हाल ही में हुए दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में मतगणना के दौरान एक वाकये ने मुझे चौंकाया. जब भी स्क्रीन पर नोटा को मिल रहे वोटों की संख्या दिखाई जाती 6-7 स्टूडेंट्स का एक समूह जश्न मनाने लगता. उन्हें जश्न मनाता देख कर बाकी स्टूडेंट विंग्स से जुड़े छात्र उन्हें असहज दृष्टि से देखने लगते. उत्सुकतावश मैंने उनसे बात की. इस दौरान उनकी एक चिंता मुझे वाजिब जान पड़ी कि राजनीतिक दलों द्वारा अपनी विचारधारा विश्वविद्यालयों पर थोपने से कैंपस का बुनियादी चरित्र धीरे-धीरे नष्ट हो रहा है.

अगर गौर करें तो जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रसंघ चुनावों में एक समानता ये रही कि दोनों ही जगह नोटा पर पड़े वोटों का प्रतिशत बढ़ा है. जेएनयू में नोटा को एनएसयूआई से ज्यादा वोट मिले तो दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में आइसा के कुल वोटों से ज्यादा वोट नोटा पर डाले गए. हालांकि दोनों ही जगहों पर राजनीतिक पार्टियों की खास विचारधारा से जुड़े छात्र संगठनों को जीत मिली है, लेकिन फिर भी यह सवाल अहम है कि आखिर वे कौन से विद्यार्थी हैं जो वोट डालने तो जाते हैं लेकिन किसी सशक्त उम्मीदवार के अभाव में विचारधारा के आगे घुटने टेकने से इनकार कर देते हैं. विद्यार्थी जीवन तो तमाम विचारधाराओं से जूझकर बेहतर समझ पैदा करने का होता है ऐसे में छात्र का किसी खास राजनीतिक या धार्मिक विचारधारा का ध्वजावाहक बन जाना कहां तक सही है?

वैचारिकता को धार देना तो विश्वविद्यालयों का काम है लेकिन ये काम अब कैंपस में घुस कर राजनीतिक पार्टियां करने लगी हैं. ऐसी पार्टियों के छात्र संगठनों से जुड़े आम छात्र भी पार्टी लाइन की वैचारिक कट्टरता अपनाने का प्रयास करते हैं

तमाम राजनीतिक दलों की छात्र इकाइयां हैं और पूरे देश के विश्वविद्यालयों में इन राजनीतिक पार्टियों से जुड़े छात्र संगठनों के बैनर तले चुनाव लड़ने का एक खतरनाक ट्रेंड अपने उफान पर है. राजनीतिक पार्टियों का समाज में अपना खास जातीय, धार्मिक और वैचारिक वोट बैंक होता है और इसी आधार पर वे युवा मस्तिष्क को अपनी बनाई हुई बाइनरी में जकड़ने की कोशिश करती हैं. उनका निशाना युवाओं को अपनी विचारधारा में फंसाकर दीर्घकालीन वोट बैंक का निर्माण करना होता है. दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव से ठीक एक दिन पहले विज्ञान भवन के भाषण को दिल्ली विश्वविद्यालय में लाइव दिखाया जाता है, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के एक सेमिनार में बीजेपी का चुनाव चिन्ह हर स्लाइड पर लगा दिया जाता है.

चुनाव जीतने की चाह रखने वाले छात्र नेताओं के लिए इन छात्र संगठनों से जुड़ना फायदे का सौदा होता है. वे राजनीतिक पार्टियों के नेताओं के पोस्टर लगाकर चुनाव जीत जाते हैं जबकी उनकी खुद की लोकप्रियता चुनाव जीतने के लिहाज से बेहद कम होती है. अब डूसू चुनाव का ही उदाहरण देखिये. अध्यक्ष पद के लिए एबीवीपी के उम्मीदवार का नाम चुनाव से महज छह दिन पहले ही फाइनल हुआ. उधर, एनएसयूआई से अध्यक्ष पद प्रत्याशी के नाम पर कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद चुनाव से महज दो दिन पहले ही आख़िरी मुहर लग सकी और वे चुनाव भी जीत गए. जाहिर सी बात है इतना वक्त चुनाव प्रचार के लिहाज से बेहद कम था, लेकिन राजनीतिक दलों के छात्र संगठनों से जुड़े होने के कारण इन प्रत्याशियों को इतने वोट मिल गए.

अब छात्रसंघ के चुनावों में हार-जीत को विचारधारा की हार-जीत के रूप में देखा जाता है. फिर वह उस विचारधारा से जुड़ी पार्टी की हार-जीत के रूप में बदल जाता है और उसे वोट देने वाले छात्र पढ़ाई के दौरान ही उस विचारधारा से जुड़ जाते हैं. पार्टियों से जुड़े स्थानीय नेता इन चुनावों में प्रचार करने आते हैं. वैचारिकता को धार देना तो विश्वविद्यालयों का काम है, लेकिन यह काम अब कैंपस में घुस कर राजनीतिक पार्टियां करने लगी हैं. ऐसी पार्टियों के छात्र संगठनों से जुड़े आम छात्र भी पार्टी लाइन की वैचारिक कट्टरता अपनाने का प्रयास करते हैं जिससे वे कक्षाओं में होने वाले वैचारिक विमर्श के दौरान एक साझा समझ विकसित करने की प्रक्रिया से चूक जाते हैं जो एक मनुष्य के तौर पर भविष्य में उन्हें कट्टर समर्थक होने से बचाती है. उदाहरण के तौर पर विश्वविद्यालयों में सीख रहे छात्र शैक्षिक संवाद के दौरान यह समझ पाते हैं कि बहुसंख्यक आबादी की महत्वाकांक्षाओं के कारण अल्पसंख्यकों को बलि का बकरा ना बनाया जाय, जबकि राजनीति में बहुसंख्यकों औए अल्पसंख्यकों दोनों की भावनाओं से खेल कर जीत हासिल करना ही मुख्य उद्देश्य होता है. हमारे विश्विद्यालयों की स्थिति भले ही बहुत बेहतर न हो, लेकिन ज्ञान को आकार देने के मामले में अध्यापक अभी भी राजनेताओं से बेहतर विकल्प हैं.

यह समझना होगा कि विचारधारा बर्फी के टुकड़े की तरह न हो जिसे मौकापरस्त राजनीतिकार तोड़कर चूरे में बिखेर दे बल्कि उसे चाशनी की तरह सबमें समाहित होने वाली होना चाहिए

अमेरिकी लेखक ग्रेग मार्टेन्सन कहते हैं, ‘हमें शिक्षित होने और विचारधारा से बंधने के बीच के अंतर को समझना होगा. शिक्षा असहिष्णुता को विफल करने, हठधर्मिता को चुनौती देने और मानवता को मजबूत करने में हमारी मदद करती है, जबकि विचारधारा इसके ठीक विपरीत है.’ राजनीतिक दलों ने अपने स्वार्थ के चलते मीडिया, प्रचार तंत्रों और अफवाहों का सहारा लेकर विश्वविद्यालय कैंपस को राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रद्रोही की बहसों में उलझा दिया है जिससे समाज की बुनियादी आवश्यकताओं पर होने वाली बहसों की गुंजाइश सिमटती चली गयी है.

भारत में छात्रसंघ का इतिहास 150 सालों से भी ज्यादा पुराना है, 1848 में दादा भाई नौरोजी ने ‘दी स्टूडेंट साइंटिफिक एंड हिस्टोरिक सोसाइटी’ की स्थापना की. तब छात्रसंघ सामजिक सरोकारों और विद्यार्थियों के अधिकारों को हासिल करने के लिए संघर्ष का हथियार हुआ करते थे. आजादी के आंदोलन में भी बहुत से छात्र संगठनों ने बढ़-चढ़ कर भाग लिया. जब जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में पूरे देश के छात्रों ने संघर्ष किया तब भी उसका उद्देश्य राजनीतिक, सामाजिक सरोकार ही था. लेकिन आज के छात्र संगठन राजनैतिक पार्टियों की महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए वैचारिक और धार्मिक तुष्टीकरण का खतरनाक खेल खेलने में लगे हैं.

छात्र राजनीति आवश्यक है, लेकिन इसे विधायक या सांसद का चुनाव बनने से बचाना होगा क्योंकि राजनीतिक पार्टियों के रहमोकरम से जीतने वाले छात्र नेता विद्यार्थी हितों का कम और पार्टी हितों का ज्यादा ख्याल रखते हैं. हमें यह समझना होगा कि विचारधारा बर्फी के टुकड़े की तरह न हो जिसे मौकापरस्त राजनीतिकार तोड़कर चूरे में बिखेर दे बल्कि उसे चाशनी की तरह सबमें समाहित होने वाली होना चाहिए. तो क्या विश्वविद्यालय के चुनावों में राजनीतिक दलों की वैचारिकता के वाहक छात्र संगठनों के बैनर तले चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगना चाहिए? बहुत से उपलब्ध विकल्पों में से ये भी एक विकल्प है. कम से कम नोटा को मिलने वाले वोटों का बढ़ता प्रतिशत तो इसी ओर इशारा करता है.

(लेखक दिल्ली स्थित भारतीय जनसंचार संस्थान के छात्र हैं)