सबसे ताकतवर और प्रभावी मुख्यमंत्रियों की सत्याग्रह की सूची में छठे नंबर पर हैं ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक. वे पिछली बार भी इसी स्थान पर ही थे. बीजू जनता दल की सरकार के मुखिया नवीन पटनायक विकास के मामले में औसत से थोड़ा आगे तो गवर्नेंस के मामले में भी ठीक ही दिखते हैं. लंबे समय से ओडिशा में अपराजेय रहे नवीन पटनायक को 2019 के विधानसभा चुनावों में हराने के लिए भाजपा अभी से प्रयासरत दिख रही है. भाजपा की ओर से इस अभियान की बागडोर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान संभाले हुए हैं. कहा जा रहा है कि बीजू जनता दल के कुछ नेता भी जल्द ही भाजपा का दामन थाम सकते हैं.

यही वह चुनौती है जो नवीन पटनायक के लिए एक कड़ी परीक्षा है. आज भाजपा जिस तरह की राजनीति कर रही है, उसमें किसी पार्टी को तोड़ना उसके लिए बेहद सामान्य बात हो गई है. इसके बावजूद पार्टी में उनकी हैसियत को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए. जहां तक राज्य के बाहर असर की बात है तो इस मामले में वे औसत से नीचे दिखते हैं. उन्हें देश का सियासी और पढ़ा-लिखा वर्ग तो जानता है लेकिन आम लोगों के बीच पहचान के मामले में वे कम पड़ जाते हैं. हालांकि खास लोगों में अपनी पहचान की वजह से गठबंधन राजनीति में वे स्वीकार्य दिखते हैं. खास तौर पर तब जब नीतीश कुमार विपक्षी खेमे का हिस्सा नहीं हैं.

सत्याग्रह महामुख्यमंत्री-2017 की सूची में सातवें नंबर पर जो मुख्यमंत्री हैं, उन्हें कम से कम शीर्ष पांच या तीन में होना चाहिए था. लेकिन उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का इस स्थिति में नहीं होना, उनके छह महीने के कार्यकाल की कहानी खुद-ब-खुद बयां कर देता है.

योगी आदित्यनाथ के पास जो चीजें हैं, वह इस दौर के नेताओं के लिए सबसे मुश्किल हैं. उनके पास अपनी एक अलग पहचान है. सही या गलत, यह बहस का विषय है. लेकिन उनकी यह पहचान सिर्फ गोरखपुर या आसपास के जिलों या फिर उत्तर प्रदेश की सरहदों तक सीमित नहीं. उनका अपना एक जनाधार है. इसके आधार पर पार्टी में भी उनकी ठीकठाक हैसियत है.

महामुख्यमंत्री बनने के तीन पैमानों - पार्टी में स्थिति, राज्य के बाहर पहचान और प्रधानमंत्री बनने की क्षमता - के मोर्च पर योगी आदित्यनाथ बेहद मजबूत दिखते हैं. लेकिन इसके बावजूद वे महामुख्यमंत्री की सूची में शीर्ष पांच में नहीं हैं तो इसकी वजह विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर उनका औसत से नीचे का प्रदर्शन है. और पार्टी से बाहर उनकी स्वीकार्यता का न के बराबर होना है.

किसानों की कर्जमाफी के अलावा योगी सरकार के पास कुछ भी और ऐसा नहीं है जिसे वह अपनी कामयाबी कह सके. उत्तर प्रदेश से आए दिन हिंसक घटनाओं की खबरें आ रही हैं. खुद योगी आदित्यनाथ के संसदीय क्षेत्र गोरखपुर में जिस तरह से बच्चों की जानें गईं और उसके बाद जो बयान उन्होंने दिया वह उनके कामकाज के के बारे में बहुत कुछ कह देता है. लेकिन योगी आदित्यनाथ के जिन तीन मजबूत पक्षों का जिक्र पहले किया गया है, वे उन्हें इस सूची में सातवें नंबर से नीचे नहीं जाने देते.

तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव इस बार भी आठवें स्थान पर बने हुए हैं. राव मनमोहन सिंह सरकार में केंद्र में मंत्री रहे. लेकिन आज मोदी सरकार के लिए भी वे उतने ही प्रिय हैं. भले ही उनकी पार्टी औपचारिक तौर पर भाजपा की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का हिस्सा नहीं हो लेकिन वह भाजपा के करीब ही दिखती है. तेलंगाना को अलग राज्य बनाने के लिए राव ने लबां संघर्ष किया था. अब जब आंध्र प्रदेश से अलग करके उन्हें नया राज्य मिल गया है तो वे उसे एक नई दिशा देते दिख रहे हैं.

चंद्रशेखर राव के बारे में कहा जाता है कि विकास और गवर्नेंस के मोर्चे पर उनकी एक सोच है और वे उसी के आधार पर आगे बढ़ रहे हैं. कई लोगों को उनकी यह सोच तेलंगाना में उपराष्ट्रीयता को बढ़ावा देने वाली लगती है. राव ने शायद यह रास्ता इसलिए पकड़ा है क्योंकि अभी वहां के लोगों में अलग राज्य के लिए चले आंदोलन की यादें बिल्कुल ताजा हैं. समय के साथ ये यादें भी धुंधली पड़ेंगी और तेलंगाना की नीतियां भी और अधिक समावेशी होंगी.

अपनी पार्टी के अंदर के चंद्रशेखर राव सर्वेसर्वा की स्थिति में हैं. राज्य से बाहर उनके असर को उनकी पहचान के जरिए समझा जा सकता है. उनकी पहचान एक ऐसे नेता की है जिसने एक अलग राज्य - तेलंगाना - के लिए संघर्ष किया और उसे पाया. लेकिन दूसरे राज्यों से सिर्फ इस वजह से उन्हें समर्थन मिले यह जरूरी नहीं. वैसे गठबंधन राजनीति में वे किसी के लिए अछूत नहीं हैं.

हमारी सूची में नौवें स्थान पर हैं केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन. वाम दलों के वे इकलौते मजबूत मुख्यमंत्री हैं. इस वजह से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के अंदर उनकी स्थिति मजबूत है. हालांकि, प्रतिष्ठा के मामले में त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार भी कम नहीं हैं लेकिन उनका राज्य काफी छोटा है. विजयन की सरकार विकास और गवर्नेंस के मामले में ठीक स्थिति में दिखती है. बहुत सारे लोग विकास के मामले में केरल की भौगोलिक स्थिति को भी जिम्मेदार मानते हैं.

राज्य से बाहर प्रभाव के मामले में वे औसत से आगे हैं. गठबंधन राजनीति में उनकी स्वीकार्यता भी कोई समस्या नहीं है. लेकिन प्रधानमंत्री बनने की संभावना के मामले में कोई उन पर दांव लगाने को तैयार नहीं होगा. फिर भी एक ऐसे समय में जब वाम दलों की पूरी राजनीति चरमराई हुई लग रही है, केरल में लाल झंडा बुलंद रखना विजयन के प्रभाव और कामकाज का प्रतीक है.

सत्याग्रह महामुख्यमंत्री-2017 की सूची में दसवें स्थान पर इस बार पर दो छोटे प्रदेशों के मुख्यमंत्री हैं - गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल. आम आदमी पार्टी के संयोजक केजरीवाल पिछले साल दूसरे नंबर पर थे. वहां से दसवें नंबर पर पहुंच जाना, इस एक साल में हर मोर्चे पर उनकी स्थिति कमजोर होने की कहानी बयां करता है.

मोहल्ला अस्पतालों और स्कूली शिक्षा में केजरीवाल सरकार की सक्रियता और उसके सकारात्मक परिणाम तो दिख रहे हैं लेकिन विकास के अन्य मोर्चे पर दिल्ली सरकार का कामकाज औसत ही दिखता है. गवर्नेंस के मामले में भी उनकी सरकार लचर ही दिख रही है. इसकी एक वजह दिल्ली के शासन तंत्र का बेहद दुरुह होना भी है जिसमें इस बात को लेकर भ्रम बना रहता है कि क्या दिल्ली की चुनी हुई सरकार के अधिकार क्षेत्र में है और क्या उपराज्यपाल के.

लेकिन केजरीवाल का असल नुकसान हुआ है पंजाब में हुई आम आदमी पार्टी की करारी हार से. इससे न सिर्फ दिल्ली से बाहर उनके प्रभाव का तिलिस्म टूटा बल्कि विपक्षी एकजुटता में उनकी कोई अहम भूमिका होने की संभावना भी धूमिल हो गई. जाहिर है कि इसका असर उस पैमाने पर भी पड़ा कि उनमें प्रधानमंत्री बनने की कितनी संभावना है.

मनोहर पर्रिकर की कहानी थोड़ी अलग है. विकास और गवर्नेंस गोवा में पिछली साल भी ऐसा ही था. लेकिन मुख्यमंत्री के पद पर कौन बैठा है, इससे भी कई बार कई चीजें तय होती हैं. केंद्र में रक्षा मंत्री जैसी अहम जिम्मेदारी संभालने से एक देशव्यापी पहचान बनना स्वाभाविक है. ऊपर से पर्रिकर का स्वभाव भी ऐसा है कि वे साफगोई में कई ऐसी बातें बोल जाते हैं जो गोवा में तो खबर नहीं बनतीं लेकिन एक रक्षा मंत्री के मुंह से निकलते ही बड़ी हो जाती है.

पार्टी में स्थिति के मामले में पर्रिकर भाजपा मुख्यमंत्रियों में सिर्फ योगी आदित्यनाथ और शिवराज सिंह चौहान से ही पीछे हैं. संघ के चहेते लोगों में अब भी उनकी गिनती होती है. लेकिन बतौर रक्षा मंत्री उन्होंने जिस तरह के बयान एक के बाद एक दिए, उससे उनकी स्वीकार्यता गठबंधन राजनीति में थोड़ी कम जरूर हो गई होगी. भाजपा की अभी की जो स्थिति है, उसमें उनके प्रधानमंत्री बनने की संभावना भी न के बराबर ही है.

जिन दो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को उन राज्यों की हैसियत की वजह से चोटी के दस में होना चाहिए था, वे हैं महाराष्ट्र और गुजरात. लेकिन महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रूपानी की स्थिति विकास और गवर्नेंस को छोड़कर बाकी के चार पैमानों पर बेहद खराब है. इसीलिए आर्थिक मामलों में देश के सबसे आगे के दो राज्य होने के बावजूद इन राज्यों के मुख्यमंत्री इतने कमजोर दिखते है कि शीर्ष 10 में उनके लिए कोई जगह ही नहीं है.

महामुख्यमंत्री-2017 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री

#1 कई अगर-मगर के बाद भी नीतीश कुमार ही इस बार के भी महामुख्यमंत्री हैं

#2 विकास और गवर्नेंस के पैमाने पर चंद्रबाबू नायडू बाकी मुख्यमंत्रियों से मीलों आगे हैं

#3 ममता बनर्जी मोदी लहर का सफलतापूर्वक मुकाबला करने वाले गिने-चुने लोगों में से हैं

#4 शिवराज सिंह चौहान पिछले साल से बस जरा से ही नीचे खिसके हैं

#5 आज की कांग्रेस में अमरिंदर सिंह से अधिक ताकतवर कोई और मुख्यमंत्री नहीं है

#6-10 इनमें से एक मुख्यमंत्री को शीर्ष तीन में होना चाहिए था और एक पिछली बार शीर्ष दो में था

महामुख्यमंत्री-2016 : देश के सबसे ताकतवर और प्रभावी 10 मुख्यमंत्री