कंगना जी, वास्तविक जिंदगी में आप अपनी फिल्म सिमरन के मुख्य किरदार से कितना मिलती-जुलती हैं?

असली जिंदगी में मैं उससे भी ज्यादा सिरफिरी हूं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि मैं सिमरन की तरह सिरफिरी कतई नहीं हूं. हां, लेकिन जिंदगी को भरपूर जीने में यकीन रखती हूं.

अच्छा, यह बताइये कि बॉलीवुड में आप किस हीरो के काम से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं?

(हंसते हुए) पूरा बॉलीवुड ही मेरे प्रभाव में है.

मैं आपके प्रभाव की बात नहीं कर रही... आपको किस हीरो का काम अच्छा लगता है?

(मुस्कुराते हुए) हीरो कौन होता है?...वही न, जिसके अकेले के दम पर पूरी फिल्म चल जाए. जो फिल्म हिट कराए. अब सिमरन के बाद तो मैं पूरी तरह से फिल्मों का हीरो ही बन गई हूं! पूरी फिल्म इंडस्ट्री में और ऐसा कौन है? बाकी लोग या तो सिर्फ हीरो हैं या सिर्फ हीरोइन, पर मैं फिल्म का हीरो भी हूं और हीरोइन भी! मुझे प्रभावित करने वाला अभी इंडस्ट्री में कोई पैदा ही नहीं हुआ, सो मैं सिर्फ खुद से ही प्रभावित हूं.

कई निर्देशकों का आरोप है कि आप उनके काम में काफी टांग अड़ाती हैं. यह बात किस हद तक सही है?

यह आरोप सरासर गलत हैं, मैं सिर्फ टांग नहीं अड़ाती, पूरी की पूरी अड़ जाती हूं! अब्ब्ब...मेरा मतलब कुछ डायरेक्टर फिल्म का फ्रेम ही इतना तंग बनाते हैं कि उसमें मेरी जैसी कलाकार को पूरी तरह से फिट होने की ज्यादा गुंजाइश ही नहीं मिलती. तो उस तंग फ्रेम में घुसने में कभी मेरी टांग अड़ जाती है, कभी हाथ और तो कभी सिर. डायरेक्टर्स को मेरा कद देखकर ही फिल्म का फ्रेम बनाना चाहिए न!

आप यह क्यों कहती हैं कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री पर पांच खानदानों का कब्जा है?

सिर्फ खानदानों का ही नहीं, ‘खानों’ का भी कब्जा है! पर मैंने भी इन सब कब्जे वाली जगहों की कुर्की न कर दी तो मेरा भी नाम सिमरन, मेरा मतलब कंगना रनोट नहीं.

करण जौहर ने आरोप लगाया है कि आपवीमेन और विक्टम कार्डका इस्तेमाल करती हैं. इस बारे में आपका क्या कहना है?

वे तो ऐसे कह रहे हैं, जैसे उन्होंने जिंदगी में कभी कार्ड खेलना तो दूर देखे भी न हों! करण बाबू क्या जानें इस एक कार्ड की कीमत!... उन्हें खुद तो बैठे-बिठाये सारे क्रेडिट-डेबिट कार्ड चांदी की थाली में मिल गए. वैसे जिस परिवारवाद के कार्ड पर वे सालों से फिल्मों का जुआ खेल रहे हैं, उस पर उनका क्या कहना है, मैं जानना चाहती हूं.

आपका फिल्म इंडस्ट्री में कोई गॉडफादर नहीं था. लेकिन आपने खुद दूसरों के लिए गॉडफादर बनने जैसा मुकाम हासिल कर लिया है. कैसा लगता है?

(हंसते हुए) प्लीज मेरा जेंडर मत बदलिये, वर्ना मेरे ‘फीमेल कार्ड’ का क्या होगा! ...अब्ब्ब, मेरा मतलब कि मुझे अपनी फेमिनिटी से प्यार है. मैं गॉडमदर ही बनना चाहती हूं, गॉडफादर नहीं!

आप की अदालतमें दिए साक्षात्कार में आपने इंडस्ट्री के बहुत सारे पुरुषों की पोल खोलकर रख दी है. क्या आपको डर नहीं लगता?

‘रिवॉल्वर रानी’ भी अगर डर गई तो बाकी के निहत्थे लोगों का भला क्या होगा! (हंसते हुए)

आपने आदित्य पंचोली, करण जौहर और ऋतिक रौशन जैसे बड़े नामों के खिलाफ काफी बेखौफ होकर खुलासे किये हैं. क्यों?

क्योंकि मैं यह मिथ तोड़ना चाहती हूं कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’! मैं दिखाना चाहती हूं कि मर्दों को भी दर्द होता है. बल्कि बिना चोट लगे और खून बहे भी उन्हें इतना दर्द होता है कि वे तड़प जाते हैं. (मुस्कुराते हुए)

एक्टर्स से लेकर डायरेक्टर्स तक की पोल खोलना, क्या यह आपका पब्लिसिटी स्टंट नहीं है?

हां, ये पब्लिसिटी स्टंट ही है, पर मेरे लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए जिनके मैंने नाम लिए हैं. मेरी पब्लिसिटी सिर्फ मेरे काम से, और उन लोगों की पब्लिसिटी मेरे उनका नाम लेने से हो रही है! (हंसती हैं)

गैंगस्टर, फैशन, वंस अपॉन ए टाइम इन मुम्बई, तनु वेड्स मनु या फिर सिमरन, इन सभी फिल्मों में आपके किरदार आदर्श लड़की के नहीं हैं. फिर भी लोग आपके इन किरदारों को पसंद क्यों करते हैं?

(शरारत से) आपको सच बताऊं, ‘आदर्श लड़की’ को लोग सिर्फ शादी के समय ही पसंद करते हैं, बाकी समय बिगड़ी हुई लड़कियां ही उनकी फैंटेसी में होती हैं!...और सिर्फ लड़कों की नहीं, लड़कियों की भी. क्योंकि बिना बिगड़े लड़कियां जिंदगी जी कहां पाती हैं! लड़कियों या महिलाओं को वे किरदार इसलिए पसंद आए कि कुछ देर के लिए ही सही, पर्दे पर वे मेरे साथ अपनी फैंटेसी को जी सकीं. और लड़कों या पुरुषों की तो फेवरेट होती ही हैं ऐसी लड़कियां, बस वे उनकी बहन या पत्नी नहीं होनी चाहिए! असली बात तो यह है कि फिल्म इंडस्ट्री और समाज की हिप्पोक्रेसी के कारण ये किरदार इतने पसंद किये गए. यहां लोगों की हिप्पोक्रेसी मेरे फायदे की रही! (हंसती हैं)

आपको फिल्म इंडस्ट्री में किस-किस से प्यार हुआ है?

सिर्फ खुद से! मेरा मतलब इंडस्ट्री में कोई मेरे प्यार के काबिल ही नहीं.

लेकिन कुछ समय पहले तो आपने सार्वजनिक रूप से कहा था कि आप ऋतिक रोशन से प्यार करती थीं और उनसे शादी भी करना चाहती थीं.

काश मेरी बातों को ऋतिक ने भी इतना सीरियसली लिया होता जितना आपने लिया है, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि आप जो कह रही हैं, वह एक डायलॉग से ज्यादा कुछ भी नहीं. ‘मैं तुमसे प्यार करती हूं, शादी करना चाहती हूं, तुम्हारे बच्चे की मां बनना चाहती हूं’ ये फिल्म इंडस्ट्री की हीरोइनों के सबसे कॉमन और पुराने डायलॉग्स हैं. इन्हें इतना सीरियसली लेने की जरूरत नहीं है.

सुना है कि आप बहुत जिद्दी हैं. ऐसा क्यों?

कद्दू होने से जिद्दी होना ज्यादा अच्छा है. मैं अपनी जिद से ही इस मुकाम पर पहुंची हूं. कद्दू होती तो सारे ‘एक्स-वाई’ सब्जी बनाकर खा गए होते मेरी. (हंसती हैं)

क्या आप फेमिनिस्ट हैं?

क्या आप बकलोल हैं? अब्ब्ब...मेरा मतलब, मेरे इतने सारे फेमिनिस्ट कमेंट के बाद भी आप यह सवाल कर रही हैं.

फेमिनिस्ट होने का आपके लिए क्या मतलब है?

इंडस्ट्री के सारे हीरोज की बजा डालो! अब्ब्ब...मेरा मतलब कि ज्यादातर महिलाएं या तो फेम पाने के लिए फेमिनिस्ट बनती हैं या फेमस होने के बाद...लेकिन मैं तो अपने जन्म के पहले से फेमिनिस्ट हूं!

वह कैसे?

मैं अपनी मां की अनचाही बेटी हूं. मतलब कि वे मुझे नहीं चाहती थीं पर मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि मेरी मां मेरी जगह एक बेटा चाहती थीं. मैं उनके ना चाहने के बावजूद डंके की चोट पर पैदा हुई. मेरे पैदा होने, जीने और दूसरों का जीना हराम करने, अब्ब्ब...मेरा मतलब कि दूसरों से अपना हक लेने की आजादी को कोई नहीं छीन सकता. आई एम ए फ्री सोल.

फिल्म इंडस्ट्री में आने वाली नई नायिकाओं को क्या सलाह देंगी आप?

शुरू में चुपचाप समय के साथ बहो. काम करके अपनी जगह बनाओ और फिर सबकी बजा डालो. फिर ‘किसी’ से और ‘किसी के बाप’ से डरने की जरूरत नहीं! अब्ब्ब...मेरा मतलब है कि हर किसी के अंदर अपना अलग हुनर, हिम्मत और जज्बा होता है, सभी को उसे पहचानकर उसके हिसाब से काम करना चाहिए. मैं किसी को सलाह देने लायक खुद को नहीं समझती.

एक आखिरी सवाल. इतरे सारे विवादों में घिरकर भी आप टूटी नहीं. इस हिम्मत का राज क्या है?

मेरा बस नाम ही कंगना है, खुद मैंने हाथों में चूड़ियां नहीं पहन रखी हैं. मैं चूड़ियां दूसरों को पहनाती हूं! इस भुलावे में मत रहियेगा कि मैं चूड़ी या कंगन की तरह जब-तब टूट जाऊंगी! मैं टूटने के लिए नहीं बल्कि तोड़ने के लिए बनी हूं! (गर्व से मुस्कुराते हुए)