उत्तराखंड में गोपेश्वर से केदारनाथ की तरफ बढ़ने पर बंजवाडा नाम का एक गांव पड़ता है. 45 वर्षीय रवींद्र सिंह इसी गांव के रहने वाले हैं. वे बीते कई सालों से जड़ी-बूटियों का कारोबार कर रहे हैं. वे मुख्यतः बड़ी इलाइची की पौध तैयार करते हैं और साल भर में 50 से 60 हजार पौधे बेचकर लगभग तीन-चार लाख रुपये कमा लेते हैं. लेकिन बीते कुछ दिनों से रवींद्र अपने भविष्य को लेकर काफी चिंतित हैं. स्थानीय अखबारों के माध्यम से उन्हें मालूम चला है कि उत्तराखंड सरकार जल्द ही प्रदेश में जड़ी-बूटियों का क्रय मूल्य तय करने की जिम्मेदारी बाबा रामदेव के ट्रस्ट ‘पतंजलि’ को सौंपने वाली है.

रवींद्र बताते हैं, ‘मेरी जानकारी में इस क्षेत्र का कोई भी ऐसा काश्तकार नहीं है जो पतंजलि को जड़ी-बूटी बेचता हो या बेचना चाहता हो. क्योंकि पतंजलि फोकट के भाव जड़ी-बूटियां हासिल कर लेना चाहता है. वह जो कीमत बताता है, उससे तो खेती की लागत भी वसूल नहीं होती. अब अगर सरकार उसे ही रेट तय करने का अधिकार दे देगी तो ये तो पतंजलि को लूटने का अधिकार देने जैसा होगा.’ रवींद्र अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो इस खबर से चिंतित हैं. राज्य के अधिकतर किसान पतंजलि को क्रय मूल्य तय करने का अधिकार दिए जाने की खबर से परेशान हैं.

लेकिन उत्तराखंड के वन मंत्री हरक सिंह रावत किसानों की इस चिंता को फ़िज़ूल बताते हैं. सत्याग्रह से बात करते हुए वे कहते हैं, ‘ऐसा कोई फैसला उत्तराखंड सरकार ने नहीं किया है. क्रय मूल्य तय करना सरकार का काम है और आगे भी सरकार ही इसे करती रहेगी. पतंजलि के साथ बैठक में सिर्फ ये तय हुआ है कि वो सरकार को अपने रेट बताएंगे. अगर सरकार को उनके रेट किसानों और राज्य के हित में लगेंगे तो ही उन्हें स्वीकार किया जाएगा. ऐसा इसलिए किया जा रहा है कि अगर कभी किसानों को जड़ी-बूटियों के अच्छे दाम न मिलें और उनकी जड़ी-बूटियां न बिकें तो कम-से-कम एक तय दाम पर पतंजलि उन्हें खरीद ले.’

कैबिनेट मंत्री हरक सिंह रावत की बातों से ऐसा लगता है कि किसानों को चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है और जड़ी-बूटियों के कारोबार में सरकार के इस फैसले से कोई बड़ा परिवर्तन नहीं होने वाला. लेकिन इस विषय के जानकारों की मानें तो सरकार का यह फैसला बाबा रामदेव को प्रदेश के संसाधनों की खुली लूट का न्यौता देने के समान ही है. अधिकतर जानकार इस फैसले को एक साजिश के रूप में क्यों देख रहे हैं, ये समझने से पहले जानते हैं कि उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों की पैदावार और उनके दोहन की क्या प्रक्रिया है.

उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों की पैदावार और उनके दोहन की प्रक्रिया

उत्तराखंड में वन विभाग और भेषज विकास इकाइयों के अलावा जड़ी-बूटियों के क्षेत्र में काम करने वाला सबसे बड़ा संस्थान ‘हर्बल रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंस्टिट्यूट’ है. इसे ‘जड़ी-बूटी शोध संस्थान’ भी कहा जाता है. इसकी स्थापना साल 1989 में तत्कालीन उत्तर प्रदेश सरकार ने की थी. चमोली जिले के गोपेश्वर में स्थित यह संस्थान ‘उत्तराखंड मेडिकल प्लांट बोर्ड’ की नोडल संस्था भी है. इसके पूर्व उपाध्यक्ष सुदर्शन कठैत बताते हैं, ‘उत्तराखंड में मुख्यतः दो तरह की जड़ी-बूटियां होती हैं. एक उगाई जाने वाली और दूसरी पाई जाने वाली. उगाई जाने वाली जड़ी-बूटियां यहां न के बराबर ही हैं. प्रदेश में होने वाली कुल जड़ी-बूटियों का लगभग 95 प्रतिशत वो है, जो प्राकृतिक रूप से यहां के जंगलों में पैदा होता है.’

इन दोनों ही तरह की जड़ी-बूटियों के दोहन की जिम्मेदारी मुख्यतः वन विभाग, भेषज विकाई इकाई और जड़ी-बूटी शोध संस्थान की होती है. पहले बात करते हैं उगाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के बारे में. इनमें कुट, कुटकी, अतीस, जटामांसी, चिरायता, काला जीरा, तगर, सर्पगंधा, रोज़मैरी, बड़ी इलाइची आदि मुख्य हैं. इन्हें उगाने वाले किसानों का पंजीकरण होता है जो मुख्यतः जड़ी बूटी शोध संस्थान ही करता है. अल्मोड़ा के तडैनी गांव के रहने वाले इंद्र सिंह पिछले लगभग बीस सालों से जड़ी-बूटी उगाने का काम कर रहे हैं. वे बताते हैं, ‘अधिकतर सभी जड़ी-बूटियां सर्दियों में ही तैयार होती हैं. तब हमें भेषज इकाई से इन जड़ी-बूटियों को बेचने के लिए एक रवाना लेना होता है. इसके बाद हम इन्हें रामनगर की मंडी में ले जाते हैं और आढ़तियों को बेच देते हैं.’

उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों की बिक्री के लिए मुख्यतः तीन बड़ी मंडियां हैं. रामनगर, टनकपुर और ऋषिकेश. प्रदेश में पैदा होने वाली लगभग सभी जड़ी-बूटियां इन तीन मंडियों से होकर ही बाहर जाती हैं. किसानों द्वारा उगाई जाने वाली जड़ी-बूटियों के अलावा प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली जड़ी-बूटियां भी यहीं से बिकती हैं. ऐसी जड़ी-बूटियों के दोहन की प्रक्रिया के बारे में रामनगर निवासी मुनीश कुमार बताते हैं, ‘जिस इलाके में ये जड़ी-बूटियां पाई जाती हैं, उसके नजदीकी गांवों में हर साल एक बैठक होती है. ये बैठक अमूमन मई में होती है जिसमें स्थानीय प्रतिनिधि, वन विभाग के लोग और भेषज विकास इकाई के अधिकारी शामिल होते हैं. इसी बैठक में जंगलों से जड़ी-बूटियां निकालने का ठेका कुछ एजेंट्स को दिया जाता है जो स्थानीय लोगों से दिहाड़ी पर ये काम करवाते हैं. फिर यही एजेंट्स वन विभाग या भेषज इकाइयों से जरूरी अनुमतियां लेने के बाद जड़ी-बूटियों को मंडी तक पहुंचाते हैं.’ जिस वार्षिक बैठक की बात मुनीश कर रहे हैं इस साल वह बैठक अब तक नहीं हुई है. यहीं से उस साजिश की सुगबुगाहट की भी भनक लगती है जिसके चलते उत्तराखंड सरकार पर बाबा रामदेव को लूट का अधिकार देने के आरोप लग रहे हैं.

सरकार के इस फैसले को साजिश के तौर पर क्यों देखा जा रहा है?

बाबा रामदेव की भारतीय जनता पार्टी से नजदीकियां किसी से छिपी नहीं हैं. हालांकि सिर्फ इस तथ्य के आधार पर प्रदेश की मौजूदा भाजपा सरकार या बाबा रामदेव को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता. लेकिन जब इन नजदीकियों के चलते सत्ताधारी पार्टी बाबा रामदेव के व्यक्तिगत हितों के लिए काम करने लगे, तब उन पर सवाल उठने स्वाभाविक हैं. जड़ी-बूटी शोध संस्थान के पूर्व उपाध्यक्ष सुदर्शन कठैत बताते हैं, ‘भाजपा हमेशा बाबा रामदेव को निजी फायदा पहुंचाने के लिए काम करती रही है. मैं अपने व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ऐसा कह सकता हूं. ये पिछली भाजपा सरकार की बात है. उस वक्त हमारी उगाई कुटकी बाज़ार में 700 रुपये किलो बिका करती थी. वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत उस वक्त कृषि मंत्री हुआ करते थे. वे उस दौर में हमारे पास आए और उन्होंने मांग की कि हम लोग 300 रु किलो के हिसाब से बाबा रामदेव को कुटकी बेचें. हमने इसका विरोध किया और बाबा रामदेव को बेचने से इनकार कर दिया. लेकिन अब तो रावत जी मुख्यमंत्री बन गए हैं. किसानों की न सही, जंगली जड़ी-बूटियां तो वे रामदेव को मनचाहे रेट पे बेचने की व्यवस्था आराम से कर ही सकते हैं.’

जिन जंगली जड़ी-बूटियों का जिक्र सुदर्शन कठैत कर रहे हैं, उन्हीं की खरीद-फरोख्त के चलते भाजपा के हालिया फैसले को संदेहास्पद माना जा रहा है. जैसाकि पहले भी जिक्र किया गया है उत्तराखंड में मिलने वाली लगभग 95 प्रतिशत जड़ी-बूटियां प्राकृतिक रूप से जंगलों में ही पैदा होती हैं. इनके लिए कोई न्यूनतम समर्थन मूल्य तय नहीं होता क्योंकि इन्हें कोई अपनी लागत से नहीं उगाता. ऐसी जड़ी-बूटियों का मूल्य वन विभाग की नीलामी से ही तय होता है. समाजवादी लोक मंच के कार्यकर्ता मुनीश कुमार बताते हैं, ‘जंगली जड़ी-बूटियों को अगर पूर्व निर्धारित मूल्यों पर रामदेव को बेचा जाता है तो इससे पूरे प्रदेश की जड़ी-बूटियों पर उनका एकछत्र राज़ हो जाएगा. मौजूदा समय में जब उत्तराखंड की मंडियों में जड़ी-बूटियां बाज़ार भाव पर बिक रही हैं तो रामदेव इन मंडियों से कोई जड़ी-बूटी नहीं खरीद रहे हैं. लेकिन अगर रेट तय करने का जरा भी अधिकार उन्हें मिल गया तो फिर सारी ही जड़ी-बूटियां कौड़ियों के भाव उन्हें मिलने लगेंगी.’

वित्तीय वर्ष 2016-17 में रामनगर की मंडी से कुल दस करोड़ तीन हजार रुपये का कारोबार हुआ था. इस आंकड़े को यदि औसत माना जाए तो प्रदेश की तीन बड़ी मंडियों से करीब 30 करोड़ रुपये का सालाना कारोबार होता है. यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है ये कि ये आंकड़ा सिर्फ एक नंबर में होने वाले कारोबार का है. यानी जिन जड़ी-बूटियों की बिक्री पर व्यापारी पक्का बिल देते हैं और टैक्स चुकाते हैं, यह सिर्फ उसका आंकड़ा है. यह एक खुला राज है कि मंडियों में जितना कारोबार एक नंबर में होता है, उससे कई गुना ज्यादा दो नंबर में होता है. इसके अलावा जड़ी-बूटियों की तस्करी भी होती है जिसका आंकड़ा मिलना संभव नहीं है. इस लिहाज से देखें तो प्रदेश में जड़ी-बूटियों का सालाना कारोबार सैकड़ों करोड़ रुपये का होना चाहिए. इसी कारोबार को पूरी तरह से बाबा रामदेव के हवाले किये जाने की साजिश उत्तराखंड सरकार कर रही है, ऐसा कई जानकार मान रहे हैं.

पद्मश्री से सम्मानित गढ़वाल विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और जड़ी-बूटियों के विशेषज्ञ वैज्ञानिक आदित्य नारायण पुरोहित कहते हैं, ‘जड़ी-बूटियों के दाम तय किये जाने में पतंजलि के किसी भी हस्तक्षेप को मैं बिलकुल गलत मानता हूं. एक व्यापारी को ये अधिकार कैसे दिए जा सकते हैं. और अगर क्रय मूल्य तय करने में व्यापारियों को शामिल ही किया जाना है तो फिर सिर्फ बाबा रामदेव की पतंजलि को ही इसमें शामिल क्यों किया जाए. हिमालया या डाबर को क्यों नहीं? अगर पतंजलि को इस तरह के कोई भी अधिकार दिए जाते हैं तो साफ़ है कि सरकार उसके व्यक्तिगत हितों के लिए काम कर रही है.’

यह पहला मौका नहीं है जब उत्तराखंड सरकार पर बाबा रामदेव को इस तरह से लाभ पहुंचाने के आरोप लग रहे हैं. तहलका पत्रिका की एक रिपोर्ट के अनुसार जब बाबा रामदेव को उत्तराखंड में फ़ूड पार्क बनाने के लिए ज़मीनें दी गई थी तो यह शर्त भी राखी गई थी कि रामदेव हर साल उत्तराखंड से करोड़ों रुपये की जड़ी-बूटियां खरीदेंगे. लेकिन जमीनें मिलने के बाद बाबा रामदेव ने कभी इस शर्त को पूरा नहीं किया. वन विभाग के पूर्व डीएफओ भरत सिंह बताते हैं, ‘मैंने कभी बाबा रामदेव को उत्तराखंड से जड़ी-बूटियां खरीदते नहीं देखा. पतंजलि ने जड़ी-बूटियों की नर्सरी के नाम पर धोखा ही किया है. उनकी नर्सरियों को मैंने खुद जाकर देखा है. उससे कई गुना बेहतर नर्सरी हमारे लोग बिना किसी मदद के चला रहे हैं.’

भारत सिंह सरकार के हालिया फैसले के बारे में कहते हैं, ‘उत्तराखंड की लगभग सारी जड़ी-बूटियां वन विभाग की जमीनों पर होती हैं. इनसे राज्य को अच्छा-खासा राजस्व मिलता है. इसे अगर औने-पौने दामों पर पतंजलि को दे दिया जाएगा तो ये राज्य के राजस्व की सीधी लूट और यहां के लोगों का सीधा शोषण होगा. उत्तराखंड को हर्बल प्रदेश बनाने का दावा करने वाली सरकार जड़ी-बूटियों के विकास के लिए काम करने के बजाय पूरा प्रदेश ही बाबा रामदेव को बेच देना चाहती है.’

उत्तराखंड को हर्बल प्रदेश बनाने का दावा भाजपा कई बार कर चुकी है. लेकिन प्रदेश में जड़ी-बूटी उत्पादन की जमीनी हकीकत देखें तो यह बहुत दूर की कौड़ी नज़र आता है. प्राकृतिक रूप से जंगलों में होने वाली जड़ी-बूटियों को अगर छोड़ दें तो उत्तराखंड में जड़ी-बूटियों की खेती बेहद दयनीय स्थिति में है. जबकि प्रदेश की भौगोलिक परिस्थितियां इस तरह की खेती के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती हैं. जड़ी-बूटी शोध संस्थान इस दिशा में काम कर भी रहा है लेकिन सरकारी उदासीनता और संसाधनों की कमी के चलते जमीन पर इसका कोई ख़ास असर नज़र नहीं आता.

राज्य के हर जिले में जड़ी-बूटी शोध संस्थान के कुछ मास्टर ट्रेनर्स हैं. इनका काम है गांव के किसानों को जड़ी-बूटियों के बारे में बताना, उन्हें बीज उपलब्ध करवाना, जमीन का परिक्षण करना, खेती में मदद करना, उनका पंजीकरण करना और फिर दोहन में मदद करना. अल्मोड़ा जिले में रहने वाले ऐसे ही एक मास्टर ट्रेनर संतोष सिंह बताते हैं, ‘कई सालों तक संविदा पर रहने के बाद कुछ समय पहले ही हम लोग स्थायी हुए हैं. लेकिन अब भी यहां स्टाफ की भारी कमी है. मेरे पास ही दो-दो ब्लाक हैं. एक ही ब्लाक में 100-150 गांव हैं. मैं कैसे इतने गांवों में अकेले ये सारे काम कर सकता हूं.’ संतोष आगे कहते हैं, ‘हमारे पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं हैं. न जमीन का परीक्षण करने के लिए कोई किट है और न ही किसानों में बांटने के लिए कोई साहित्य. किसानों को जड़ी-बूटी की खेती करने की कोई ट्रेनिंग नहीं दी जाती. कई बार तो बीज और पौधे तक समय पर नहीं मिलते. मुझे ये बोलते हुए कोई हिचकिचाहट नहीं होती ऐसी स्थिति में प्रदेश को हर्बल प्रदेश बनाने का दावा खुले झूठ से ज्यादा कुछ नहीं है.’

(पतंजलि पर लग रहे आरोपों के स्पष्टीकरण के लिए सत्याग्रह ने अलग-अलग माध्यमों से उससे संपर्क करना चाहा लेकिन खबर लिखे जाने तक उनका कोई जवाब नहीं आया है.)