यों तो हमें इस श्रृंखला को जनवरी 1948 से शुरू करना चाहिए. 30 जनवरी को हुई गांधी की हत्या सिर्फ एक घटना नहीं थी, पूरे के पूरे इतिहास का समापन था. विख्यात इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने इसीलिए अपनी कालजई किताब का शीर्षक ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ चुना है. लेकिन हम गांधीजी की हत्या के बारे में नहीं 1948 की दूसरी सबसे अहम घटना का ज़िक्र करेंगे - तमाम रियासतों का हिंदुस्तान में विलय.

अशोक, अकबर और औरंगज़ेब के शासन काल में भारत की सीमाएं काफी हद तक आज के हिंदुस्तान जैसी ही दिखा करती थीं. मुग़लों के पतन से जो विघटन हुआ उसे अंग्रेजों ने रोका तो सही पर उनके प्रस्थान के समय हिंदुस्तान का विभाजन हो गया. लेकिन जिस आधार पर यह विभाजन हुआ, उसी आधार पर देश का एकीकरण करने की कोशिशें भी होती रहीं. और वह आधार था - धर्म.

हुमरा कुरैशी की किताब ‘अब्सोल्युट खुशवंत’ में खुशवंत सिंह कहते हैं ‘जिन्ना के दो-राष्ट्र सिद्धांत’ से काफ़ी पहले केशवराव बलिराम हेडगेवार, बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और विनायक दामोदर सावरकर ‘हिंदू राष्ट्र’ की बात करने लग गए थे. लाजपत राय ने तो धर्म के आधार पर भारत का नक्शा भी खींच डाला था.’ जिन्ना ने इस आग को और भड़का दिया जिसे और लोगों ने भी हवा दी और ज़मीन पर लकीरें खिंच गयीं.

रियासतों के एकीकरण का काम आज़ादी से पहले ही शुरू हो चुका था. 27 जून, 1947 को माउंटबेटन ने सरदार पटेल की सरपरस्ती में ‘राज्य विभाग’ का पुनर्गठन किया. पटेल ने इस काम में अपने सहयोगी के तौर पर वीपी मेनन को चुना जो बेहद चतुर कूटनीतिज्ञ और समझदार व्यक्ति थे.

पांच जुलाई को पटेल ने सभी रियासतों को पत्र लिखकर तीन शर्तों के साथ भारत में विलय का न्यौता दिया. उन्होंने लिखा कि रियासतों की प्रतिरक्षा, विदेश और संचार का ज़िम्मा भारत सरकार का होगा और बाकी के विभाग जैसे राजस्व इत्यादि उनके ज़िम्मे ही रहेंगे.

आज़ादी से दो हफ्ते पहले माउंटबेटन ने ‘चैंबर ऑफ़ प्रिंसेज’ के राजाओं और नवाबों को संबोधित किया. रामचंद्र गुहा अपनी किताब ‘इंडिया आफ्टर गांधी’ में लिखते हैं कि वाइसराय का ये हिंदुस्तान के लिए सबसे बड़ा योगदान था. माउंटबेटेन ने वहां मौजूद राजाओं को आधिकारिक तौर पर ‘इंडिया इंडिपेंडेंस एक्ट’ के पारित होने की बात कही और ये भी कहा कि उनकी ब्रिटेन की महारानी के प्रति वफ़ादारी अब ख़त्म होती है और अब वे अपने और अपनी रियाया के भविष्य के लिए ख़ुद ज़िम्मेदार हैं.

माउंटबेटेन ने उन्हें चेतावनी भी दी कि रियासतदारों की हालात अब ‘बिना पतवार की नाव’ जैसी है और अगर उन्होंने भारत में विलय न किया तो इससे अपजी अराजकता के लिए वे ख़ुद ज़िम्मेदार होंगे. बकौल माउंटबेटन,’... आप अपने सबसे नज़दीक पडोसी यानी आज़ाद भारत से भाग नहीं सकेंगे और न ही लंदन की महारानी आपकी सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेंगी. बेहतर होगा कि आप आज़ाद होने का खवाब न देखें और अगर उपस्थित राजा हिंदुस्तान में विलय को स्वीकार करते हैं, तो मैं आपके लिए कांग्रेस की निर्वाचित सरकार से कुछ बेहतर शर्तों मनवा पाऊंगा...’

इस संबोधन का असर यह हुआ कि 15 अगस्त 1947 आते-आते लगभग सारे राजाओं और नवाबों ने विलय की संधि पर दस्तख़त कर दिए. फिर भी कुछ बड़े राज्य जैसे कश्मीर, जूनागढ़, हैदराबाद अभी भी आज़ाद रहने का ख़्वाब पाल रहे थे.

जूनागढ़ पश्चिम भारत के सौराष्ट्र इलाके का एक बड़ा राज्य था. वहां के नवाब महावत खान की रियाया का ज़्यादातर हिस्सा हिंदुओं का था. जिन्ना और मुस्लिम लीग के इशारों पर जूनागढ़ के दीवान अल्लाहबख्श को अपदस्थ करके बेजनीर भुट्टो के दादा शाहनवाज़ भुट्टो को वहां का दीवान बनाया गया था.

गुहा अपनी किताब में लिखते हैं कि जिन्ना का जूनागढ़ को लेने का कोई इरादा नहीं था. वे नेहरू के साथ जूनागढ़ के बहाने कश्मीर की सौदेबाज़ी करना चाहते थे. भुट्टो ने महावत खान पर दवाब बनाया कि वह पाकिस्तान में विलय कर ले. 14 अगस्त, 1947 को महावत खान ने जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय का ऐलान कर दिया. एक महीने बाद जब पकिस्तान ने भी इसे स्वीकार कर लिया, तब सरदार पटेल उखड गए. उन्होंने जूनागढ़ के दो बड़े प्रांत, मांगरोल और बाबरियावाड़, पर ब्रिगेडियर गुरदयाल सिंह के नेतृत्व में सेना भेजकर कब्ज़ा कर लिया.

महावत खान ने काफी छातीकूट किया पर जूनागढ़ की जनता ने उसका साथ नही दिया. इसी बीच कूटनीति का सहारा लेते हुए मेनन भुट्टो से मिले और उन्हें समझाया कि जूनागढ़ की भौगोलिकता और हिंदुओं की बहुलता होने की वजह से उसका पाकिस्तान में विलय कतई तर्कसंगत नहीं है. भुट्टो ने भी दबी-ढकी ज़बान में इसे स्वीकार किया और मेनन को जनमत संग्रह कराने का भरोसा दिलाया. पर यह सिर्फ कोरा भरोसा ही था.

इसी दौरान गांधीजी के पोते, समलदास गांधी, की अगुवाई में बॉम्बे में जूनागढ़ की अंतरिम सरकार बनी. इस सरकार ने जनता के साथ मिलकर और महावत खान के विरुद्ध जाकर भारत में विलय के आंदोलन को हवा दी. इस सबके पीछे सरदार पटेल की कूटनीति ही काम कर रही थी. बढ़ते आंदोलन को देखकर नवाब महावत खान कराची भाग गया. आखिरकार नंवबर, 1947 के पहले सप्ताह में शाहनवाज़ भुट्टो ने जूनागढ़ के पाकिस्तान में विलय को खारिज़ कर उसके हिंदुस्तान में विलय की घोषणा कर दी.

इसी महीने यानी नवंबर में भारतीय फौज ने जूनागढ़ पर कब्ज़ा कर लिया. वीपी मेनन और पटेल के इस फैसले से माउंटबेटन नाराज़ हो गए. इसके बाद पटेल ने उनको खुश करने के लिए जूनागढ़ में जनमत संग्रह करवाया जिसमे 90 फीसदी से ज़्यादा जनता ने भारत में विलय को स्वीकार किया. इस तरह से 20 फरवरी, 1948 को जूनागढ़ देश का हिस्सा बन गया.

अब ज़रा दक्खन का रुख करते हैं और नवाब ऑफ़ हैदराबाद, उर्फ़ निज़ाम साहब के राज्य चलते हैं. हैदराबाद राज्य काफी साधन-संपन्न था. इसके उत्तर में मध्य प्रांत, पश्चिम में बॉम्बे और दक्षिण और पूर्व में मद्रास प्रांत था. इसकी भी रियाया में 85 फीसदी हिंदू थे पर सेना और शासन में मुसलमानों का दबदबा था.

नवाब उस समय दुनिया के सबसे बड़े अमीरों में शामिल था. उसकी मंशा आज़ाद रहने की थी और जूनागढ़ का हश्र देख, इंग्लैंड की सरकार के साथ सौदेबाज़ी के लिए उसने एक बड़े अंग्रेज वकील सर वॉल्टर मॉन्कटॉन को अपना एजेंट नियुक्त किया.

ब्रिटिश इतिहासकार अलेक्स वॉन तुंजेलमांन अपनी किताब ‘इंडियन समर्स’ में लिखती हैं कि मॉन्कटॉन ने नवाब को अपनी सेना बढ़ाने का सुझाव दिया जो ज़रूरत पड़ने पर हिंदुस्तान की सेना से लड़ सके. और उसने वाइसराय और एडविना के समक्ष हैदराबाद की आज़ादी की बात उठाई और फिर वह जिन्ना से भी मिला. जिन्ना ने हैदराबाद की आज़ादी के ख़्याल को शह देते हुए इसमें अपने सहयोग की बात की और यह भी कहा कि कोई फैसला लेने से पहले वह उन्हें (जिन्ना) भरोसे में ले.

माउंटबेटन चाहते थे कि हैदराबाद का हिंदुस्तान में विलय हो जाए और उन्होंने मॉन्कटॉन को अपनी तरफ से ऐसी कोशिश करने के लिए भी कहा. लेकिन मॉन्कटॉन बड़ा ही चालाक वकील था. उसने अपनी बातों से माउंटबेटन को भरोसा दिला दिया कि भारत के पहले गवर्नर जनरल जैसा चाहते हैं, वैसा ही होगा. पर वह करना वही चाहता था जो उसे निजाम ने कहा था.

माउंटबेटन ने लंदन की सरकार को पत्र लिखकर पूरी योजना समझायी कि हैदराबाद का हिंदुस्तान में विलय समझदारी है और अगर निज़ाम उस्मान अली इसे नहीं मानता है तो वे उसके बेटे को निज़ाम घोषित कर देंगे. इधर, मॉन्कटॉन ने दोहरी चाल चलते हुए निज़ाम को भारत के खिलाफ सैन्य कार्यवाही के लिए राज़ी कर लिया. वह जिन्ना से भी इसमें सहयोग की अपेक्षा कर रहा था.

चूंकि हैदराबाद अन्य भारतीय प्रांतों से घिरा हुआ था इसलिए मॉन्कटॉन ने यह प्लान बनाया कि सबसे पहले अन्य प्रान्तों का कुछ हिस्सा जीतकर समुद्र तक जाने का रास्ता बनाया जाए, जिससे पकिस्तान की सेना समुद्र के रास्ते हैदराबाद पहुंच सके. लेकिन पटेल मॉन्कटौन की चालाकियों को साफ़ पढ़ पा रहे थे. यह ऐसा दौर था जब पटेल जो भी कर रहे थे, बेहद सोच-समझकर और सिर्फ सही ही कर रहे थे. पटेल ने भी निजाम के खिलाफ सैन्य कार्यवाही की योजना बना ली.

जब जिन्ना को इसका पता चला तो उन्होंने सीधे इसमें पड़ने के बजाय निज़ाम से अपनी लड़ाई खुद लडने के लिए कहा. इस दौरान निज़ाम की सहायता एक मुस्लिम संगठन मजलिस-ए-इत्तेहादी-ए-मुस्लमीन कर रहा था और इसके लीडर क़ासिम रिज़वी ने रज़ाकार नाम के अर्धसैनिक बल का गठन किया जो हैदराबाद में उन्माद फैलाने लग गया.

उधर, हैदराबाद के आसपास के ग्रामीण इलाकों में कम्युनिस्टों ने बगावत का झंडा लहरा दिया और शहर में आज़ादी के दिन यानी 15 अगस्त, 1947 को कांग्रेस पार्टी ने राष्टीय झंडा लहराकर कम्युनिस्टों के खिलाफ़ मोर्चा खोल दिया.

अब ये संघर्ष ‘कांग्रेस बनाम निज़ाम बनाम कम्युनिस्ट’ हो गया और उधर मॉन्कटॉन चर्चिल और इंग्लैंड की टोरी पार्टी के अन्य सदस्यों को निज़ाम के पक्ष में करने में लग गया. लेकिन तब तक टोरी पार्टी और चर्चिल की इंग्लैंड में अहमियत कम हो चुकी थी. बात बनती न देख, जिन्ना ने वाइसराय को धमकी दी कि अगर भारत की सरकार ने निज़ाम के साथ कोई ज़ोर ज़बरदस्ती की तो पाकिस्तान और हिंदुस्तान का मुसलमान एक होकर भारत के ख़िलाफ़ हैदराबाद के लिए लड़ेगा.

इस बीच नवंबर, 47 में निज़ाम हिंदुस्तान के साथ एक अलग तरह की संधि पर राज़ी हुआ जिसे ‘स्टैंडस्टिल एग्रीमेंट ‘ कहते हैं. इसके तहत हैदराबाद को वे सारे अधिकार दिए गए जो उसे हिंदुस्तान की अंग्रेज़ सरकार ने दिए थे. रिज़वी और ‘रज़ाकारों’ ने मुसलमानों को भड़काना शुरू कर दिया और हैदराबाद के हिंदू बाहुल्य इलाके जैसे बीदर, औरंगाबाद से हिंदुओं ने मद्रास प्रांत में पलायन शुरू कर दिया.

मध्य प्रांत के मुसलमानों ने जब हैदराबाद में अपनी बढ़ती हुई आबादी देखी, तो उन्होंने भी हैदराबाद का रुख़ कर लिया. इससे आज़ाद हिंदुस्तान के भीतर एक और विभाजन के हालात पैदा हो गए थे. माहौल बिगड़ता देख, मद्रास के दीवान ने पटेल को हिंदू शरणार्थियों की समस्या पर पत्र लिखा और त्वरित कार्यवाही करने का निवेदन किया.

इधर हैदराबाद के निज़ाम ने सरदार पटेल को धमकी दे डाली कि अग़र हैदराबाद का स्वतंत्र देश का दर्ज़ा न क़ायम रखा गया तो वह संयुंक्त राष्ट्र में इस मुद्दे को लेकर जाएगा.

इसी दौरान 11 सितंबर, 1948 को जिन्ना चल बसे. पटेल ने उनकी मौत के ठीक दो दिन बाद ही भारतीय सेना को हैदराबाद पर चढ़ाई करने का आदेश दे दिया. पांच दिनों के अंदर ही हैदराबाद के रज़ाकारों की कमर टूट गयी और 17 सितम्बर, 1948 को निज़ाम ने पटेल के सामने हाथ जोड़ दिए. जिन्ना ने हिंदुस्तान के मुसलमानों के हैदराबाद की तरफ से लड़ने की जो बात कही थी वह भी ग़लत निकली.

इस तरह सरदार पटेल और वीपी मेनन की जोड़ी ने जूनागढ़ और हैदराबाद को हमारे देश का अभिन्न हिस्सा बना दिया.