लाहौर से लगभग 45 किलोमीटर दूर एक जगह है –कसूर. यहां 21 सितंबर, 1926 को बेहद ग़रीब परिवार में जन्मीं अल्लाह वसाई अपनी दो बहनों, ईदन बाई और हैदरी बांदी में सबसे छोटी थीं.

रुकिए, बात को इस शहर से आगे ले जाने में थोड़ा वक़्त लगेगा. पहले कसूर शहर के बारे में चंद बातें कर लें. कहते हैं कि भगवान राम के बेटे कुश ने कसूर की और लव ने लाहौर की स्थापना की थी. मशहूर सूफ़ी दार्शनिक, बुल्ले शाह की मज़ार इसी शहर में है. शहर की आबो-हवा कुछ ऐसी है, या बुल्ले शाह की रूमानियत अब भी इसकी फिज़ाओं में घुली हुई है कि यहां से एक से एक बड़े फ़नकार निकले और हिंदुस्तान में मशहूर हुए. यहां ब्रिटिश हिंदुस्तान की बात हो रही है. हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबसे मख्सूस नाम और मौसिक़ी के पटियाले घराने से ताल्लुक रखने वाले उस्ताद बड़े गुलाम अली खान साहब और उनके भाई उस्ताद बरकत अली खान साहब यहीं से हैं. और तो और, पाकिस्तान के मशहूर जर्नलिस्ट इरशाद अहमद हक्कानी जिन्होंने फौजी आमिर जिया-उल-हक़ और परवेज़ मुशर्रफ़ को खरी-खरी सुनाई, वे भी यहां से हैं. नवाज़ शरीफ की नाक में दम करने वाले जर्नलिस्ट नज़म सेठी भी कसूर में पैदा हुए तो ‘चाचा चौधरी’, ‘बिल्लू’ और ‘साबू’ को रचने वाले मशहूर कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा भी यहीं से आते हैं.

खैर, बात अल्लाह वसाई की हो रही थी. वापस चलते हैं. इस बच्ची का परिवार गा-सुनाकर अपनी रोज़ी रोटी कमाता था. दीवान सरदारी लाल, जिन्होंने कलकत्ता के एक थिएटर में पैसा लगाया था, इन तीनों बहनों को कलकत्ता ले आये जहां उन्होंने कला की दुनिया में कदम रखा. अल्लाह वसाई यहां आकर नूरजहां बन गईं. वे नूरजहां जो ब्रिटिश हिंदुस्तान की आला तरीन फ़नकारों में से एक थीं. और जिनके चाहने वाले उन्हें लता मंगेशकर से एक कदम आगे पाते हैं. बंटवारे के बाद वे पाकिस्तान चली गई थीं, लेकिन सरहदें उनकी लोकप्रियता को बांध नहीं सकीं .

यह बात उस दौर की है जब संगीत अमीर था और फ़नकार ग़रीब. तब फ़नकारी दिल से होती थी. सन 1935 में, नौ साल की नूरजहां ने ‘मदान थियेटर्स’ की फिल्म ‘गैबी गोला’ से पहला काम शुरू किया. बाद में ‘मिस्र का सितारा’(1935), ‘फ़ख्रे इस्लाम’, ‘तारणहार’ (1937), ‘सजनी’(1940) और ‘रेड सिग्नल’ (1941) जैसी फिल्मों में भी अदाकारी निभाई. 1936 में आई फिल्म ‘शीला’ (उर्फ़ पिंड दी कुड़ी) में उन्होंने पहली बार एक्टिंग के साथ गाना भी गाया.

बेहद खूबसूरत चेहरे-मोहरे और दिलकश आवाज़ वाली नूरजहां ने ‘रणजीत मूवीटोन’ की कई फ़िल्मों –‘ससुराल’, ‘उम्मीद’ (1941), ‘चांदनी’, ‘धीरज’, ‘फ़रियाद’ (1942) और ‘दुहाई’ (1943) में गाने के साथ एक्टिंग भी की. 1942 में ही आई फिल्म ‘खानदान’ जिसके संगीतकार ग़ुलाम हैदर ने नूरजहां का डंका बजवा दिया. ये वही ग़ुलाम हैदर हैं जिनकी वजह से लता मंगेशकर आज ‘लता मंगेशकर’ हैं. यह बात अलग है कि राजू भारतन की किताब ‘नौशादनामा’ में नौशाद इस बात पर ताज्जुब करते हैं कि क्यों लता उन लोगों को लोगों को श्रेय देती हैं जिनका उनसे बहुत कम वास्ता रहा. खैर.

किस्मत का सितारा चमका

‘खानदान’ के तकरीबन सारे गाने –‘तू कौन सी बदली में मेरे चांद है’, ‘मेरे लिए जहान में चैन है न करार है’, ‘शोख सितारों से हिल मिल कर खेलेंगे हम आंख मिचोली’, ‘उड़ जा पंछी उड़ जा’ बेहद मकबूल हुए. और यहीं से फिल्म के निर्देशक शौक़त हुसैन रिज़वी उनके नज़दीक आ गए. बाद में शौक़त ही की दूसरी फिल्म ‘नौकर’ में भी उन्होंने अभिनय किया. फिल्म तो नहीं चली पर शादी करके दोनों एक दुसरे के हमनवा बन गए.

1943 में भी नूरजहां की धूम रही. के दत्ता के संगीत निर्देशन में बनी ‘नादान’ के गाने जैसे ‘रौशनी अपनी उमंगों की मिटाकर चल दिए’, ‘या अब तो नहीं दुनिया में कहीं ठिकाना’ खूब चले. इसके बाद उनके फ़िल्मी सफ़र को आगे बढ़ाने में सज्जाद हुसैन का योगदान रहा. उनके संगीत निर्दशन में बनी फ़िल्म ‘दोस्ती’ के गाने जैसे, ‘बदनाम मुहब्बत कौन करे’, ‘कोई प्रेम का दे संदेसा’, ‘अब कौन है मेरा’, काफ़ी हिट हुए.

इसी साल गायक-अभिनेता सुरेंद्र के साथ उनकी फिल्म आई ‘लाल हवेली’. इसके भी गाने दुनिया के सर चढ़कर बोले. बकौल सुरेंद्र ‘उनकी गायकी का ऐसा असर होता था कि मैं गाने की पंक्तियां भूल जाता था और बस उनकी (नूरजहां) आवाज़ में खो जाता था.’ इस फिल्म के गाने ‘मोहनियां सुंदर मुखड़ा खोल’, ‘बनती नज़र आती नहीं तदबीर’ और ‘तेरी याद आये सांवरिया’ खूब लोकप्रिय हुए.

1945 भी नूरजहां के लिए काफ़ी ज़बरदस्त साल था. इस साल उनकी चार फिल्में रिलीज़ हुईं और चारों ही हिट साबित हुईं. ‘ज़ीनत’ ने काफ़ी धूम मचाई थी. इस फिल्म के गीत भी ख़ासे पसंद किये गये. ‘नाचो सितारो नाचो’, ‘आंधियां यूं ग़म की चलीं’, ‘बुलबुलों मत रो यहां’ ने सिनेमा हालों को सीटियों से गूंजवा दिया था. इस फिल्म में एक क़व्वाली भी थी -‘आहें न भारी शिकवे न किये’. इसमें गायिका कल्याणी और जोहराबाई अंबाले वाली भी नूरजहां के साथ थीं. इसने भी धूम मचा दी थी.

श्याम सुन्दर वे तीसरे संगीतकार थे जो नूरजहां को बुलंदी की ओर ले गए. उनकी संगीत निर्देशित फ़िल्म ‘गांव की गोरी’ में नूरजहां ने यादगार गाने गाये. ‘किस तरह से भूलेगा दिल उनका ख्याल आया हुआ’, ‘सजन बलम परदेसी’ ख़ूब पसंद किये गए. उनकी आवाज़ की रसीली मुरकियां अपने उतार-चढ़ावों के ज़रिये सुननेवालों पर ग़ज़ब का असर छोड़ती हैं. इस फिल्म का गाना ‘बैठी हूं तेरी याद का ले करके सहारा’ आप ख़ुद यकीन कर लीजिये.

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और फिर आया 1946 का वह यादगार साल जब उनको महान नौशाद साहब का साथ मिल गया. वह फिल्म थी ‘अनमोल घड़ी’. इस फिल्म के गानों ने सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले. सुरेंद्र और सुरैया के साथ नूरजहां की यह फ़िल्म भी हिट थी. इसके गाने ‘आजा मेरी बर्बाद मुहब्बत के सहारे’, जवां है मुहब्बत, हसीं है ज़माना’ और सुरेंद्र के साथ गया गीत- ‘आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है’-आज भी कई घरों के सुनसान कमरों में बजता है.

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मलिका-ए-तरन्नुम का पाकिस्तान का सफ़रनामा और मैडम का ख़िताब

1947 में देश का बंटवारा हुआ और नूरजहां अपने शौहर शौक़त हुसैन रिज़वी साहब के साथ पाकिस्तान चल गईं. लाहौर में उन्होंने ‘शाहनूर’ (शौक़त और नूरजहां) स्टूडियो की नींव रखी जिसमें उन्होंने पंजाबी फिल्म ‘चनवे’ का निर्देशन किया. इस तरह वे पाकिस्तान की पहली महिला निर्देशक बनीं. यह फिल्म भी हिट हुई थी. बाद में ‘दुपट्टा’ फिल्म आई जिसके गाने ‘तुम ज़िन्दगी को ग़म का फ़साना बना गए’, ‘जिगर की आग से इस दिल को जलता देखते जाओ’ और ‘चांदनी रातें’ सरहद के इस पार हिंदुस्तान में भी सराहे गए.

उधर, ग़ुलाम हैदर ने भी पाकिस्तान का रुख कर लिया था. उनकी और नूरजहां की जोड़ी ने ‘गुलनार’ फ़िल्म में हिट गाने दिए. उनमें से कुछ थे- ‘सखी री नहीं आये सजनवा’, ‘लो चल दिए वो हमको तसल्ली दिए बगैर’.

पाकिस्तान में उनके अफ़साने भी मशहूर हुए. कहते हैं कि पंजाबी फिल्म ‘पाटे खान’ के बनने के दौरान वे फिल्म के वितरक एम नसीम की ओर खिंच गईं. इससे उनके शौहर नाराज़ हो गए और दोनों में तलाक हो गया. इस दौर में उनकी कुछ फिल्में असफल रहीं और एम नसीम और उनके बीच रिश्ता ख़त्म हो गया. फिर वे अपने से 14 साल छोटे अभिनेता एजाज़ दुर्रानी के क़रीब हो गईं और उनसे निकाह पढ़ लिया. 1961 में आई ‘ग़ालिब’ उनकी आख़िरी फिल्म थी जिसमें उन्होंने अभिनय किया.

संगीत में अपने योगदान की वजह से उन्हें ‘मलिका-ए-तरनुम्म’ का ख़िताब मिला. एजाज़ दुर्रानी के साथ भी उनका रिश्ता ज़्यादा वक़्त नहीं चला. बाद में ख़बर आई कि वे पाकिस्तान के फौजी शासक याह्या खान के नज़दीक हो गई हैं. हालांकि, दोनों ने इस रिश्ते को सबके सामने क़ुबूल नहीं किया. बताते हैं कि इस रिश्ते के बाद से ही उन्हें ‘मैडम’ कहकर पुकारा जाने लगा. फिर तो वे ताजिंदगी पाकिस्तान की ‘मैडम’ बनकर ही रहीं.

1965 की जंग में नूरजहां ने पाकिस्तान के फौजियों की हौसला अफज़ाई के लिए कई गाने भी गाये. मशहूर शायर फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म ‘मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग’ उन्होंने फिल्म ‘कैदी’ में गाई थी. खुद नूरजहां से मुत्तासिर फैज़ ने कुबूल किया था कि इस नज़्म को नूरजहां से बेहतर कोई नहीं गा सका.

फैज़ अहमद फैज़ उस वक़्त एक मशहूर नाम थे. अपनी नज़्म के मशहूर होने के बाद वे नूरजहां के दीदार के लिए बिना बताये उनके घर चले गए. कहते हैं कि हमेशा सजी संवरी रहने वालीं नूरजहां को जब उनके खादिम ने बताया कि कोई फैज़ अहमद नाम का आदमी उनसे मिलने आया है, तो वे नंगे पैर, बिना किसी मेकअप के दरवाज़े पर उनसे मिलने दौड़ी चली गईं. उनकी ख़ूबसूरती के कई दीवाने थे.

एक बार किसी इंटरव्यू में उनसे पूछा गया था कि उनके कितने अफेयर्स रहे हैं. वे उस दिन कुछ ज्यादा ही अच्छे मूड में थीं सो उन्होंने गिनाना शुरू किया और कुछ देर बाद पूछा, ‘कितने हुए अब तक?’ इंटरव्यू लेने वाले ने जवाब दिया, ‘16’. नूरजहां अपने परिचित पंजाबी अंदाज में बोलीं, ‘हाय अल्लाह, ना-ना करदियां वे सोलह हो गए ने!’

अपनी बेटी को पाने के लिए स्टूडियो की मिल्कियत छोड़ दी

शौक़त हुसैन से नूरजहां को तीन औलादें हुईं. अपनी बड़ी बेटी की मिलकियत पाने के लिए उन्होंने स्टूडियो ‘शाहनूर’ पर से मालिकाना हक़ छोड़ दिया. अपने दूसरे शौहर एजाज़ दुर्रानी के कहने पर उन्होंने फिल्मों में काम करना छोड़ दया था. जब दुर्रानी ने उन्हें गाने के लिए भी मना किया तो उन्होंने इस बात को मानने से इंकार कर दिया. संगीत उनके लिए सांस लेने जैसा थ. खुद एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि जब वे गा नहीं रही होती हैं तो खुन्नस के मारे घर में लोगों की नाक में दम कर लेती हैं.

नूरजहां बनाम लता मंगेशकर

हिंद्स्तान और पाकिस्तान में तब से लेकर आज तक यह बहस तारी है कि नूरजहां और लता मंगेशकर में से बेहतर कौन है. ‘नौशादनामा’ के लेखक राजू भारतन के मुताबिक़ यकीनन नूरजहां लता मंगेशकर से बेहतर गायिका थीं. वे कहते हैं कि एक बार खुद लता ने यह बात कही थी कि नूरजहां उनकी मॉडल रही हैं. ‘स्वरों की यात्रा’ में पंकज राग लिखते हैं कि नूरजहां की विशिष्ट गायकी में जितनी रेंज और विविधता थी उतनी संपन्नता तत्कालीन गायिकाओं में नहीं थी. उनकी रागदार आवाज़ में ग़ज़ब की तेज़ी व कशिश थी जो बिजली की तरह कौंधती थी. उन्हें आरोह-अवरोह में मेहनत नहीं करनी पड़ती थी. उनकी आवाज़ में स्वाभाविक गति थी.

नौशाद का मानना था कि चूंकि नूरजहां पाकिस्तान चली गई थीं जहां उतने बड़े मौसिकीकार नहीं थे, लिहाज़ा वे पंजाबी गायन तक ही सिमटकर रह गईं. वे बमुश्किल साल में तीन या चार फिल्मों में ही गा पातीं, वहीं लता मंगेशकर के साथ तकरीबन हर भाषा के संगीतकार थे और वे एक साल में बेशुमार गाने गातीं. बकौल ग़ुलाम हैदर, जिन्होंने दोनों के फ़िल्मी कैरियर को संवारा, ‘लता हिंदुस्तान की आवाज़ बनने के लिए ही बनी थीं.’ संगीतकार सज्जाद हुसैन का कहना था, ‘अल्लाह ने नूरजहां और लता को गाने के लिए ही बनाया था. बाद में, नहीं जानता कि उसने बाकी औरतों को बनाने की ज़हमत क्यों की.’ हालांकि यह कुछ ज़्यादा ही हो गया था.

खैर, यह बहस बेकार की है. हकीक़त यह है कि दोनों ने एक-दूसरे की बेहद इज्ज़त की है. ये वीडियो देखकर आप इस बात का यकीन कर सकते हैं और लता मंगेशकर इसलिए भी बेहतर गा सकीं कि उन्होंने नूरजहां को सुना और गाते हुए देखा था.

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जब नूरजहां हिंदुस्तान वापस आईं

कोई 35 साल बाद, फ़रवरी, 1982, में नूरजहां हिंदुस्तान आईं तो एक प्रोग्राम रखा गया. उस कार्यक्रम में लता मंगेशकर ने भी शिरकत की थी. जानकार बताते हैं कि लता ने जब जयदेव कृत ‘अल्लाह तेरो नाम’ गाया तो एकबारगी नूरजहां भी दंग रह गयी थीं. फ़रवरी की वह शाम बेहद यादगार शाम थी. दिलीप कुमार साहब ने उनका इस्तकबाल करते हुए कहा था, ‘नूरजहां जी, जितने बरस के बाद आप हमसे मिलने आयीं हैं, ठीक उतने ही बरस हम सबने आपका इंतज़ार किया है.’ सुनकर वे दिलीप साहब के गले लगकर भावुक हो उठीं. नूरजहां ने सिर्फ एक गाना ही गया और वह था - ‘आवाज़ दे कहां है, दुनिया मेरी जवां है.’ उन्होंने कहा कि वे भी अल्लाह से दुआ मांगती रहीं कि एक बार मरने से पहले उन्हें हिंदुस्तान के दोस्तों से मिलवा दे.

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नूरजहां कसूर की थीं. पर ये कसूर किसका है कि नूरजहां उधर की हो गईं और लता इधर की? हकीक़त तो यह है कि नूरजहां हों या लता मंगेशकर, ग़ुलाम हैदर हों या उस्ताद बड़े गुलाम अली खान, हिंदुस्तानी संस्कृति इधर भी है, उधर भी. इनके क़द्रदान इधर भी हैं, उधर भी, अपनों से बिछड़ने की खलिश इधर भी है, उधर भी. फिर मिलने की हूक इधर भी है, उधर भी.

पर क्या करें! सियासत इधर भी है, उधर भी.