराया जा रहा है. बिजनेस स्टैंडर्ड की एक रिपोर्ट के मुताबिक सरकार ने मुआवजे संबंधी नियमों को इस तरह से बनाया है जिससे मुआवजे की रकम कम हो गई है. इसके तहत मुआवजे की गणना मजदूरी के भुगतान के लिए अधिकारियों द्वारा जिला स्तर पर मांग किए जाने की तारीख तक किए जाने का प्रावधान किया गया है. हालांकि, पहले के प्रावधान के मुताबिक इस योजना के तहत हाजिरी रजिस्टर तैयार होने के 15 दिन के अंदर कामगारों को मजदूरी दी जानी चाहिए. ऐसा न होने पर मजदूरों को पूरी मजदूरी मिलने तक मुआवजा चुकाने का प्रावधान है. सामाजिक संस्था नरेगा संघर्ष मोर्चा के दावे के मुताबिक इस वित्तीय साल के लिए कुल 34.7 करोड़ रुपये की रकम मुआवजे के लिए आवंटित की गई थी लेकिन, इसमें से केवल 3.6 करोड़ रुपये ही जारी किए गए हैं.

क्रेडिट : इंडिया स्पेंड
क्रेडिट : इंडिया स्पेंड

बजट में बढ़ोतरी की बात केवल आधा सच

मोदी सरकार ने साल 2017-18 के बजट में मनरेगा के लिए 48,000 करोड़ रुपये आवंटित किए. बीते साल यह आंकड़ा 38,500 रुपये था. इस तरह सरकार ने जोर-शोर से इस बात का ऐलान किया कि उसने इस साल मनरेगा आवंटन में करीब 10,000 करोड़ रु की बढ़ोतरी की. सरकार का यह दावा काफी हद तक सही होने के बावजूद भी आधा सच ही है. बीते साल इस योजना के लिए जारी रकम का आंकड़ा 38,500 करोड़ रु से बढ़कर 47,499 करोड़ रुपये जा पहुंचा था. साथ ही मजदूरों सहित अन्य मदों में बकाया रकम का आंकड़ा 11,000 करोड़ रुपये जा पहुंचा. इन तथ्यों को देखने पर हम पाते हैं कि इस साल इस साल बजट में मनरेगा के लिए आवंटित रकम केवल 37,000 हजार करोड़ रु ही है, जो बीते साल से 10,499 करोड़ रु कम है.

इसके अलावा ताजा सरकारी आंकड़े बताते हैं कि चालू वित्तीय वर्ष के पहले छह महीनों में ही सरकार 48,000 करोड़ रु में से 42,000 करोड़ रु से अधिक जारी कर चुकी है. यानी बाकी के छह महीनों के लिए केंद्र के खाते में करीब 6,000 करोड़ रुपये पैसे बचे हुए हैं. दूसरी ओर, खरीफ का मौसम खत्म होने के बाद माना जा रहा है कि मनरेगा के तहत मजदूरों द्वारा काम की मांग बढ़ने वाली है.

इंडिया स्पेंड की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसकी वजह से हालत यह हो गई है कि 19 राज्यों में कामगारों की मजदूरी रोक दी गई है. इनमें हरियाणा में 31 अगस्त के बाद मजदूरों को भुगतान नहीं किया गया है. इसके अलावा असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, ओडिशा, झारखंड, कर्नाटक और केरल में सितंबर में ऐसी स्थिति पैदा हो गई थी. इसके बाद जिन राज्यों का नाम इस सूची में शामिल हुआ है, उनमें उत्तराखंड, बिहार, त्रिपुरा, गुजरात, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश हैं. बताया जाता है कि इनसे प्रभावित होने वाले मजदूरों की कुल तादाद 9.20 करोड़ है.

अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज और रितिका खेड़ा द्वारा किए गए एक अध्ययन के मुताबिक साल 2009-10 में कुल जीडीपी में मनरेगा बजट की हिस्सेदारी जहां 0.6 फीसदी थी, वहीं यह आंकड़ा 2016-17 में घटकर 0.3 फीसदी हो गया है.

क्रेडिट : इंडिया स्पेंड
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अंडमान और निकोबार इस बात की गवाही देता है कि मोदी सरकार के दौरान मनरेगा कितनी कमजोर हुई है

मनरेगा आर्थिक रूप से पिछड़े और वंचित लोगों के लिए किस तरह सहारा बनी इसका एक बड़ा उदाहरण देश की मुख्य भूमि से अलग बसा अंडमान और निकोबार है. इस केंद्र शासित प्रदेश के गांवों में बसने वाली कुल आबादी करीब ढाई लाख है. इसमें से अधिकांश अपनी आजीविका के लिए मनरेगा पर निर्भर है. नेट कनेक्टिविटी सहित कई चुनौतियों के बावजूद यहां 2013-14 में 21,000 मनरेगा मजदूरों को औसतन 48.31 दिनों का रोजगार हासिल हुआ था. राज्य की महिला कामगारों के लिए यह आंकड़ा 47.23 रहा.

मोदी सरकार द्वारा मनरेगा योजना को प्रोत्साहित करने के दावे के बाद भी अंडमान और निकोबार में मनरेगा के हालिया आंकड़े इस योजना के मोर्चे पर बिगड़ते हालात दिखाते हैं. केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय से हासिल इन आंकड़ों के मुताबिक यूपीए-2 शासन के आखिरी साल यानी 2013-14 में इस राज्य के लिए लेबर बजट का आंकड़ा 7.85 लाख रुपये रहा था जो 2016-17 में घटकर 4.07 लाख रु रह गया. इसके अलावा रोजगार बजट में भी करीब 50 फीसदी गिरावट देखने को मिली. 2013-14 में 8.03 लाख से गिरकर यह बीते साल 4.08 लाख रु दर्ज किया गया.

बीते तीन वर्षों में योजना के तहत अंडमान और निकोबार में 100 दिनों का रोजगार पाने वाले कामगार परिवारों की संख्या भी 2,471 से घटकर 486 रह गई. 2015-16 में तो यह केवल 204 ही थी. इस अवधि में कामगारों की संख्या 21,000 से गिरकर 14,000 रह गई. बीते वित्तीय वर्ष के दौरान तो 49 ग्राम पंचायतों में इस योजना के तहत एक रुपया भी खर्च नहीं किया गया जबकि, 2013-14 में यह संख्या केवल आठ ही थी. मंत्रालय द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक कामगारों को काम करने के बावजूद सरकार उनकी मजदूरी देने में नाकाम रही है. बीते साल सरकार पर मनरेगा मजदूरों का 877.63 लाख रुपये बकाया था. इससे तीन साल पहले यह आंकड़ा केवल 4.54 लाख रुपये था.

देश को मनरेगा जैसी योजना की जरूरत क्यों है?

संविधान में सरकारों की कल्याणकारी भूमिका पर जोर दिया गया है. संविधान निर्माताओं का मानना था कि विकास में वंचित और पिछड़े तबके की हिस्सेदारी होनी चाहिए. भारत जैसे विकासशील देश में सरकार की भूमिका उन क्षेत्रों में कहीं अधिक बढ़ जाती है, जहां कारोबारी फायदे न होने की वजह से अपने पैसे नहीं लगाते हैं. बीते 11 वर्षों में मनरेगा ने इस बात कई बार साबित किया है कि राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने जिस आखिरी व्यक्ति की बात कही थी उसके लिए मनरेगा संजीवनी साबित हुई है.

सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग की रिपोर्ट की ही बात करें तो इसमें कहा गया है कि मनरेगा जैसी कल्याणकारी योजनाओं ने समाज के कमजोर तबके को काफी मदद पहुंचाई है. आयोग का यह भी मानना है कि इनमें से भी महिलाओं और वंचित तबके को अधिक फायदा पहुंचा है. योजना के तहत कार्य दिवसों में इनकी हिस्सेदारी क्रमश: 56 फीसदी और 39 फीसदी रही है. आयोग ने यह रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र के सामने भी रखी थी.

इसके अलावा अगस्त, 2015 में जारी नेशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च की शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई है कि मनरेगा कामगारों की स्थिति बेहतर करने में सफल रही है. यूनिवर्सिटी ऑफ मेरीलैंड के साथ संस्था ने साल 2004-05 और 2011-12 में देश के 28,000 घरों में एक अध्ययन किया था. इससे साबित हुआ है कि यह योजना गरीबी घटाने और महिला सशक्तिकरण में सफल रही है.

बीते साल नवंबर में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी का ऐलान किया तो लोगों के सामने एक बड़ी चुनौती अपने रोजगार को बचाने के रूप में आई थी. देश के कई बड़े शहरों में उद्योग-धंधे बंद होने की वजह से कामगारों को वापस अपने-अपने घर लौटना पड़ा. आधिकारिक आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि ऐसी विकट स्थिति में मनरेगा ही उनके लिए सहारा बनी.

बीते अगस्त में केंद्रीय वित्त मंत्रालय द्वारा जारी आर्थिक सर्वेक्षण-2 के मुताबिक नवंबर, 2016 से लेकर मार्च, 2017 तक मनरेगा के तहत काम मांगने वालों की संख्या में बढ़ोतरी दिखने को मिली. देश के पिछड़े राज्यों जैसे बिहार, छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में तो यह 30 फीसदी तक दर्ज की गई. इससे पहले भी 2015 में पड़े सूखे के दौरान कई राज्यों में इस तरह की स्थिति देखने को मिली थी.

क्रेडिट : आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) -II
क्रेडिट : आर्थिक सर्वेक्षण (2016-17) -II

साथ ही, कई शोध रिपोर्टों में इस बात की पुष्टि हुई है कि मनरेगा की वजह से न केवल गांवों से शहरों की ओर पलायन कम हुआ है बल्कि, लोगों के जीवन स्तर में भी सुधार दिखने को मिला है. इसने महिलाओं और अनुसूचित जाति/जनजाति का सशक्तिकरण और आधारभूत ढांचे के विकास में अहम भूमिका भी निभाई है. इसके चलते स्त्रियों और पुरुषों की मजदूरी के अंतर में कमी भी आई है. हालांकि, दूसरी योजनाओं की तरह यह भी भ्रष्टाचार से अछूती नहीं रही है, लेकिन जानकार मानते हैं कि इस अहम योजना की खामियों को दूर करने की जरूरत है, उसे कमजोर करने की नहीं.