गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बागी नेता शंकरसिंह वाघेला ने मंगलवार को जन विकल्प नाम से एक नया मोर्चा बनाने की घोषणा की है. इस मौके पर शंकरसिंह वाघेला का कहना था कि गुजरात के लोग भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही प्रमुख दलों से ऊब चुके हैं और उन्हें प्रदेश में एक नए मोर्चे की आवश्यकता है. हालांकि इस दौरान वाघेला ने यह भी साफ कर दिया कि इस मोर्चे के जरिए वे न तो खुद चुनाव लड़ेंगे और न ही सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह या फिर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की आलोचना करेंगे.

भाजपा को फायदा और कांग्रेस को नुकसान?

शंकरसिंह वाघेला की इस कवायद को प्रदेश की राजनीति पर नज़र रखने वाले लोग एक ‘ओपन सीक्रेट’ की तरह देख रहे हैं. माना जा रहा है कि वाघेला और उनके समर्थक साल के आखिर में होने वाले गुजरात विधानसभा चुनावों में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, दोनों ही तरह से भाजपा को फायदा और कांग्रेस को नुकसान पहुंचाने वाले वाले हैं.

प्रदेश के कई राजनीतिकार दबी आवाज में मानते हैं कि शंकरसिंह वाघेला को भाजपा की तरफ से आर्थिक मदद भी पहुंचाई जा रही है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता के हवाले से प्रदेश के एक प्रमुख अखबार का तो यहां तक कहना है कि विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का खेल बिगाड़ने के लिए शंकरसिंह वाघेला 1000 करोड़ रुपए का गेम प्लान लेकर चल रहे हैं.

कांग्रेस के प्रदेश प्रवक्ता मनीष दोशी सत्याग्रह से हुई बातचीत में बताते हैं, ‘राज्यसभा चुनाव में वाघेला के समधी बलवंत सिंह को भाजपा द्वारा अपना प्रत्याशी बनाना और वाघेला के पुत्र सहित उनके दस समर्थक विधायकों का भाजपा के साथ जुड़ना यह साफ कर देता है कि यह मोर्चा किसकी शह पर बनाया गया है.’ शंकरसिंह वाघेला के भाजपा को समर्थन देने की बात पर गुजरात के एक वरिष्ठ पत्रकार चुटकी लेते हुए कहते हैं, ‘लोग ईवीएम पर बटन तो जन विकल्प मोर्चे के समर्थन में दबाएंगे, लेकिन वोट भाजपा के खाते में जाएगा.’

और भी ज्यादा किरकिरी?

गुजरात में खुद को मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार घोषित किए जाने की जिद पर अड़े शंकरसिंह वाघेला ने मांग पूरी न होने पर हाल ही में हुए राज्यसभा चुनावों में कांग्रेस से बगावत करते हुए भाजपा को अपना समर्थन दिया था. हालांकि उनका यह बर्ताव सूबे के लिए नया नहीं था. करीब 20 साल पहले वे इसी तरह अपने समर्थकों के साथ भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए थे. लेकिन जहां पिछली बार की बगावत के चलते वाघेला का कद प्रदेश की राजनीति में काफी मजबूत हुआ था वहीं इस बार ऐन मौके पर पार्टी बदलने से उनकी छवि किसी दल-बदलू और अविश्वसनीय नेता जैसी बनती दिख रही है.

खबरों की मानें तो तो भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने शंकर सिंह वाघेला के भरोसे रहकर एक आम से राज्यसभा चुनाव को जमकर हवा दी थी और बाद में वाघेला गुट के ही विधायकों की चूक की वजह से उन्हें मुंह की खानी पड़ी. हालांकि नतीजे आने तक शंकरसिंह वाघेला कांग्रेस के खिलाफ जमकर बयानबाजी करने अलावा अहमद पटेल को वोट देकर अपना मत खराब करने और पटेल की जीत असंभव होने के दावे करते रहे. लेकिन चुनावी परिणाम आने के बाद उन्होंने राजनैतिक हलकों में अमित शाह के साथ अपनी भी जमकर किरकरी करवाई.

सूत्रों का कहना है कि शंकरसिंह वाघेला या उनके करीबियों का राजनैतिक भविष्य अब सिर्फ इसी बात पर टिका है कि वे अगले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना नुकसान और भाजपा के मिशन-150 को कितना फायदा पहुंचा पाते हैं. जन विकल्प मोर्चा को वाघेला की इसी कवायद का हिस्सा माना जा रहा है जिसके जरिए वे खुद को बतौर किंगमेकर साबित कर अपनी खोई प्रतिष्ठा फिर से पाना चाहेंगे.

लेकिन प्रदेश के वरिष्ठ राजनीतिकारों के मुताबिक शंकर सिंह वाघेला की यह नई कवायद उनकी छवि को फायदा पहुंचाने के बजाय राजनीति में उनकी लुटिया पूरी तरह से डुबो सकती है. गुजरात में तीसरे मोर्चे की संभावना न के बराबर मानी जाती हैं. इस तर्क के पक्ष में जानकार शंकरसिंह वाघेला की ही राष्ट्रीय जनता पार्टी (राजपा) और पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल की गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) का उदहारण देते हैं. 1996 में भाजपा से नाराज होकर वाघेला ने राजपा के नाम से एक नई पार्टी तैयार की थी. लेकिन 1998 के विधानसभा चुनावों में उसके सिर्फ चार उम्मीदवार जीत सके. इस चुनाव में वाघेला के नजदीकी और प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिलीप पारीख तक राजपा के बैनर तले अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे थे. बाद में इस पार्टी को कांग्रेस में मिला दिया गया था.

वाघेला की ही तरह सूबे के एक और दिग्गज नेता केशुभाई पटेल ने भी प्रदेश भाजपा से नाराज होते हुए 2012 विधानसभा चुनावों से करीब तीन महीने पहले जीपीपी की स्थापना की थी. लेकिन यह पार्टी 182 में से सिर्फ दो सीट ही जीत पाई. इसके करीब सवा साल के भीतर केशुभाई के बेटे भरत पटेल के भाजपा में शामिल होने के बाद जीपीपी का विलय भाजपा में कर दिया गया.

गुजरात के राजनैतिक इतिहास पर चर्चा करते हुए प्रदेश के एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि मौजूदा हालात में या तो लोग भाजपा के साथ हैं या फिर खिलाफ और दोनों ही सूरत में अस्पष्ट एजेंडे या किसी ढुलमुल मोर्चे के लिए प्रदेश की राजनीति में कोई जगह नज़र नहीं आती. उनके शब्दों में ‘जनता सब जानती है और खुद को मूर्ख समझने वाले को कभी माफ नहीं करती. इसलिए किसी मोर्चे की आड़ में छिपने की बजाय वाघेला को भाजपा को सीधे तौर पर समर्थन करना चाहिए था. लोग एकबारगी बदमाश को समर्थन दे सकते हैं लेकिन कुटिल से बचते हैं. ऐसे में डर है कि कहीं खोई इज्जत पाने के चक्कर में वाघेला जैसे वरिष्ठ नेता अपनी और किरकरी न करवा बैठें.’