अभी दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव के नतीजे सामने आए हैं. कांग्रेस पार्टी की छात्र शाखा एनएसयूआई ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छात्र शाखा अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर परास्त कर दिया.कांग्रेसी नेताओं ने फौरन इसका श्रेय दूर बर्कले में दिए गए राहुल गांधी के भाषण को दे डाला. उनका कहना था कि राहुल के भाषण से प्रभावित छात्रों ने एनएसयूआई के पक्ष में मतदान दिया. यह बात इतनी हास्यास्पद थी कि यह मानना कठिन था कि जिसने भी यह कहा है, वह खुद इस पर विश्वास करता होगा. राहुल गांधी का वक्तव्य अवश्य ही प्रभावशाली और गंभीर था. लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय के चुनाव में राजनीतिक बहस आज तक होते देखी नहीं गई.

विचारों के आधार पर छात्र इन चुनावों में निर्णय लेते हैं, यह आज तक किसी ने नहीं कहा. हालांकि जीत और हार के इस शोर में वह संख्या दब जाती है, जो नगण्य नहीं है, जिसने उन छात्र संगठनों के पक्ष में मत दिया होता है, जो वामपंथी हैं. वामपंथी छात्र संगठनों का चुनाव अभियान वैचारिक भूमि पर किया जाता है. इन दो प्रमुख संगठनों से अलग, जो छात्रों को लुभाने के लिए डीजे शो ,रेन डांस और फिल्म आदि तक का इंतजाम करते हैं और बड़ी-बड़ी गाड़ियों से छात्रों पर अपनी ताकत का रुआब डालते हैं, ये वाम संगठन सादे ढंग से बहुत कम साधनों में यह चुनाव लड़ते हैं. मतदान करने वाले छात्रों में एक बड़ी संख्या है जो उन्हें पसंद करती है और उसे नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए. इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्रों को विचार और सादगी में रुचि नहीं. प्रश्न माहौल और अवसर का है.

जैसे कांग्रेस पार्टी ने एनएसयूआई की जीत का सेहरा अपने सर बांधने की जल्दी की, वहीं भारतीय जनता पार्टी ने इस हार से खुद को दूर करने की कोशिश की. आलोचकों ने कहा कि इस हार में यह संदेश है कि युवा, खासकर छात्र अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार से ऊब रहे हैं. भाजपा ने इससे इनकार करते हुए चुनावों के नतीजों को परिसरों के प्रश्नों से सीमित बताया.

दोनों ही दल आंशिक रूप से सही और बड़ी हद तक गलत थे. अगर दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के नतीजों को उसके पहले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनाव परिणाम और उसके भी पहले पंजाब, असम, उत्तराखंड, राजस्थान और अन्य राज्यों और विश्वविद्यालयों के छात्र संघ के चुनाव के नतीजों से मिलाकर देखें तो एक बात सबमें समान है: अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद का नकारा जाना. क्या इसका कोई अर्थ है? क्या यह छात्रों में किसी नए रुझान का संकेत है?

परिषद का यह कहना सही है कि वह भाजपा की छात्र शाखा नहीं. वस्तुतः परिषद और भाजपा, दोनों ही एक ही परिवार, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की दो शाखाएं हैं. इसलिए परिषद का नीतिगत स्रोत भाजपा नहीं संघ है. फिर भी परिषद ने यह छुपाया नहीं है कि भाजपा के प्रति उसकी स्वाभाविक सहानुभूति है. भाजपा ने उसके प्रति अपना पक्षपात भी जाहिर करने में कसर नहीं छोड़ी है. हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के परिषद् और अन्य छात्र संगठनों के बीच के विवाद और झगड़े में जिस तरह भाजपा के सांसदों और मंत्रियों ने दिलचस्पी ली और एक छात्र संगठन को राष्ट्रद्रोही और जातिवादी तक घोषित किया, उसने एक निहायत ही स्थानीय विवाद को राष्ट्रीय प्रश्न बना दिया. यही बात पिछले वर्ष के आरम्भ में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की एक छोटी सी सभा को, जो वहां के लिए रोजाना की मामूली बात थी, जिस तरह शासक दल के नेताओं ने एक भयंकर राष्ट्रविरोधी साजिश के तौर पर प्रचारित किया, उससे साफ़ था कि परिषद को भाजपा की सरकारी और राजनीतिक ताकत का अतिरिक्त लाभ मिल रहा है.

परिषद की हालिया हार ने उसे एक चेतावनी अवश्य दी है. वह यह कि पुणे के फिल्म इंस्टिट्यूट या मद्रास आईआईटी या उस्मानिया यूनिवर्सिटी या हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, या जेएनयू या रामजस कॉलेज या उदयपुर का मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय या जोधपुर विश्वविद्यालय या हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय, हर जगह सेमिनार, विचार विमर्श को बाधित करने या उसपर हमला करने में परिषद आक्रामक रूप से उत्साही रही है. यह बात छात्रों ने नोट की है.

छात्रों ने संभवतः यह महसूस किया है कि अगर इसे जारी रहने दिया गया तो परिसरों पर एक ख़ास किस्म का अभिभावकत्व काबिज हो जाएगा. छात्राओं ने यह देखा कि जो यह कर रहे हैं, वे उनके देर तक बाहर रहने, अपनी मर्जी से पहनने ओढ़ने, आदि पर भी अंकुश लगा रहे हैं. यह भी देखा जा रहा है कि पिछले तीन वर्ष में परिसरों में एक तरह की वैचारिक सेंसरशिप लागू कर दी गई है. सेमिनारों के रद्द होने, नाट्य उत्सवों के स्थगित होने की खबर अब आम हो गई है. छात्रों को मंत्रीगण सलाह दे रहे हैं कि वे सिर्फ सिलेबस तक अपना ध्यान सीमित रखें और नौकरी की योग्यता हासिल करें. वे राष्ट्रोपयोगी बनें.

छात्रों ने इसका बुरा माना है. परिसर अधिकतर छात्रों को आज़ादी का पहला तजुर्बा देते हैं. भारतीय परिसरों में प्रवेश करने वाले छात्रों में बड़ी संख्या अभी भी सामान्य आर्थिक क्षमतावालों की है. गांवों और कस्बों से आने वालों की. लड़कियों की. ये सब पहली बार अपनी बंधी सीमाओं से आज़ाद अनुभव करते हैं. जाति, भाषा, धर्म,प्रांत, जेंडर से अलग नई किस्म की मित्रताओं, बिरादरियों की संभावना उन्हें आकर्षित करती है. खासकर लड़कियों के लिए यह मौक़ा इतना कीमती और दुर्लभ है कि वे इसे और लंबा करना चाहती हैं.

इस स्वतंत्रता को जब नियंत्रित और सीमित करने का प्रयास किया जाता है तो इन छात्रों, छात्राओं के मन में विद्रोह होना स्वाभाविक है. दूसरे, ये सभी तरुण मन हैं और इनमें शुभता, सौम्यता, उद्दात्तता की दबी चाह है, जिसे हो सकता है ये बता भी न सकें. लेकिन वह है. न्याय के पक्ष में खड़ा होने का उत्साह, कमजोर का साथ देने की मानवीयता, यह इनमें दबी है. जो इस लौ को बुझाना चाहता है, जो उन्हें संकुचित करना चाहता है. उससे विरक्ति स्वाभाविक है.

दुर्भाग्य से परिषद ने पिछले वर्षों में राष्ट्रवाद की रक्षा के उत्साह में खुद को छात्रों की इस तरुण आकांक्षा के विरुद्ध खड़ा कर लिया है, ऐसा प्रतीत होता है. राष्ट्रवाद के एकमात्र व्याख्याकार के रूप में खुद को आरोपित करने के उसके प्रयास ने भी छात्रों में आशंका पैदा की है. दूसरे, वे अपने परिसरों की तुलना अब पहले के मुकाबले कहीं अधिक बाहरी परिसरों से कर सकते हैं. अपने बंद परिसरों से उनमें एक हीनताबोध भी पैदा होता है.

क्या हाल के छात्र संघों के चुनावों को छात्रों की स्वतंत्रता की आकांक्षा ने प्रभावित किया है? कम से कम एनएसयूआई के चुनाव के बाद के वक्तव्य से ऐसा ही लगता है. पिछले कई वर्षों में पहली बार उसने परिसर में बौद्धिकता, आज़ादी, छात्राओं के अपने चुनाव के अधिकार के लिए आगे काम करने का वादा किया है. यह उसके अपने इतिहास में भी अपवाद का क्षण है. उसके लिए अपने पुनराविष्कार का अवसर भी. क्या दोनों ही संगठन यह कर पाएंगे?